





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू मरसद ग़नवी रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क़ब्रों पर मत बैठो और उनकी ओर मुँह करके नमाज़ न पढ़ो।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़ब्रों पर बैठने से मना किया है। इसी तरह उनकी ओर मुँह करके इस तरह नमाज़ पढ़ने से भी मना किया है कि क़ब्र नमाज़ी के क़िबले की दिशा में हो। मना करने का कारण यह है कि यह चीज़ शिर्क की ओर ले जाने वाली चीज़ है।
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हबशा (इथियोपिया) में देखे हुए मारिया नामी एक गिरजाघर और उसके चित्रों का वर्णन किया, तो आपने कहा : "वे ऐसे लोग हैं कि उन लोगों के अंदर जब कोई सदाचारी बंदा अथवा सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें वो चित्र बना देते। वे अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग हैं।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैमुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बताया कि जब वह हबशा में थीं, तो उन्होंने वहाँ मारिया नाम का एक गिरजाघर देखा था, जिसमें बहुत-से चित्र और नक़्श व निगार (सजावट से अलंकृत) थे। दरअसल उन्हें इन बातों पर आश्चर्य हो रहा था। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन चित्रों को गिरजाघरों में रखे जाने का कारण बता दिया। आपने कहा : तुम जिन लोगों का वर्णन कर रही हो, जब उनके समाज का कोई सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र पर मस्जिद बनाकर उसमें नमाज़ पढ़ते और उसके अंदर उनके चित्र रख लेते। आपने आगे बताया कि इस तरह का काम करने वाला व्यक्ति अल्लाह की नज़र में सबसे बुरी सृष्टि है। क्योंकि उसके इस काम से शिर्क के द्वार खुलते हैं।
अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान मास के रोज़े रखना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम को पाँच स्तंभों पर खड़े एक भवन के समान दर्शाया है। याद रहे कि इस्लाम के शेष काम इस भवन के पूरक की भूमिका रखते हैं। इन पाँच स्तंभों में से पहला स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। यह दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक ही स्तंभ की हैसियत रखती हैं। बंदा इनका उच्चारण अल्लाह के एक होने और बस उसी के इबादत का हक़दार होने को स्वीकार करते हुए, उनके तक़ाजों (मांगों) पर अमल करते हुए, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने का विश्वास रखते हुए और आपका अनुसरण करते हुए करेगा। दूसरा स्तंभ नमाज़ स्थापित करना है। दिन और रात में पाँच फ़र्ज़ नमाज़ें हैं। फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब तथा इशा। इन पाँच नमाज़ों को इनकी शर्तों, स्तंभों और अनिवार्य कार्यों के साथ अदा किया जाएगा। तीसरा स्तंभ फ़र्ज़ ज़कात निकालना है। ज़कात एक आर्थिक इबादत है, जो शरीयत द्वारा धन की एक निर्धारित मात्रा पर वाजिब होती है और जिसे उसके हक़दारों को दिया जाता है। चौथा स्तंभ हज है। हज कुछ निश्चित कार्यो को अल्लाह की इबादत के तौर पर करने के लिए मक्का जाने का इरादा करने का नाम है। पाँचवाँ स्तंभ रमज़ान के रोज़े रखना है। रोज़ा नाम है खाने, पीने और इस तरह की अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह की इबादत की नीयत से रुके रहने का।
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैैंनेे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "तुममें से जो व्यक्ति कोई ग़लत काम देखे, वह उसे अपने हाथ से बदल दे। अगर हाथ से बदल नहीं सकता, तो ज़बान से बदले। अगर ज़बान से बदल नहीं सकता, तो अपने दिल से बुरा जाने। यह ईमान की सबसे निचली श्रेणी है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी क्षमता अनुसार बुराई को बदलने का आदेश दे रहे हैं। बुराई से मुराद हर वह कार्य है, जिससे अल्लाह और उसके रसूल ने मना किया है। अगर इन्सान कोई बुराई देखे और उसके पास उसे हाथ से बदलने की शक्ति हो, तो उसके ऊपर उसे हाथ से बदलना वाजिब है। अगर हाथ से बदलने की शक्ति न हो, तो अपनी ज़बान से बदले। इसका तरीक़ा यह है कि उसे करने से मना करे, उसका नुक़सान बताए और उसके बदले में किसी अच्छे काम का उपदेश दे। अगर ज़बान खोलने की भी शक्ति न हो, तो अपने दिल से बदले। यानी उस बुराई को बुरा जाने और इरादा रखे कि अगर उसे बदलने की शक्ति आ जाए, तो बदल देगा। बुराई को बदले के संबंध में दिल से बदलना ईमान की सब से निचली श्रेणी है।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : एक आदमी ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! हमने जो गुनाह जाहिलियत के ज़माने में किए हैं, क्या उनपर हमारी पकड़ होगी? आपने फरमाया : "जिसने इस्लाम की हालत में अच्छे काम किए हैं, जाहिलियत के गुनाहों पर उसकी पकड़ नहीं होगी और जो आदमी इसलाम को त्याग कर दोबारा काफिर हो गया, तो पहले और बाद के सभी गुनाहों की पकड़ होगी।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम में प्रवेश करने की फ़ज़ीलत बताई है। जिसने इस्लाम ग्रहण किया और एक पक्का-सच्चा तथा अच्छा मुसलमान बन गया, उसके जाहिलियत के ज़माने में किए हुए गुनाहों की पकड़ नहीं होगी। इसके विपरीत जिसने इस्लाम ग्रहण करने के बाद इसे त्याग दिया, मसलन मुनाफ़िक़ रहा या अपने दीन का परित्याग कर दिया, उसके इस्लाम लाने के बाद के गुनाहों के साथ-साथ पहले किए हुए गुनाहों की भी पकड़ होगी।
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न करते हुए कहा : इस बारे में आपका क्या कहना है कि अगर मैं पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ूँ, रमज़ान महीने के रोज़े रखूँ तथा हलाल को हलाल एवं हराम को हराम मानकर चलूँ और इससे अधिक कुछ न करूँ, तो क्या मैं जन्नत में प्रवेश कर सकूँगा? आपने उत्तर दिया : "हाँ।" इसपर उसने कहा : अल्लाह की क़सम, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ीं तथा नफ़ल नमाज़ें नहीं पढ़ीं, रमज़ान के रोज़े रखे और नफ़ल रोज़े नहीं रखे, हलाल को हलाल माना और उसपर अमल किया तथा हराम को हराम माना और उससे दूर रहा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।
अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है। चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि ज़ाहिरी शरीर की तहारत (पवित्रता) वज़ू एवं ग़ुस्ल (स्नान) के द्वारा प्राप्त होती है। तहारत नमाज़ की एक शर्त है। अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि अल्लाह की प्रशंसा करना और उसे संपूर्णता पर आधारित गुणों से परिपूर्ण मानना है, इसे कहना क़यामत के दिन वज़न किया जाएगा और यह कर्मों के तराज़ू को भर देगा। सुबहानल्लाह तथा अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि दरअसल अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना और उसे संपूर्णता के ऐसे गुणों से परिपूर्ण मानना है, जो उसके प्रताप के अनुरूप हैं, इन दोनों वाक्यों को कहना और साथ में अल्लाह से प्रेम तथा उसका सम्मान करना, आकाशों एवं ज़मीन के बीच के स्थान को भर देता है। नमाज़ बंदे के लिए नूर है, जो उसके दिल में मौजूद रहता है, उसके चेहरे पर प्रकट होता है, उसकी क़ब्र को रौशन रखता है और दोबारा जीवित होकर उठते समय उसका साथ देगा। सदक़ा बंदे के सच्चे मोमिन होने का प्रमाण है, और उसके मुनाफ़िक़ से अलग होने का प्रमाण है, जो सदक़ा के प्रतिफल पर विश्वास न होने के कारण सदक़ा नहीं करता। सब्र (धैर्य) प्रकाश है। सब्र, अधीर होने और नाराज़ होने से बचने का नाम है। नूर ऐसे प्रकाश को कहते हैं, जिसमें गर्मी और जलाने की विशेषता होती है। जैसे सूरज का प्रकाश। सब्र को नूर इसलिए कहा गया है कि सब्र करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए नफ़्स से लड़ने और उसे उसकी पसंद से रोकने की ज़रूरत होती है। सब्र करने वाला इन्सान हमेशा सच्चाई के आलोकित मार्ग पर चलता रहता है। यहाँ सब्र से मुराद उसके तीनों प्रकार यानी अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से बचते रहना और मुसीबतों तथा दुनिया के हादसों (दुर्घटनाओं) का धैर्य के साथ मुक़ाबला करना है। क़ुरआन की तिलावत और उसमें लिखी हुई बातों का अनुपालन तुम्हारे लिए दलील है। जबकि क़ुरआन पर अमल न करना या उसकी तिलावत न करना तुम्हारे विरुद्ध दलील है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सारे लोग जब नींद से जागते हैं, विभिन्न कार्यों के लिए अपने घरों निकल पड़ते हैं। ऐसे में कुछ लोग अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करके खुद को आग से आज़ाद कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग इससे विचलित हो जाते हैं, गुनाहों में पड़ जाते हैं और आग में प्रवेश करने का सामान करके खुद को विनष्ट कर लेते हैं।
मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे एक गधे पर बैठा हुआ था, जिसका नाम उफ़ैर था। इसी दौरान आपने कहा : "ऐ मुआज़! क्या तुम जानते हो कि बंदों पर अल्लाह का अधिकार क्या है और अल्लाह पर बंदों का अधिकार क्या है?" मैंने कहा : अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते हैं। आपने कहा : "बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न ठहराता हो।" मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को यह सुसमाचार सुना न दूँ? आपने उत्तर दिया : "यह सुसमाचार लोगों को न सुनाओ, वरना लोग भरोसा करके बैठ जाएँगे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदों पर अल्लाह का क्या अधिकार है और अल्लाह पर बंदों का क्या अधिकार है। आपने बताया कि बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे अकेले उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह ऐसे एकेश्वरवादी लोगों को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न बनाते हों। यह सुन मुआज़ रज़ियल्लाह अनहु ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को यह सुसमाचार सुना न दूँ, ताकि वे अल्लाह के इस अनुग्रह पर खुश हो जाएँ? चुनांचे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस भय के देखते हुए उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि कहीं लोग इसी पर भरोसा करके बैठ न जाएँ।
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! दो वाजिब करने वाली चीज़ें क्या हैं? आपने उत्तर दिया : "जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैएक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दो ऐसी बातों के बारे में पूछा, जो जन्नत में प्रवेश या जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करती हैं। आपने उत्तर दिया कि जन्नत अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि केवल एक अल्लाह की इबादत करता हो और किसी को उसका साझी न बनाता हो। जबकि जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि किसी को पूज्य बनाकर, पालनहार समझकर या उसे अल्लाह के नाम तथा विशेषताएँ प्रदान करके उसका साझी बनाता हो।