





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मैं यह झंडा एक ऐसे व्यक्ति को दूँगा, जो अल्लाह और उसके रसूल से प्यार करता हो और अल्लाह उसके हाथों विजय प्रदान करेगा।" उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मुझे उस दिन के सिवा कभी अमीर बनने की इच्छा नहीं हुई। उनका कहना है कि मैं इस उम्मीद में अपने आप को ऊँचा का रहा था कि शायद बुला लिया जाऊँ। लेकिन, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु को बुलाकर झंडा उनके हाथ में दिया और फ़रमायाः "चल पड़ो और उस समय तक न मुड़ो, जब तक अल्लाह तुम्हारे हाथों विजय प्रदान न कर दे।" चुनांचे, अली रज़ियल्लाहु अनहु थोड़ा-सा चले और उसके बाद रुक गए, लेकिन मुड़े नहीं, बल्कि ऊँची आवाज़ में बोले : ऐ अल्लाह के रसूल, मैं किस बात पर लोगों से युद्ध करूँ? आपने फ़रमाया : "उनसे युद्ध करते रहो, यहाँ तक वे इस बात की गवाही दे दें अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। यदि उन्होंने ऐसा किया, तो अपने रक्त तथा धन को तुमसे सुरक्षित कर लिया। यह और बात है कि उनपर इस गवाही का कोई अधिकार सिद्ध हो जाए। तथा उनका हिसाब अल्लाह के हवाले है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से कहा कि अगले दिन मुसलमान मदीना के पास स्थित शहर ख़ैबर के यहूदियों पर विजयी होंगे। यह विजय उस व्यक्ति के हाथ पर होगी जिसे आप झंडा प्रदान करेंगे, झंडा से मुराद वह ध्वज है जिसे सेना प्रतीक के रूप में अपनाती है। इस व्यक्ति की एक विशेषता यह होगी कि वह अल्लाह और उसके रसूल से प्रेम करता है और अल्लाह और उसके रसूल उससे प्रेम करते हैं। उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि एक वही दिन था, जब उनके अंदर सरदारी पाने की इच्छा जागी थी और दिल में बुलाए जाने की ख़्वाहिश इस आशा में पैदा हुई थी कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा उल्लिखित अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत प्राप्त करने का सौभाग्य उनको मिल जाए। उन्होंने अपने शरीर को इस आशा में एड़ियों के सहारे ऊंचा किया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनको देख लें, उनको बुला लें और झंडा प्रदान कर दें। लेकिन अल्लाह के नबी सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम ने अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु को बुला भेजा, उन्हें झंडा प्रदान किया और आदेश दिया कि सेना के साथ चल पड़ें और दुश्मन से मिलने के बाद उनके क़िलों पर वर्चस्व प्राप्त करने तक न आराम करें, न पीछे हटें और न ही युद्धविराम करें। चुनांचे अली रज़ियल्लाहु अनहु चल पड़े। एक बार रुके भी तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश के उल्लंघन से बचने के लिए पीछे मुड़े नहीं, ख़ैबर की ओर मुँह करके ही ऊँची आवाज़ में पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैं लोगों से किस बात पर जंग करूँ? अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : उनसे उस समय तक जंग करो, जब तक इस बात की गवाही न दे दें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूजे नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। अगर उन्होंने तुम्हारे इस आह्वान को क़बूल कर लिया और इस्लाम में दाख़िल हो गए, तो उन्होंने अपने रक्त एवं अपने धन को तुमसे सुरक्षित कर लिया। हाँ, अगर वे ऐसा अपराध कर बैठें कि इस्लाम के प्रावधानों के आलोक में क़त्ल के हक़दार बन जाएँ, तो बात अलग है। बाक़ी, उनका हिसाब लेना अल्लाह का काम है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "अल्लाह ने जब मखलूक़ की सृष्टि की, तो एक किताब में, जो उसके पास अर्श पर है, लिख दियाः मेरी रहमत मेरे क्रोध पर हावी रहेगी।" एक रिवायत के शब्द हैंः "मेरी रहमत मेरे क्रोध पर हावी हो गई।" जबकि एक रिवायत में हैः "मेरी रहमत मेरे क्रोध से आगे रही।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने जब सारी सृष्टियों को पैदा किया, तो एक किताब में लिख दिया, जो उसके पास अर्श पर है : निश्चय ही मेरी रहमत मेरे क्रोध से अधिक तथा उसपर हावी रहेगी। उच्च अल्लाह का फ़रमान है : "तथा मेरी दया प्रत्येक वस्तु को समोए हुए है।" यह हदीस मुस्लिम को निराश न होने की प्रेरणा देती है।
नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "ईमान वालों का उदाहरण, उनके एक-दूसरे से प्रेम, दया और करुणा में, शरीर की तरह है, कि जब उसका कोई अंग कष्ट में होता है, तो पूरा शरीर जागने एवं बुख़ार के कष्ट में उसके साथ होता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बयान फ़रमाया है कि शुभचिंतन, दया, परस्पर सहयोग, मदद और किसी भी हानि से होने वाले कष्ट की अनुभूति की दृष्टि से मुसलमानों का हाल एक शरीर के जैसा होना चाहिए कि जब शरीर का एक अंग बीमार होता है, उसके साथ पूरा शरीर रात जागता और बुख़ार से तपता रहता है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ एक सफ़र में थे। हमने एक स्थान में पड़ाव डाला, तो कोई ख़ेमा ठीक कर रहा था, कोई तीरंदाज़ी का मुक़ाबला कर रहा था और कोई अपने जानवरों के साथ था। इसी बीच अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ़ से पुकारने वाले ने पुकारा कि नमाज़ खड़ी होने वाली है। चुनांचे, हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एकत्र हुए, तो आपने फ़रमायाः "मुझसे पूर्व जो भी नबी आया, उसपर अनिवार्य था कि अपनी उम्मत को हर उस ख़ैर की राह दिखा दे, जिसे वह उनके लिए अच्छा जानता है और हर उस चीज़ से डराए, जिसे वह उनके लिए बुरा जानता है। और तुम्हारी इस उम्मत की आफ़ियत (कुशलता) उसके आरंभिक भाग में रख दी गई है। जबकि उसके अंतिम भाग में आज़माइशें और ऐसी बातें सामने आएँगी, जिन्हें तुम नापसंद करोगे। ऐसे फ़ितने सामने आएँगे, जो एक-दूसरे को हल्का कर देंगे। एक फ़ितना सामने आएगा, तो मोमिन कहेगाः यह मेरा विनाश का देगा। लेकिन वह दूर हो जाएगा। फिर दूसरा फ़ितना आएगा, तो मोमिन कहेगाः यही सबसे बड़ा फ़ितना है। अतः, जो यह पसंद करता हो कि उसे जहन्नम से दूर कर दिया जाए और जन्नत में दाख़िल कर दिया जाए, उसकी मौत इस अवस्था में आए कि वह अल्लाह तथा अंतिम दिवस पर ईमान रखता हो। तथा लोगों के साथ वही व्यवहार करे, जो अपने साथ किए जाने को पसंद करता हो। तथा जो किसी इमाम की बैअत करे और उसे अपना हाथ तथा अपने दिल का फल दे दे, उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उसका अनुसरण करे। फिर अगर कोई दूसरा उसे अपने मातहत करने के लिए उससे झगड़ा करे, तो उसकी गरदन उड़ा दो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस से मालूम हुआ कि नबियों की तरह आह्वानकर्ताओं पर भी भलाई को स्पष्ट करना, उसकी प्रेरणा देना, उसकी ओर लोगों का मार्गदर्शन करना तथा इसी तरह बुराई को स्पष्ट करना और उससे सावधान करना अनिवार्य है। इस हदीस में एक अन्य बात यह बताई गई है कि इस उम्मत के आरंभिक काल के लोग आज़माइशों से सुरक्षित रहे, जबकि इसके अंतिम काल के लोगों को ऐसी बुराइयों एवं परीक्षाओं का सामना रहेगा कि बाद में आने वाले फ़ितनों के सामने पहले आने वाले फ़ितने बौने दिखाई देंगे। आगे बताया गया है कि इन फ़ितनों से मुक्ति एकेश्वरवाद, सुन्नत के अनुसरण, लोगों के साथ अच्छे व्यवहार, शासकों से की गई बैअत की पाबंदी, उसके विरुद्ध बग़ावत से गुरेज़ तथा मुसलमानों की एकता को भंग करने वालों से युद्ध के द्वारा मिल सकती है।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "वह व्यक्ति हममें से नहीं, जो गालों पर थप्पड़ मारे, गिरेबान फाड़े और जाहिलियत का कोई बोल बोले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अज्ञानता काल के लोगों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यों से मना और सावधान किया है। आपने फ़रमाया कि निम्नलिखित काम करने वाले लोग हम में से नहीं हैं : 1- गाल पीटने वाला। वैसे तो चेहरे के अन्य भागों को पीटना भी मनाही के दायरे में आता है, लेकिन चेहरे का ज़िक्र ख़ास तौर से इसलिए किया गया है कि आम तौर से गाल ही पीटा जाता है। 2- अत्यधिक व्याकुलता के कारण वस्त्र का वह भाग (गिरेबान) फाड़ देना जहाँ से सिर प्रविष्ट होता है। 3- अज्ञानता (जाहिलियत) के युग के लोगों की तरह विलाप करना, जैसे 'हाय-हाय' और 'बर्बादी' की पुकार लगाना, और रोना-धोना तथा शोक गीत गाना।
समुरा बिन जुंदुब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम) ने फरमायाः "उनमें से कुछ ऐसे होंगे जिनके टख़नों तक आग पहूँचेगी, तो कुछ लोगों के घुटनों तक और कुछ के कमर तक। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होंगे, जिनकी हँसली तक अग पहुँच रही होगी।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।यह हदीस क़यामत के दिन तथा जहन्नम की यातना से भय करना सिखाती है। इसमें बताया गया है कि क़यामत के दिन आग कुछ लोगों के टखनों तक पहुँचेगी, कुछ लोगों के घुटनों तक पहुँचेगी, कुछ लोगों की कमर तक पहुँचेगी और कुछ लोगों की गर्दन तक पहुँचेगी। दरअसल, लोग दुनिया में किए हुए अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग श्रेणी की यातना का सामना कर रहे होंगे।
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं: मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना : “उच्च एवं बरकत वाला अल्लाह फरमाता है : हे आदम के पुत्र! जब तक तू मुझे पुकारता रहेगा तथा मुझसे आशा रखेगा, मैं तेरे पापों को क्षमा करता रहूँगा, चाहे वह जितने भी हों, मैं उसकी परवाह नहीं करूँगा। हे आदम के पुत्र! यदि तेरे पाप आकाश की ऊँचाइयों के समान हो जाएँ, फिर तू मुझसे क्षमा याचना करे, तो मैं तुझे क्षमा कर दूँगा और मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है। हे आदम के पुत्र! यदि तू मेरे पास धरती के समान पाप लेकर इस हाल में आए कि तुमने मेरे साथ किसी को साझी नहीं किया था, तो मैं तेरे पास धरती के समान क्षमा लेकर आउँगा।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह ने एक हदीस-ए-क़ुदसी में कहा है : ऐ आदम की संतान, जब तक तू मुझे पुकारता रहेगा, मेरी दया की आशा लगाए रहेगा और निराश नहीं होगा, मैं किसी बात की परवाह किए बिना तेरे गुनाह पर पर्दा डालता रहूँगा और उसे मिटाता रहूँगा। चाहे यह गुनाह कबीरा गुनाह ही क्यों न हो। ऐ आदम की संतान, अगर तेरे गुनाह इतने ज़्यादा भी हो जाएँ कि आकाश एवं धरती के बीच के ख़ाली स्थान को भर देते हों और उसके बाद भी तू मुझसे क्षमा प्रार्थी हो जाए, तो मैं गुनाहों की प्रचुरता की कोई परवाह किए बिना तुझे क्षमा कर दूँगा। ऐ आदम की संतान, अगर तू मौत के बाद मेरे पास इस अवस्था में आए कि तेरे गुनाहों एवं अवज्ञाओं से धरती भरी हुई हो और तू एकेश्वरवादी बनकर मृत्यु को प्राप्त हुआ हो, तो मैं उन गुनाहों एवं अवज्ञाओं के मुक़ाबले में धरती भरकर क्षमा लेकर उपस्थित रहूँगा। क्योंकि मेरी क्षमा बड़ी वृहद है। मैं शिर्क को छोड़कर सारे गुनाहों को क्षमा कर दूँगा।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम) ने फ़रमायाः “प्रत्येक बंदा (मुत्यु पश्चात) उसी अवस्था में उठाया जाएगा, जिसमें उसकी मृत्यु हुई थी।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।क़यामत के दिन हर इनसान को उसी अवस्था में उठाया जाएगा, जिस अवस्था में उसकी मृत्यु हुई थी।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “शक्तिशाली मोमिन कमज़ोर मोमिन के मुकाबले में अल्लाह के समीप अधिक बेहतर तथा प्रिय है, किंतु प्रत्येक के अंदर भलाई है। जो चीज तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसके लिए तत्पर रहो और अल्लाह की मदद मांगो तथा असमर्थता न दिखाओ। फिर यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि "قدر الله وما شاء فعل" (अर्थात् अल्लाह तआला ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है।) क्योंकि ‘अगर’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि वैसे तो हर मोमिन के अंदर कुछ न कुछ भलाई ज़रूर होती है, लेकिन ईमान, प्रतिज्ञा एवं धन आदि शक्ति के स्रोतों में मज़बूत मोमिन अल्लाह की नज़र में कमज़ोर मोमिन से अच्छा एवं प्रिय है। उसके बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मोमिन को ऐसे साधन अपनाने की वसीयत फ़रमाई, जिनसे यदि अल्लाह पर भरोसा हो और उससे मदद माँगी जाए, तो दुनिया एवं आख़िरत की भलाई प्राप्त हो सकती है। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने विवशता, सुस्ती और दोनों जहानों में लाभकारी साबित होने वाली चीज़ों से पीछे हटने से मना फ़रमाया है। अतः एक मोमिन का तरीक़ा यह हो कि जब वह किसी काम में जो मेहनत होनी चाहिए, वह कर ले, उसके साधन अपना ले, अल्लाह से मदद माँग ले और ख़ैर तलब कर ले, तो उसके बाद सब कुछ अल्लाह के हवाले कर दे और विश्वास रखे कि अल्लाह जो करेगा, अच्छा ही होगा। इसके बाद अगर कोई विपत्ति आ जाए, तो यह न कहे कि : "अगर मैं ऐसा कर लेता, तो ऐसा और ऐसा होता।" क्योंकि यह "अगर" शब्द शैतान के कार्य के द्वार खोल देता है। यानी इन्सान तक़दीर पर एतराज़ और हाथ न लगने वाली चीज़ पर अफ़्सोस शुरू कर देता है। इन्सान को अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी और सब कुछ उसी के हवाले करते हुए बस इतना कहना चाहिए कि यह अल्लाह का फ़ैसला है और अल्लाह ने जो चाहा किया। अतः जो कुछ हुआ अल्लाह के इरादे से हुआ। क्योंकि वह जो चाहता है, करता ही है। उसके फ़ैसले को कोई टाल नहीं सकता, और उसके आदेश को कोई रोक नहीं सकता।