





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह क़यामत के दिन कहेगाः ऐ आदम के पुत्र, मैं बीमार था, तो तू मेरा हाल जानने नहीं आया। वह कहेगाः ऐ मेरे रब, मैं कैसे तेरा हाल जानने जाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगाः क्या तू नहीं जानता कि मेरा अमुक बंदा बीमार था और तू उसका हाल जानने नहीं गया? क्या तुझे नहीं मालूम कि यदि तू उसका हाल जानने उसके पास जाता, तो मुझे उसके पास पाता? ऐ आदम के पुत्र, मैंने तुझसे भोजन माँगा, लेकिन तूने मुझे भोजन नहीं कराया। वह कहेगाः ऐ मेरे रब, मैं तुझे कैसे भोजन कराता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगाः क्या तुझे नहीं पता कि मेरे अमुक बंदे ने तुझसे भोजन माँगा था, लेकिन तूने उसे भोजन नहीं कराया? क्या तुझे नहीं पता कि यदि तूने उसे भोजन कराया होता, तो मुझे उसके पास पाता? ऐ आदम के पुत्र, मैंने तुझसे पानी माँगा, तो तूने मुझे पानी नहीं पिलाया। वह कहेगा, ऐ मेरे रब, मैं कैसे तुझको पानी पिलाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगाः क्या तुझे नहीं पता कि मेरे अमुक बंदे ने तुझसे पानी माँगा था, लेकिन तूने उसे पानी नहीं पिलाया? क्या तू नहीं जानता कि यदि तूने उसे पानी पिलाया होता, तो तू मुझे उसके पास पाता?
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह क़यामत के दिन कहेगाः ऐ आदम के पुत्र, मैं बीमार था, तो तू मेरा हाल जानने नहीं आया। वह कहेगाः ऐ मेरे रब, मैं कैसे तेरा हाल जानने जाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है?" यानी तुझे तो इसकी ज़रूरत ही नहीं है कि मैं तेरा हाल जानने जाऊँ। "अल्लाह कहेगा : क्या तू नहीं जानता कि मेरा अमुक बंदा बीमार था और तू उसका हाल जानने नहीं गया? क्या तुझे नहीं मालूम कि यदि तू उसका हाल जानने उसके पास जाता, तो मुझे उसके पास पाता?" इस हदीस के अंदर अल्लाह तआला के इस कथन में है कि मैं बीमार हुआ और तू मेरा हाल जानने नहीं आया, यह आपत्ति उतपन्न नहीं होती कि अल्लाह का बीमार होना तो असंभव है कि रोग होना दोष वाला गुण है और अल्लाह हर दोष से पवित्र है। क्योंकि यहाँ बीमार होने से मुराद उसके किसी सदाचारी बंदे का बीमार होना है और अल्लाह के सदाचारी बंदे उसके खास लोग हुआ करते हैं। यही कारण है अल्लाह ने कहा : यदि तू उसे देखने के लिए जाता, तो तू मुझे उसके पास पाता और यह नहीं कहा कि तू अपने इस काम का प्रतिफल मेरे पास पाता, जैसा कि खाने और पीने के बारे में कहा है। यह दरअसल रोगी के सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से निकट होने का प्रमाण है। यही कारण है कि उलेमा ने कहा है : रोगी जब किसी के लिए दुआ करता है या किसी पर बददुआ करता है, तो इस बात की पूरी आशा होती है कि उसकी दुआ ग्रहण हो जाए। अल्लाह का कथन : "ऐ आदम के पुत्र, मैंने तुझसे भोजन माँगा, लेकिन तूने मुझे भोजन नहीं कराया।" यह बात सब लोग जानते हैं कि अल्लाह अपने लिए खाना नहीं माँगता, क्योंकि उसका फ़रमान है : "वह सबको खिलाता है और उसे कोई नहीं खिलाता।" [सूरा अल-अनआम : 14] वह हर चीज़ से निस्पृह है और उसे खाने-पीने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अल्लाह का एक बंदा भूखा था और एक व्यक्ति को पता भी था, लेकिन उसने उसे खाना नहीं दिया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया : "क्या तुझे नहीं पता कि यदि तूने उसे भोजन कराया होता, तो उसका प्रतिफल मेरे पास पाता?" यानी उसका प्रतिफल मेरे पास इस तरह पाता कि एक नेकी का बदला दस गुना से सात सौ गुना तक और उससे बेशुमार गुना तक बढ़ा हुआ होता। अल्लाह का कथन : "ऐ आदम के पुत्र, मैंने तुझसे पानी माँगा, तो तूने मुझे पानी नहीं पिलाया। वह कहेगा : ऐ मेरे रब, मैं कैसे तुझको पानी पिलाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है?" यानी तुझे खाने और पीने की ज़रूरत ही नहीं है। "अल्लाह कहेगा : क्या तुझे नहीं पता कि मेरे अमुक बंदे ने तुझसे पानी माँगा था, लेकिन तूने उसे पानी नहीं पिलाया? क्या तू नहीं जानता कि यदि तूने उसे पानी पिलाया होता, तो उसका प्रतिफल मेरे पास पाता?"
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि हम लोग हज्जतुल वदा के बारे में बात कर रहे थे और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमारे बीच मौजूद थे, लेकिन हमें पता नहीं था कि हज्जतुल वदा क्या है, यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह की प्रशंसा की, फिर दज्जाल का बहुत देर तक ज़िक्र करते हुए फ़रमाया : "अल्लाह ने जिस नबी को भी भेजा है, उसने अपनी उम्मत को इससे डराया है। नूह़ और उनके पश्चात आने वाले सारे नबियों ने इससे डराया है। यदि वह तुम्हारे बीच निकलता है, तो वह अपनी निशानियों के कारण तुमसे छुप नहीं सकता, क्योंकि तुम्हारा रब काना नहीं है और वह दाएँ आँख का काना होगा। गोया कि उसकी आँखें उभरे हुए अंगूर की तरह होंगी। सुन लो, तुमपर तुम्हारा रक्त और तुम्हारे धन एक दूसरे पर उसी प्रकार हराम हैं, जिस प्रकार तुम्हारे इस दिन की हुरमत है, तुम्हारे इस शहर और इस महीने में। क्या मैंने पहूँचा दिया?" लोगों ने कहा : हाँ। फिर आपने तीन बार फ़रमाया : "ऐ अल्लाह, तू गवाह रह।" फिर फ़रमाया : "तुम्हारा नाश हो, देखो मेरे बाद काफ़िर न बन जाना कि एक-दूसरे की गर्दन उड़ाने लगो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के जीवन काल ही में हम कहा करते थे कि हज्जतुल वदा क्या है? हम जानते ही नहीं थे कि हज्जतुल वदा क्या है। याद रहे कि हज्जतुल वदा वह हज है, जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सन 10 हिजरी में किया था और जिसमें लोगों को अल-वदा कहने के साथ-साथ काना दज्जाल का उल्लेख किया था, उसके फ़ितने की भयावहता से अवगत किया था, उससे बहुत ज़्यादा डराया था और बताया था कि सारे नबीगण अपनी जातियों को दज्जाल से सावधान करते आए हैं, उससे डराते रहे हैं और उसकी भयावहता का उल्लेख करते आए हैं। उसे पहचानना तुम्हारे लिए कठिन नहीं होगा। क्योंकि तुम्हारा प्रभु काना नहीं है और वह दाएँ आँख का काना होगा। उसकी आँख उभरे हुए अंगूर की तरह होगी। इसके बाद अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : अल्लाह ने तुमपर अपने किसी भाई का रक्त बहाने और नाहक़ किसी मुसलमान का धन ले लेने को उसी प्रकार हराम किया है, जिस प्रकार क़ुरबानी का दिन हुरमत वाला है, मक्का नगर हुरमत वाला है और ज़ुल-हिज्जा महीना हुरमत वाला है। फिर आपने पूछा : क्या मैंने तुम्हें वह संदेश पहुँचा दिया, जिसे तुम्हें पहुँचाने का आदेश मुझे दिया गया था? लोगों ने उत्तर दिया : हाँ, आपने पहुँचा दिया है। यह उत्तर सुन आपने तीन बार कहा : ऐ अल्लाह! इन लोगों ने उनके पास तेरा संदेश पहुँचा देने की जो गवाही दी है, उसपर तू गवाह रह। फिर आपने लोगों से कहा कि देखो, मेरे बाद काफ़िरों के समान न हो जाना कि एक-दूसरे का वध करते रहो।
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "प्रत्येक नबी ने अपनी क़ौम को झूठे काना से डराया है। सुन लो, वह काना होगा और यक़ीनन तुम्हारा -सर्वशक्तिमान एवं महान- रब काना नहीं है। उसकी आँखों के सामने काफ़-फ़ा-रा लिखा होगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के भेजे हुए तमाम नबियों ने अपनी उम्मतों को मसीह दज्जाल से डराया और सावधान किया है, क्योंकि उनके पास उसके निकलने तथा उसके फ़ितने की भयावहता की जानकारी थी। साथ ही उन्होंने उसकी कुछ विशेषताएँ भी बयान की हैं। इस हदीस में बयान किया गया है कि वह काना होगा, जबकि अल्लाह इस तरह की तमाम बातों से पवित्र है। इसी तरह उसकी एक पहचान यह होगी कि उसकी दोनों आँखों के बीच में "ك ف ر" (क फ़ र) लिखा हुआ होगा।
ह़ुज़ैफ़ा बिन यमान तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "अल्लाह तआला लोगों को एकत्र करेगा, तो मोमिन खड़े होंगे और जन्नत उनसे समीप कर दी जाएगी। ऐसे में लोग आदम -अलैहिस्सलाम- के पास जाएँगे और कहेंगे : ऐ हमारे पिता, हमारे लिए जन्नत खुलवा दें। वह कहेंगे : तुम्हें तो तुम्हारे पिता के पाप ने ही जन्नत से निकाला है! मैं इसके लिए उपयुक्त नहीं हूँ। मेरे बेटे इबराहीम, जो अल्लाह के मित्र हैं, के पास जाओ। फ़रमाया : चुनांचे लोग इबराहीम के पास जाएँगे। लेकिन वह कहेंगे : मैं इसके लिए उपयुक्त नहीं हूँ। मैं अल्लाह का मित्र दूर-दूर से था। तुम लोग मूसा के पास जाओ, जिनसे अल्लाह ने बात की है। लोग मूसा के पास जाएँगे, तो मूसा कहेंगे कि मैं इसके योग्य नहीं हूँ। तुम ईसा के पास जाओ, जो अल्लाह के शब्द और उसकी रूह हैं। लोग उनके पास जाएँगे, तो ईसा फ़रमाएँगे : मैं इसके योग्य नहीं हूँ। ऐसे में लोग मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास जाएँगे, तो आप खड़े होंगे और आपको अनुमति भी दे दी जाएगी और अमानत तथा रक्त-संबंध भेजे जाएँगे। दोनों पुलसिरात के दाएँ तथा बाएँ ख़ड़े हो जाएँगे, तो तुम्हारा पहला गिरोह बिजली की तरह गुज़र जाएगा।" मैंने कहा : मेरे माता-पिता आपपर क़ुर्बान हों, कौन-सी वस्तु बिजली की तरह गुज़र सकती है? फ़रमाया : "क्या तुम नहीं देखते कि वह कैसे पलक झपकते आती और जाती है? फिर एक गिरोह हवा की तरह गुज़रेगा, फिर एक गिरोह चिड़िया की तरह गुज़रेगा, फिर एक गिरोह पैदल तेज़ दौड़ने वाले पुरुषों की तरह गुज़रेगा। लोग अपने-अपने कर्म के अनुसार गुज़र रहे होंगे। जबकि तुम्हारे नबी सिरात पर खड़े होकर कह रहे होंगे : ऐ मेरे रब, इन्हें बचा ले, इन्हें बचा ले। यहाँ तक कि बंदों के कर्म विवश दिखाई पड़ने लगेंगे। एक आदमी आएगा और चल न पाने के कारण घिसट रहा होगा। सिरात के दोनों किनारों पर अंकुड़े लगे होंगे, जो उन लोगों को पकड़ लेंगे, जिन्हें पकड़ने का आदेश होगा। चुनांचे, कोई खरोंच के साथ बच निकलेगा, तो किसी को जहन्नम में फेंक दिया जाएगा।" उस ज़ात की क़सम, जिसके हाथों में अबू हुरैरा के प्राण हैं, जहन्नम की गहराई सत्तर वर्ष की दूरी के बराबर है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह लोगों को क़यामत के दिन हिसाब एवं प्रतिफल के लिए एकत्र करेगा, तो ईमान वाले खड़े होंगे और जन्नत को उनके निकट कर दिया जाएगा। लेकिन उनके लिए जन्नत के द्वार खोले नहीं जाएँगे, क्योंकि क़यामत के दिन लोगों को लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ेगा। अतः लोग आदम -अलैहिस्सलाम- के पास जाएँगे और उनसे कहेंगे कि अल्लाह से उनके लिए जन्नत खोलने का अनुरोध करें। लेकिन वह उन्हें यह कहकर लौटा देंगे कि वह इस कार्य के योग्य नहीं हैं। ऐसा वह अपने उस गुनाह के कारण कहेंगे, जो तमाम लोगों के जन्नत से निकलने का कारण बना था। वह उन्हें इबराहीम -अलैहिस्सलाम- के पास भेज देंगे, जो अल्लाह के 'ख़लील' हैं और 'ख़लील होना' प्रेम की सबसे उच्च श्रेणी है। चुनांचे लोग इबराहीम -अलैहिस्सलाम- के पास जाएँगे, तो वह उनसे कहेंगे कि मुझे इतना ऊँचा पद प्राप्त नहीं है। तुम लोग मूसा -अलैहिस्सलाम- के पास चले जाओ। अल्लाह ने उनसे बिना किसी माध्यम के प्रत्यक्ष रूप से बात की थी। लोग मूसा -अलैहिस्सलाम- के पास जाएँगे, तो वह उनसे कहेंगे कि मैं इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। तुम लोग ईसा -अलैहिस्सलाम- के पास चले जाओ। अल्लाह ने उनकी रचना अपने एक शब्द द्वारा की थी। चुनांचे सारे लोग ईसा -अलैहिस्सलाम- के पास जाएँगे, तो वह भी कह देंगे कि मैं इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। चुनांचे सब लोग हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास जाएँगे और उनसे कहेंगे कि अल्लाह से अनुरोध कीजिए कि हमारे बीच निर्णय कर दे, और हमारे लिए जन्नत के द्वार खोल दे। आप उनकी बात मान लेंगे और अल्लाह से सिफ़ारिश की अनुमति माँगेंगे, तो आपको अनुमति दे दी जाएगी। फिर अमानत एवं रक्त-संबंध दोनों आएँगे और पुल-सिरात के दाएँ-बाएँ खड़े हो जाएँगे। पुल-सिरात दरअसल जन्नत के ऊपर बना हुआ एक पुल है। उसपर से लोग अपने-अपने कर्म के अनुसार गुज़रेंगे। जो दुनिया में सत्कर्म की ओर तेज़ी से जाता था, वह इस पुल से तेज़ गति से गुज़र जाएगा और जो इसके विपरीत था, उसका हाल इसके विपरीत होगा। कोई उससे सही-सलामत गुज़र जाएगा और कोई जहन्नम में जा गिरेगा। जबकि जहन्नम एक ऐसी गहरी खाई है, जहाँ इनसान सत्तर वर्ष बाद ही पहुँच सकेगा। अल्लाह हमें उससे बचाए।
अबू वाक़िद लैसी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब हुनैन युद्ध के लिए निकले, तो मुश्रिकों (बहुदेववादियों) की ओर से पूजे जाने वाले एक पेड़ के पास से गुज़रे, जिसे 'ज़ात-ए-अनवात' कहा जाता था। वे उसमें अपने हथियार लटकाया करते थे। चुनांचे लोगों ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उनकी तरह हमारे लिए भी एक 'ज़ात-ए-अनवात' बना दीजिए। उनकी बात सुन अल्लाह के रसूलसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : सुबहानल्लाह (अल्लाह पवित्र है)! तुम लोग ठीक वैसा ही कह रहे हो, जैसा मूसा की क़ौम ने कहा था। उन्होंने मूसा (अलैहिस्सलाम) से कहा था : "اجْعَلْ لَنَا إِلَهًا كَمَا لَهُمْ آَلِهَةٌ" (हमारे लिए भी कोई पूज्य बना दीजिए, जैसा कि मुश्रिकों के बहुत-से पूज्य हैं।) [अल-आराफ़: 138] सुन लो, तुम लोग भी पहले समुदायों के पदचिह्नों पर चल पड़ोगे।"
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्ला के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तायफ़ एवं मक्का के बीच में स्थित एक वादी हुनैन की ओर निकले। आपके साथ कुछ सहाबा ऐसे भी थे, जो अभी-अभी मुसलमान हुए थे। जब वह ज़ात-ए-अनवात ,अर्थात; लटकाने का थान, नामी एक पेड़ के पास से गुज़रे, जिसका बहुदेववादी सम्मान किया करते थे और बरकत पाने के लिए उसपर अपना हथियार आदि लटकाया करते थे, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहने लगे कि उनके लिए भी इसी प्रकार का एक पेड़ निर्धारित कर दें, जिसमें वह अपने हथियार बरकत पाने के लिए लटका सकें। दरअसल वह समझते थे कि ऐसा करना जायज़ है। चुनांचे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके इस अनुरोध के प्रति अपनी अप्रियता व्यक्त करते हुए और अल्लाह की महानता बयान करते हुए सुबहानल्लाह कहा और फ़रमाया कि उनकी यह बात मूसा अल्लाह की जाति के इस कथन के जैसी है : {हमारे लिए भी एक पूज्य बना दीजिए, जिस तरह उन (बहुदेववादियों) के पूज्य हैं}। जब उन्होंने कुछ लोगों को बुतों की पूजा करते हुए देखा था, तो इस बात का मुतालबा किया था कि मुश्रिकों की तरह उनके भी कुछ बुत हों। आपने बताया कि आपके सहाबा का यह मुतालबा भी दरअसल उनका अनुसरण है। फिर आपने बताया कि यह उम्मत भी यहूदियों एवं ईसाइयों के पद्चिह्नों पर चलेगी और उनके जैसे काम करेगी। आपका उद्देश्य इस प्रकार के कामों से सावधान करना था।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया, किसी विषय में आपसे बात की और इसी दौरान कहा : वही होगा जो अल्लाह चाहेगा और आप चाहेंगे। उसकी यह बात सुन आपने कहा : "क्या तुमने मुझे अल्लाह के समान बना दिया? कहो कि जो केवल अल्लाह चाहेगा, वही होगा।"
इसे नसई ने अल-कुबरा में तथा इब्न-ए-माजह ने एवं अह़मद ने रिवायत किया हैएक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया, आपसे किसी विषय में बातचीत की और उसके बाद कहा : "होगा वही, जो अल्लाह चाहे और आप चाहें।" तब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसकी इस बात का खंडन किया और बताया कि बंदे की इच्छा को अल्लाह की इच्छा से "واو" (और) शब्द द्वारा जोड़ना छोटा शिर्क है। किसी मुसलमान के लिए इस प्रकार का वाक्य बोलना जायज़ नहीं है। इसके बाद उनको बता दिया कि कहना क्या चाहिए। कहना चाहिए : "होगा वही, जो केवल अल्लाह चाहे।" बात केवल अल्लाह की इच्छा की होनी चाहिए। उसके साथ किसी की इच्छ को किसी हर्फ़-ए-अत्फ़ द्वारा जोड़ना सही नहीं है।
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मेरे यहाँ आए, तो देखा कि मैंने अपने एक ताक पर एक कपड़ा डाल रखा था, जिसपर तस्वीरें थीं, उसपर नज़र पड़ते ही उसे खींचकर हटा डाला और आपके चेहरे का रंग बदल गया तथा फ़रमाया : "ऐ आइशा! क़यामत के दिन सबसे अधिक कठोर यातना उन लोगों को होगी, जो अल्लाह की सृष्टि की समानता प्रकट करते हैं।" आइशा रज़ियल्लाहु अनहा कहती हैं : अतः हमने उसे फाड़कर उससे एक या दो तकिए बना लिए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अनपी पत्नी आइशा रज़यल्लाहु अनहा के घर में प्रवेश किया, तो देखा कि उन्होंने अपने एक ताक पर एक कपड़ा डाल रखा है, जिसपर प्राण वाली चीज़ों की तस्वीरें हैं। उसे देखकर ग़ुस्से से आपके चेहरे का रंग बदल गया, आपने उसे खींचकर हटा दिया और फ़रमाया : क़यामत के दिन सबसे कठोर यातना का सामना उन लोगों को करना पड़ेगा, जो अपनी तस्वीरों द्वारा अल्लाह की सृष्टि की समानता प्रकट करते हैं। आइशा रज़ियल्लाहु अनहा कहती हैं : चुनांचे हमने उससे एक या दो तकिए बना लिए।
बुरैदा बिन हुसैब असलमी (रज़ियल्लाहु अंहु) वर्णन करते हुए कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब किसी व्यक्ति को किसी सेना अथवा उसकी छोटी टुकड़ी का नेतृत्व प्रदान करते तो उसे अल्लाह के भय तथा मुसलमान साथियों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश देते हुए कहतेः अल्लाह का नाम लेकर उसकी राह में युद्ध करना। अल्लाह का इनकार करने वालों से युद्ध करना। देखो, युद्ध करना, परन्तु ग़नीमत के धन को न छिपाना, धोखा न देना, युद्ध में मरे हुए व्यक्ति के शरीर के अंग न काटना और किसी बच्चे को न मारना। जब तुम्हारा सामना मुश्रिक शत्रुओं से हो तो उन्हें तीन बातों की ओर बुलाना। उनमें से कोई भी मान लें तो उसे उनकी ओर से स्वीकार कर लेना और उनसे युद्ध करने से बाज़ आ जाना। सबसे पहले उन्हें इस्लाम की ओर बुलाना। यदि वे मान लें तो उनका रास्ता छोड़ देना। साथ ही उन्हें अपना क्षेत्र छोड़कर इस्लामी क्षेत्र की ओर हिजरत करने का आदेश देना। उन्हें बताना कि यदि वे ऐसा करेंगे तो उन्हें वो सारे अधिकार प्राप्त होंगे, जो अन्य मुहाजिरों को प्राप्त हैं, तथा उन्हें उन ज़िम्मेवारियों का पालन करना होगा, जिनका पालन मुहाजिरों को करना होता है। अगर वे हिजरत करने से इनकार कर दें तो बताना कि वे देहात में रहने वाले मुसलमानों के समान होंगे। उनपर अल्लाह तआला के आदेश लागू होंगे, परन्तु ग़नीमत और फ़य के धन में उनका भाग नहीं होगा। हाँ, यदि वे मुसलमानों के साथ युद्ध में भाग लें तो बात अलग है। अगर वे इस्लाम ग्रहण करने से मना कर दें तो उनसे जिज़्या माँगना। मान लें तो ठीक है। हाथ उठा लेना। परन्तु यदि न मानें तो अल्लाह से मदद माँगना और उनसे युद्ध करना। और जब किसी दुर्ग में छिपे लोगों की घेराबंदी कर लो और वह तुमसे अल्लाह तथा उसके रसूल की सुरक्षा माँगें तो उन्हें अल्लाह एवं उसके रसूल की सुरक्षा न देना, बल्कि अपनी तथा अपने साथियों की सुरक्षा देना, क्योंकि तुम्हें अपनी तथा अपने साथियों की ओर से दी गई सुरक्षा भंग करनी पड़े तो यह इस बात से सरल है कि अल्लाह तथा उसके रसूल की ओर से दी गई सुरक्षा भंग करनी पड़े। इसी तरह जब किसी दुर्ग में छिपे लोगों की घेराबंदी कर लो और वे चाहें कि तुम उन्हें अल्लाह के आदेश पर उतारो तो ऐसा न करना। उन्हें अपने आदेश पर उतारना, क्योंकि तुम्हें क्या पता कि तुम उनके बारे में अल्लाह के उचित आदेश तक पहुँच पा रहे हो कि नहीं?
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।बुरैदा -रज़ियल्लाहु अनहु- बताते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब काफ़िरों से युद्ध के लिए किसी सेना अथवा सैन्य दल की टुकड़ी को भेजते, तो एक व्यक्ति को उनका अमीर बनाते, जो उनकी देख-रेख के साथ-साथ उनकी एकता को बनाए रखे। फिर उसे अल्लाह का भय रखने तथा अपने साथियों के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद करते और बताते कि शत्रुओं के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। उन्हें ग़नीमत के धन को छिपाने, धोखा देने और मरे हुए व्यक्ति के शरीर के अंगों को काटने एवं 'ग़ैरमुकल्लफ़' -जिन पर धार्मिक विधान एवं आदेश लागू न हों,- को मारने से मना करते तथा बताते कि लोगों को सबसे पहले इस्लाम की ओर बुलाएँ। यदि वे मान लें, तो उन्हें हिजरत करके मदीना आ जाने को कहें और बताएँ कि उन्हें वह सारे अधिकार प्राप्त होंगे, जो पहले हिजरत करके आने वाले मुसलमानों को प्राप्त हैं और उन्हें उन ज़िम्मेवारियों का निर्वाह करना पड़ेगा, जो उन्हें करने पड़ते हैं। यदि हिजरत करने से मना कर दें, तो उनके साथ देहातों में बसने वाले मुसलानों का सा बर्ताव किया जाएगा। परन्तु यदि वे इस्लाम ग्रहण करने से मना कर दें, तो उनसे जज़िया कर मांगें। यदि वह जज़िया देने पर तैयार न हों, तो अल्लाह से सहायता माँगें और उनसे युद्ध करें। तथा जब किसी दुर्ग की घेराबंदी कर लें, तो उसमें मौजूद लोगों को अल्लाह और उसके रसूल का वचन देने के बजाय अपना वचन दें, क्योंकि अपना वचन तोड़ने में अल्लाह तथा उसके रसूल का वचन तोड़ने की तुलना में कम गुनाह है। तथा यदि वे अपने बारे में अल्लाह का निर्णय करने को कहें, तो कोई निर्णय करके उसे अल्लाह का निर्णय न बताएँ, क्योंकि इस बात की भी संभावना है कि वे उनके बारे में अल्लाह के निर्णय तक न पहुँच सकें। अतः उनसे अपने निर्णय और इज्तिहाद के अनुसार बर्ताव करें।
इब्ने दैलमी कहते हैंः मैं उबै बिन काब के पास आकर बोला कि मेरे दिल में तक़दीर के बारे में थोड़ी-सी खटक है। मुझे कोई हदीस सुनाइए कि अल्लाह इस खटक को मेरे दिल से निकाल दे। उन्होंने कहाः अगर तुम उहुद पर्वत के बराबर भी सोना खर्च कर दो तो अल्लाह उसे ग्रहण नहीं करेगा, जब तक तक़दीर पर ईमान न रखो और इस बात पर विश्वास न रखो कि जो चीज़ तुम्हें मिलने वाली है, वह तुम्हारे हाथ से निकल नहीं सकती और जो तुम्हें मिलने वाली नहीं है, वह तुम्हारे हाथ लग नहीं सकती। अगर तुम इसके सिवा किसी और आस्था पर मरोगे तो जहन्नम में प्रवेश करने वालों में शामिल हो जाओगे। वह कहते हैंः मैं इसके बाद अब्दुल्लाह बिन मसऊद, हुज़ैफ़ा बिन यमान और ज़ैद बिन साबित के पास गया तो हर एक ने मुझे अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के हवाले से इस तरह की हदीस सुनाई।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन फैरोज़ दैलमी -उनपर अल्लाह की कृपा हो- कहते हैं कि उनके दिल में तक़दीर के संबंध में कुछ आशंकाएँ पैदा हुईं, तो उन्हें भय हुआ कि कहीं मामला इसके इनकार तक न पहुँच जाए, अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज्ञानी सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- के पास जाकर इस संदेह के निवारण के बारे में पूछा। वैसे, ईमान वालों का यही तरीका होना चाहिए कि जहाँ कोई संदेह पैदा हो, जानकार लोगों से संपर्क करें। यही अल्लाह का आदेश भी हैः "فاسألوا أهل الذكر إن كنتم لا تعلمون" (अगर तुम नहीं जानते, तो जानने वालों से पूछ लिया करो) तब उन सभी सहाबा ने उन्हें बताया कि अल्लाह के निर्णय तथा तक़दीर पर ईमान लाना अवश्यंभावी है। तक़दीर पर ईमान न रखने वाला बड़ी से बड़ी वस्तु भी खर्च कर दे, तो ग्रहण नहीं की जाएगी तथा तक़दीर पर ईमान रखे बिना मरने वाला जहन्नमी है।