





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
All
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "अल्लाह ने मेरे लिए, मेरी उम्मत के गलती से तथा भूलवश किए हुए और ज़बरदस्ती कराए गए कार्यों को क्षमा कर दिया है।"
इसे इब्न-ए-माजह और बैहक़ी आदि ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि अल्लाह ने आपकी उम्मत से निम्नलिखित तीन परिस्थितियों में होने वाले गुनाहों को माफ़ कर दिया है : 1- ग़लती से होने वाले गुनाह : यानी ऐसे गुनाह जो जान-बूझकर न किए गए हों। मसलन कोई मुसलमान इरादा तो किसी काम का करे, लेकिन उससे हो कुछ और जाए। 2- भूलवश होने वाले गुनाह : यानी किसी मुसलमान को कोई बात याद तो हो, लेकिन जब करने का समय आए, तो भूल जाए। ऐसा होने पर उसे कोई गुनाह नहीं होगा। 3- ज़ोर-ज़बरदस्ती से कराए गए गुनाह : कभी-कभी ऐसा होता है कि इन्सान कोई ऐसा काम करने पर मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह करना नहीं चाहता और उसके पास परिस्थिति का मुक़ाबला करने की शक्ति भी नहीं होती। इस तरह की परिस्थिति में उसे कोई गुनाह नहीं होगा। यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि यह हदीस उन गुनाहों से जुड़ी है जो बंदे और उसके रब से जुड़े हैं। जहाँ तक भूल जाने के कारण किसी आदेशित कार्य को छोड़ देने की बात है, तो इससे उस कार्य की अनिवार्यता समाप्त नहीं हो जाती। इसी प्रकार अगर किसी के भूलवश कोई काम कर देने से किसी सृष्टि का कुछ नुक़सान हो जाए, तो उसकी भरपाई की अनिवार्यता ख़त्म नहीं हो जाती। मसलन कोई ग़लती से किसी इन्सान का क़त्ल कर दे, तो दियत देनी होगी। इसी तरह किसी की गाड़ी का नुक़सान कर दे, तो हर्जाना देना होगा।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मृत्यु हुई तो मेरे घर में कुछ नहीं था, जिसे कोई जानदार खाता। हाँ, मेरे पास एक ताक में थोड़ा-सा जौ रखा हुआ था, जिसे मैं लंबे समय तक खाती रही। (अंत में एक दिन) मैंने उसे नापा तो वह समाप्त हो गया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने बताया है कि जब अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मृत्यु हुई, तो उनके घर में थोड़े-से जौ के अतिरिक्त कुछ नहीं था। इस हदीस में प्रयुक्त शब्द "شَطْرُ شَعير" का अर्थ है थोड़ा-सा जौ है, जैसा कि इमाम तिरमिज़ी ने बताया है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के छोड़े हुए इस थोड़े-से जौ को वह एक अवधि तक खाती रहीं। लेकिन जब उन्होंने उसे नाप लिया, तो वह ख़त्म हो गया। यह हदीस प्रमाण है उस थोड़ी-सी खाने की वस्तु में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्मल- की बरकत जारी रहने का, जब तक उसे नापा नहीं गया था, जो कि अल्लाह पर भरोसा का प्रमाण है। याद रहे कि क्रय-विक्रय के समय नापना वांछनीय है, क्योंकि उससे खरीदने एवं बेचने वालों के अधिकार जुड़े हुए होते हैं। लेकिन ख़र्च करते समय नापना पसंदीदा नहीं है।
सफ़वान बिन मुहरिज़ से रिवायत है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति ने अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से पूछा कि आपने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से (अल्लाह की अपने बंदों से होने वाली) सरगोशी के बारे में क्या कुछ कहते हुए सुना है? उन्होंने उत्तर दिया कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "मोमिन को क़यामत के दिन उसके सर्वशक्तिमान पालनहार के सामने लाया जाएगा, यहाँ तक कि उसपर अपनी ओर से पर्दा डाल देगा और उससे उसके गुनाहों का इक़रार कराते हुए पूछेगा : क्या तुम इस गुनाह को जान रहे हो? क्या तुम (इस गुनाह को) जान रहे हो? वह कहेगा : ऐ मेरे पालनहार! मैं जान रहा हूँ। चुनांचे अल्लाह फ़रमाएगा कि मैंने दुनिया में तुम्हारे इस गुनाह पर पर्दा डाल रखा था और आज मैं उसे तुम्हारे लिए माफ़ करता हूँ। फिर उसे उसकी नेकियों का रजिस्टर दिया जाएगा। रही बात अविश्वासियों एवं मुनाफ़िक़ों की, तो उनके बारे में सारी सृष्टि के सामने इस बात की घोषणा कर दी जाएगी कि इन लोगों ने अल्लाह पर झूठ बाँधा था।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अल्लाह की अपने मोमिन बंदे से होने वाली सरगोशी के बारे में बात करते हुए फ़रमाया है : क़यामत के दिन मोमिन को उसके पालनहार के निकट लाया जाएगा, तो अल्लाह उसपर पर्दा डाल देगा कि उसके छिपे हुए गुनाहों से हश्र के मैदान में एकत्र लोग अवगत न हो सकें। फिर अल्लाह उससे पूछेगा : क्या तुम अमुक और अमुक गुनाह को जानते हो? दरअसल अल्लाह उससे उन गुनाहों का इक़रार करवाएगा, जो बंदा और उसके रब से संबंधित थे। चुनांचे बंदा उत्तर देगा : हाँ, ऐ मेरे पालनहार! मैं इन गुनाहों को जानता हूँ। जब बंदा भयभीत हो जाएगा, तो पवित्र एवं महान अल्लाह उससे कहेगा : मैंने तुम्हारे इन गुनाहों पर दुनिया में पर्दा डाल रखा था और आज उन्हें माफ़ करता हूँ। इसके बाद उसे उसका कर्म पत्र दिया जाएगा। रही बात अविश्वासी एवं मुनाफ़िक़ की, तो उनके बारे में सार्वजनिक रूप से यह एलान किया जाएगा : यही वे लोग हैं, जिन्होंने अपने पालनहार पर झूठ बाँधा था। सुन लो, अल्लाह की लानत है, इन ज़ालिमों पर।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुनाः अल्लाह तआला ने कृपा को सौ भागों में बाँटकर अपने पास निन्यानवे भाग रख लिए और धरती पर एक भाग उतारा। उसी एक भाग के कारण सारी सृष्टियाँ एक-दूसरे पर दया करती हैं, यहाँ तक कि एक चौपाया इस डर से पाँव को उठाए रहता है कि कहीं उसके बच्चे को चोट न लग जाए। तथा एक रिवायत में हैः अल्लाह के पास सौ रहमतें हैं, जिनमें से केवल एक रहमत को जिन्नों, इनसानों, जानवरों और कीड़े-मकोड़ों के बीच उतारा है और उसी के प्रभाव से वे एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, एक-दूसरे पर दया करते हैं और उसी के कारण जंगली जानवर अपने बच्चों को स्नेह एवं प्यार करते हैं। जबकि अल्लाह ने निन्यानवे रहमतें अपने पास रख ली हैं, जिसके नतीजे में वह क़यामत के दिन अपने बंदों पर दया करेगा। तथा सलमान फ़ारसी- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह तआला के पास सौ रहमतें हैं। उनमें से एक रहमत के कारण सारी सृष्टियाँ आपस में एक-दूसरे पर दया करती हैं, जबकि निन्यानवे रहमतें क़यामत के दिन के लिए हैं। तथा एक और रिवायत में हैः अल्लाह तआला ने जिस दिन आकाशों एवं धरती की रचना की, उसी दिन सौ रहमतें पैदा कीं। हर रहमत आकाश और धरती के बीच के खाली स्थान के बराबर है। उनमें से एक रहमत धरती में रख दी, जिसके नतीजे में माँ अपने बच्चे से स्नेह करती है और जंगली जानवर तथा पक्षि एक-दूसरे से प्यार करते हैं। जब क़यामत का दिन आएगा तो अल्लाह उसे इस रहमत के साथ पूरा कर देगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।बरकत वाले एवं उच्च अल्लाह ने दया को एक सौ भाग में बाँटकर एक भाग दुनिया में उतारा और निन्यानवे भाग क़यामत के दिन के लिए अपने पास रख लिया। अतः दया के इसी एक भाग के कारण इनसान, जिन्नता, चोपाए एवं कीड़े-मकोड़े आदि सारी सृष्टियाँ एक-दूसरे पर दया करती हैं। यहाँ तक कि घोड़ा, जो अपने हल्केपन और दौड़-भाग के लिए जाना जाता है, अपने बच्चे को हानि पहुँचाने से बचता है और इस भय से अपने पाँव को उठाए रखता है कि कहीं बच्चा पैर के नीचे न आ जाए। इसी तरह इसी एक भाग के कारण जंगली जानवर अपने बच्चे से प्रेम करते हैं। जबकि उसके निन्यानवे भाग अल्लाह ने अपने पास रख छोड़े हैं, ताकि क़यामत के दिन अपने बंदों पर दया कर सके। दसूरी हदीस : उच्च एवं महान अल्लाह ने जिस दिन आकाशों एवं धरती की रचना की, उसी दिन सौ रहमतें पैदा कीं। हर रहमत इतनी बड़ी है कि आकाश एवं धरती के बीच के स्थान को भर दे। फिर एक रहमत दुनिया में रख दी, जिसके कारण माता अपनी संतान से प्यार करती है और पशु-पक्षी एक-दूसरे से प्यार करते हैं। क़यामत के दिन अल्लाह, जो सारे संसार का पालनहार है, इस एक रहमत को निन्यानवे रहमतों के साथ मिलाकर उसे संपूर्णता प्रदान कर देगा। ज़रा सोचिए कि जब केवल एक रहमत के कारण इस दुनिया में इनसान को इतनी बड़ी-बड़ी नेमतें प्राप्त हैं, तो आख़िरत में, जो कि हमेशा रहने का स्थान है, सौ रहमतें प्राप्त हो जाने के बाद कितना कुछ मिल सकता है?
मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : एक यात्रा में मैं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ था। चलते हुए एक दिन मैं आपसे निकट हो गया, तो मैंने कहा : हे अल्लाह के रसूल! मुझे ऐसा कार्य बताइए जो मुझे जन्नत में प्रवेश दिलाए तथा जहन्नम से दूर कर दे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : “तुमने एक गंभीर प्रश्न पूछा है, परंतु यह उसके लिए आसान है, जिसके लिए अल्लाह आसान बना दे : अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो और अल्लाह के घर का हज करो।" फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : "क्या मैं तुम्हें भलाई के द्वारों के बारे में न बताऊँ? रोज़ा ढाल है, और दान पापों को बुझा देता है, जैसे पानी आग को बुझा देता है, तथा व्यक्ति की रात में अदा की गई नमाज़ (भी भलाई के द्वारों में से एक है)।" तत्पश्चात् आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह आयत पढ़ी : تَتجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ, (उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते हैं, अपने रब को भय एवं आशा के साथ पुकारते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, वह खर्च करते हैं। कोई व्यक्ति नहीं जानता जो कुछ हमने आँखों की ठंडक उनके लिए छुपा रखी है। जो उसी का बदला है, जो किया करते थे।) फिर आप ने फ़रमाया : "क्या मैं तुम्हें दीन की बुनियाद, उसका स्तंभ और उसकी चोटी न बता दूँ? मैंने कहा : अवश्य, हे अल्लाह के रसूल! आपने फ़रमाया : दीन की बुनियाद इस्लाम है, इसका स्तंभ नमाज़ है और इसकी चोटी जिहाद है।" इसके बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा : "क्या मैं तुम्हें इसका सार न बताऊँ?" मैंने कहा : अवश्य, हे अल्लाह के रसूल। तो आपने अपनी जीभ पकड़ी और कहा : “इसे रोके रखो।" मैंने कहा : हे अल्लाह के नबी ! क्या हम जो बोलते हैं, उसपर भी हमारी पकड़ होगी? तो आपने फ़रमाया : "तुम्हारी माँ तुम्हें खो दे! लोगों को उनके चेहरों के बल या उनकी नाकों के बल (जहन्नम में) उनकी जीभों की कमाई के कारण ही तो गिराया जाएगा।”
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैमुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ एक यात्रा में था। एक दिन सुबह के समय चलते हुए मैं आपके निकट पहुँच गया, तो मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे एक ऐसा कार्य बता दीजिए, जो मुझे जन्नत में दाख़िल कर दे और जहन्नम से दूर कर दे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : तुमने मुझसे एक बड़े कार्य के बारे में पूछा है, जिसका पालन करना लोगों पर बड़ा भारी है, किन्तु यह उसपर आसान है जिसके लिए अल्लाह इसे आसान बना दे। इस्लाम के अनिवार्य कर्तव्यों का पालन करो : पहला कर्तव्य : केवल अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को भी साझीदार न बनाओ। दूसरा कर्तव्य : दिन और रात में पाँच फ़र्ज़ नमाज़ें स्थापित करो। यानी फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़्रिब तथा इशा की नमाज़ पढ़ो। इन पाँच नमाज़ों को इनकी शर्तों, स्तंभों और अनिवार्य कार्यों के साथ अदा करो। तीसरा कर्तव्य : फ़र्ज़ ज़कात निकालो। ज़कात एक आर्थिक इबादत है, जो शरीयत द्वारा धन की एक निर्धारित मात्रा पर वाजिब होती है और जिसे उसके हक़दारों को दिया जाता है। चौथा कर्तव्य : रमज़ान के रोज़े रखो। रोज़ा नाम है खाने, पीने और इस तरह की अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह की इबादत की नीयत से रुके रहने का। पाँचवाँ कर्तव्य : अल्लाह की इबादत के लिए मक्का जाकर हज्ज के कार्य संपन्न करो। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : क्या मैं तुम्हें उस मार्ग के बारे में न बताऊँ, जो भलाई के द्वारों तक पहुँचाता है? वह है, अनिवार्य कर्तव्यों के पश्चात नफ़ल इबादतें करना, जो इस प्रकार हैं : पहली नफ़ल इबादत : नफ़ल रोज़ा, जो पापों में पड़ने से रोकता है, क्योंकि रोज़ा इच्छाओं को नियंत्रित करता है तथा बल को कमज़ोर करता है। दूसरी नफ़ल इबादत : नफ़ल स़दक़ा, जो पाप को मिटा देता है, उसे समाप्त कर देता है तथा उसके प्रभाव को ख़त्म कर देता है। तीसरी नफ़ल इबादत : रात के अंतिम तिहाई भाग में रात की नमाज़ पढ़ना। उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : (उनके पहलू दूर रहते हैं सोने के स्थानों से। वह अपने रब को पुकारते हैं) नमाज़, ज़िक्र, तिलावत और दुआ द्वारा (भय एवं आशा के साथ और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से खर्च करते हैं। कोई प्राणी नहीं जानता कि हमने किस प्रकार की आँखों की ठंडक उनके लिए छुपा रखी है), यानी लोग यह नहीं जानते कि हमने उनके कर्मों के बदले में क़यामत के दिन आँखों को ठंडी करने वाली क्या-क्या चीजें और जन्नत में क्या-क्या नेमतें पैदा कर रखी हैं (यह दरअसल बदला है उन कर्मों का, जो वे किया करते थे)। इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : क्या मैं तुमको दीन की बुनियाद, उसका स्तंभ और उसका शीर्ष न बता दूँ? मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने उत्तर दिया : अवश्य, ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : दीन की बुनिया इस्लाम यानी दोनों गवाहियाँ हैं। इनके माध्यम से इन्सान के हाथ में दीन का मूल आधार आ जाता है। उसका मूल स्तंभ नमाज़ है। नमाज़ के बिना इस्लाम का कोई अस्तित्व नहीं है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे स्तंभ के बिना किसी घर का अस्तित्व नहीं होता। जो नमाज़ का पाबंद है, उसका दीन मज़बूत तथा बुलंद है। जबकि इस्लाम का झंडा बुलंद करने का साधन जिहाद और अल्लाह के शब्द को ऊँचा करने के लिए दीन के दुश्मनों से लड़ना है। इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : क्या मैं तुमको एक ऐसी चीज़ न बताऊँ, जिससे उक्त सारी चीज़ें सुदृढ़ और सशक्त हो जाती हैं? आपने अपनी ज़बान पकड़ ली और फ़रमाया : इसपर नियंत्रण रखो और अनावश्यक बातें न करो। मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने पूछा : क्या हमारा पालनहार हमारे द्वारा कही गई बातों पर भी हमारी पकड़ करेगा, हिसाब लेगा और सज़ा देगा? आपने उत्तर दिया : तुम्हारी माँ तुमको गुम पाए। याद रहे कि इस वाक्य से मुराद बद-दुआ नहीं होती। अरब के लोग इस वाक्य का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को किसी ऐसी बात की सूचना देते समय करते, जिससे उसे अवगत होना ही चाहिए था। फिर आपने फ़रमाया: लोगों को उनके मुँह के बल केवल इसलिए घसीटा जाएगा कि वे अपनी ज़बान से अविश्वास पर आधारित शब्द निकालते, गाली-गलौज, चुग़ली एवं दोषारोपण करते हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “निस्संदेह, अल्लाह पवित्र है और केवल पवित्र चीज़ों को ही स्वीकार करता है। अल्लाह ने ईमान वालों को वही आदेश दिया है, जो उसने रसूलों को दिया था। अल्लाह ने फ़रमाया है : يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنْ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا [सूरा अल-मोमिनून : 51] (हे रसूलो! पवित्र चीज़ें खाओ और अच्छे कर्म करो।) और फ़रमाया है : يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ, [सूरा अल-बक़रा : 172] (हे ईमान वालो! हमने तुम्हें जो पवित्र चीज़ें दी हैं, उनमें से खाओ।) फिर एक व्यक्ति का उल्लेख किया, जो लंबी यात्रा करता है, जिसके बाल बिखरे हुए तथा शरीर धूल-धूसरित है, वह अपने हाथ आकाश की ओर उठाता है और कहता है : ‘हे मेरे रब! हे मेरे रब!’ जबकि उसका भोजन हराम का है, उसका पेय हराम का है, उसका वस्त्र हराम का है और उसका पोषण हराम से हुआ है, ऐसे में उसकी दुआ कैसे स्वीकार की जाएगी?”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि अल्लाह पाक एवं पुनीत है, कमियों एवं दोषों से मुक्त तथा हर एतबार से परिपूर्ण है। वह केवल उन्हीं कार्यों, शब्दों और विश्वासों को स्वीकार करता है जो शुद्ध हों और जो केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए और उसके पैगंबर के तरीक़े के अनुसार किए गए हों। अल्लाह की निकटता केवल इसी प्रकार की इबादतों के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए। याद रखें कि अपने कर्मों को शुद्ध करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन हलाल भोजन खाना है। हलाल भोजन खाने से व्यक्ति के कर्म शुद्ध होते हैं। इसीलिए जिस प्रकार अल्लाह ने रसूलों को हलाल भोजन खाने और अच्छे कर्म करने का आदेश दिया, उसी प्रकार उसने ईमान वालों को भी इसका आदेश दिया है। उसका कथन है : (ऐ रसूलो! हलाल चीज़ें खाओ और नेक अमल करो। निःसंदेह मैं वह सब जानता हूं जो तुम करते हो।) [सूरा मोमिनून : 51] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : (ऐ ईमान वालो! हमारी दी हुई हलाल चीज़ें खाओ।) [सूरा बक़रा : 172] फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हराम भोजन करने से सावधान किया। क्योंकि हराम भोजन कर्म को नष्ट कर देता है और उसे अल्लाह के यहाँ क़बूल होने नहीं देता। चाहे क़बूल होने के ज़ाहिरी सबब जितने भी पाए जाएँ। मसलन : 1- किसी नेक काम, जैसे हज, जिहाद और रिश्ते का हक़ अदा करने आदि के लिए लंबा सफ़र करना। 2- इन्सान का परेशान हाल होना। जैसे उसके बाल बिखरे हुए हों और धूल मिट्टी लगने के कारण उसके शरीर और कपड़े का रंग बदला हुआ हो। यह सब कुछ इस बात का प्रमाण है कि आदमी बहुत परेशान है। 3- दुआ के लिए आकाश की ओर हाथ उठाना। 4- अल्लाह के नामों को वसीला बनाना और गिड़गिड़ाकर दुआ करना। मसनल ऐ मेरे रब ! ऐ मेरे रब! कहना। दुआ क़बूल होने के इन कारणों के पाए जाने के बावजूद उसकी दुआ क़बूल नहीं होती। क्योंकि उसका खाना हराम का, उसका पीना हराम का, उसका वस्त्र हराम का है और उसका पालन-पोषण हराम भोजन से हुआ है। ऐसे में उसकी दुआ क़बूल हो भी तो हो कैसे?
मिक़दाद बिन अम्र किंदी रज़यल्लाहु अनहु से रिवायत है कि: उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे बताइए कि अगर मेरा किसी काफ़िर से सामना हो जाए और हम एक-दूसरे से लड़ाई शुरू कर दें तथा वह मेरे एक हाथ पर तलवार मारकर उसे काट दे एवं उसके बाद मुझसे बचने के लिए एक पेड़ की आड़ में छुप जाए और कहने लगे कि मैंने अल्लाह के लिए इस्लाम क़बूल कर लिया, तो क्या मैं ऐसा कहने के बाद उसका क़ल्त कर दूँ? आपने फ़रमाया : "उसे क़त्म मत करो।" मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उसने तो मेरा एक हाथ काट दिया और हाथ काटने के बाद ऐसा कहा? (क्या फिर भी उसे क़त्ल नहीं करना चाहिए?) आपने फ़रमाया : "उसे क़त्ल न करो। अगर तुम उसे क़त्ल कर दोगे, तो वह उस स्थान पर आ जाएगा, जिसपर उसका क़त्ल करने से पहले तुम थे और तुम उस स्थान पर चले जाओगे, जिसपर वह इस वाक्य को कहने से पहले था।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैमिक़दाद बिन असवद रज़ियल्लाहु अनहु ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा कि जब जंग के मैदान में उनका सामना किसी काफ़िर से हो जाए, दोनों अपनी-अपनी तलवार लेकर एक-दूसरे से भिड़ जाएँ, काफ़िर उनके एक हाथ पर तलवार मारकर उसे काट दे, फिर भागकर एक पेड़ की आड़ ले ले और इस बात की गवाही देने के लिए कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत के लायक़ नहीं है, तो क्या मेरे लिए उसका क़त्ल हलाल होगा, जबकि उसने मेरा हाथ काट दिया है? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा : तुम उसका क़त्ल मत करो। उत्तर सुनकर उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उसने मेरा एक हाथ काट दिया, इसके बावजूद मैं उसका क़त्ल न करूँ? आपने कहा : तुम उसका क़त्ल मत करो। क्योंकि अब उसका रक्त बहाना हराम हो चुका है। अगर मुसलमान हो जाने के बाद भी तुम उसका क़त्ल कर दोगे, तो मुसलमान हो जाने के कारण मासूम ठहरा, जबकि उसक़ा क़त्ल करने के कारण क़िसास के तौर पर ख़ुद तुम्हारा ख़ून हलाल हो गया।
उसामा बिन ज़ैद- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें जुहैना क़बीले की हुरक़ा शाखा की ओर भेजा। हम सुब्ह के समय उनके जलस्रोतों पर जा पहुँचे और मैं तथा एक अंसारी सहाबी उनके एक आदमी से जा मिले। जब हमने उसे अपने क़ब्ज़े में ले लिया तो उसने 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कह दिया। यह सुन अंसारी सहाबी ने उससे अपना हाथ रोक लिया, लेकिन मैंने उसपर अपने नेज़े से आक्रमण किया और उसे मार डाला। जब हम मदीना पहुँचे और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को इसकी सूचना मिली तो मुझसे कहाः ऐ उसामा, तुमने उसे 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहने के बाद भी मार दिया? यह बात आपने इतनी बार दोहराई कि मैं कामना करने लगा कि काश! उस दिन से पहले मुसलमान न हुआ होता। तथा एक रिवायत में हैः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः क्या उसने 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहा और तुमने उसे मार डाला? मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! उसने केवल हथियार के डर से कहा था। तो फ़रमायाः तुमने उसका सीना चीरकर क्यों नहीं देखा, ताकि जान लेते कि उसने दिल से कहा था या नहीं? आपने यह बात इतनी बार दोहराई कि मैं कामना करने लगा कि काश उसी दिन मुसलमान हुआ होता! तथा जुनदुब बिन अब्दुल्लाह- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक मुश्रिक क़बीले की ओर एक मुस्लिम सैन्यदल भेजा और दोनों दलों की मुठभेड़ हो गई। मुश्रिकों में एक व्यक्ति था, जब वह किसी मुसलमान को क़त्ल करना चाहता तो उसे मौक़ा पाकर क़त्ल कर देता। यह देख मुसलमानों में से एक व्यक्ति उसकी ग़फ़लत की ताक में रहने लगा। हम आपस में बात करते थे कि यह उसामा बिन ज़ैद हैं। तो जब मौक़ा पाकर उन्होंने उसपर तलवार उठाई, तो उसने 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कह दिया। लेकिन, उन्होंने उसे क़त्ल कर दिया। फिर, जब (युद्ध में विजय प्राप्त होने के बाद) शुभ सूचना देेने वाला अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और आपने उससे हालात पूछे तो उसने सब कुछ बताया। यहाँ तक कि उस व्यक्ति की बात भी सुना दी कि उन्होंने क्या कुछ किया था। यह सुनकर आपने उन्हें बुलाया और इस घटना के संबंध में पूछा। फ़रमायाः तुमने उसका क़त्ल क्यों किया? उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, उसने मुसलमानों को बड़ा कष्ट दिया था और हमारे अमुक एवं अमुक व्यक्ति को मार डाला था। उन्होंने कुछ लोगों के नाम भी गिनाए और कहा कि इसलिए मैंने उसपर आक्रमण कर दिया। जब उसने तलवार देखी, तो 'ला इलाहा इल्लल्लाह' पढ़ दिया। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः क्या तूने उसे मार डाला? उन्होंने कहाः हाँ! आपने फ़रमायाः जब 'ला इलाहा इल्लल्लाह' क़यामत के दिन आएगा, तो तुम उसका क्या करोगे? उन्होंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे लिए क्षमा याचना कीजिए। तो फ़रमायाः जब 'ला इलाहा इल्लल्लाह' क़यामत के दिन आएगा, तो तुम उसका क्या करोगे? आप बार-बार इतना ही कहे जा रहे थे कि जब 'ला इलाहा इल्लल्लाह' क़यामत के दिन आएगा, तो तुम उसका क्या करोगे?
इसे इमाम मुस्लिम ने दोनों रिवायतों के साथ नक़ल किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसामा बिन ज़ैद -रज़ियल्लाहु अनहु- को एक सैन्यदल के साथ जुहैना क़बीले की हुरक़ा शाखा की ओर भेजा। जब यह लोग हुरक़ा वालों के पास पहुँच गए और उनपर हावी हो गए, तो एक मुश्रिक भागने लगा। उसामा एवं एक अंसारी व्यक्ति उसका वध करने के इरादे से उसके पीछे दौड़े और उसके पास पहुँच गए। जब उसे पकड़ लिया गया, तो उसने ला इलाहा इल्लल्लाह कह दिया। यह देख अंसारी ने उसे छोड़ दिया, लेकिन उसामा ने उसका वध कर दिया। जब सब लोग मदीना वापस आए और इसकी सूचना अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मिली, तो उसामा से कहा : "तुमने उसे 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहने के बाद भी मार दिया?" उन्होंने उत्तर दिया कि हाँ ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने ऐसा किया है, क्योंकि उसने ला इलाहा इल्लल्लाह वध किए जाने के भय से कहा था। उसका उद्देश्य इसे ढाल बनाकर क़त्ल से बचना था। लेकिन आपने फिर से यही कहा : "तुमने उसे 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहने के बाद भी मार दिया?" उन्होंने फिर से उत्तर दिया कि उसने ला इलाहा इल्लल्लाह मारे जाने से बचने के लिए कहा था, उसने मुसलमानों को कष्ट पहुँचाया था और अमुक-अमुक मुसलमानों को मार दिया था। यह सुन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनसे कहा : तुमने सच्चाई से अवगत होने के लिए उसके सीने को चीर कर क्यों नहीं देखा? जब क़यामत के दिन ला इलाहा इल्लल्लाह सामने आ खड़ा होगा, तो तुम उसका क्या करोगे? कौन तुम्हारे लिए सिफ़ारिश करेगा? उस समय तुम्हारी ओर से कौन उत्तर देगा, जब कलिमा-ए-तौहीद को लाया जाएगा और तुमसे कहा जाएगा कि इसे कहने वाले व्यक्ति को तुमने कैसे मार डाला? उसामा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : यह सब सुन मैं कामना करने लगा कि काश आज से पहले मैं मुसलमान न हुआ होता! उन्होंने ऐसी कामना इसलिए की, क्योंकि यदि काफ़िर होते और फिर इस्लाम ग्रहण करते, तो अल्लाह माफ़ कर देता। लेकिन उनसे यह काम मुसलमान होने की अवस्था में हुआ था।
अबू बरज़ा असलमी रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "क़यामत के दिन किसी बंदे के पांव उस समय तक नहीं हिलेंगे, जब तक उसकी आयु के बारे में न पूछ लिया जाए कि उसे किस काम में लगाया और उसके ज्ञान के बारे में न पूछ लिया जाए कि उससे क्या किया तथा उसके धन के बारे में न पूछ लिया जाए कि उसे कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया और उसके शरीर के बारे में न पूछ लिया जाए कि उसे कहाँ खपाया?"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि क़यामत के दिन कोई भी व्यक्ति हिसाब के स्थान से जन्नत या जहन्नम की ओर उस समय तक बढ़ नहीं सकेगा, जब तक उससे निम्नलिखित बातें पूछ न ली जाएँ : 1- उसने अपना जीवन किन कार्यों में बिताया है? 2- उसने जो ज्ञान प्राप्त किया था, क्या उसे अल्लाह के लिए प्राप्त किया था, क्या उसपर अमल किया था और क्या उसे उसके हक़दार तक पहुँचाया था? 3- उसके पास जो धन था, उसे कहाँ से कमाया था? कमाई के रास्ते हलाल थे या हराम? साथ ही उसे कहाँ खर्च किया था? अल्लाह की प्रसन्नता के कामों में या अप्रसन्नता के कामों में? 4- उसे जो शरीर, शक्ति, स्वास्थ्य और जवानी मिली थी, उसे किन कामों में खर्च किया था?