





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जिसे अपशगुन ने उसके काम से रोक दिया, उसने शिर्क किया।" सहाबा ने कहाः इसका कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) क्या है? फ़रमायाः "उसका कफ़्रफ़ारह यह दुआ हैः "اللهم لا خير إلا خيرك، ولا طَيْرَ إِلَّا طَيْرُكَ ولا إله غيرك" (ऐ अल्लाह, तेरी भलाई के अतिरिक्त कोई भलाई नहीं है, तेरे शगुन के अतिरिक्त कोई शगुन नहीं है और तेरे अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है।)
इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बताया है कि जो अपशगुन के कारण अपने किसी कार्य को करने से, जिसका इरादा कर चुका था, रुक गया, उसने एक तरह से शिर्क किया। जब सहाबा ने आपसे इस बड़े गुनाह के कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) के बारे में पूछा, तो वह दुआ सिखाई, जो यह दर्शाती है के सारे मामले अल्लाह के हाथ में हैं और उसके अतिरिक्त किसी के पास कोई शक्ति नहीं है।
उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने इस बात की गवाही दी कि केवल अल्लाह ही सत्य पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं है, एवं मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं, और ईसा भी अल्लाह के बंदे, उसके रसूल तथा उसका शब्द हैं, जिसे उसने मरयम की ओर डाला था और उसकी ओर से भेजी हुई आत्मा हैं, तथा जन्नत और जहन्नम सत्य हैं, ऐसे व्यक्ति को अल्लाह जन्नत में दाख़िल करेगा, चाहे उसका अमल जैसा भी रहा हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने कलिमा-ए-तौहीद के अर्थ को जानते हुए और उसके तक़ाज़ों (मांगों) पर अमल करते हुए उसका उच्चारण अपनी ज़बान से किया, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में अल्लाह के बंदा और उसके रसूल होने की गवाही दी, ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में अल्लाह के बंदा तथा रसूल होने को स्वीकार किया, और इस बात को भी स्वीकार किया कि अल्लाह ने उनको "كن" शब्द से पैदा किया है और वह अल्लाह की ओर से भेजी गई और उसकी पैदा की हुई एक आत्मा हैं, उनकी माता को यहूदियों द्वारा लगाए गए आरोपों से बरी माना, और इस बात पर विश्वास रखा कि जन्नत तथा जहन्नम दोनों सत्य हैं, दोनों के अस्तित्व पर विश्वास रखा और उनको अल्लाह की नेमतों तथा यातनाओं का स्थान माना और इसी अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हुआ, तो उसका ठिकाना जन्नत होगा, यद्यपि उससे अल्लाह की इबादत में कुछ त्रुटियाँ हुई हों और उसके कुछ गुनाह भी रहे हों।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना : "जो अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी न बनाया होगा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो उससे इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी ठहराया होगा, वह जहन्नम में प्रवेश करेगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जो व्यक्ति इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, उसका ठिकाना जन्नत है, अगरचे उसके कुछ गुनाहों के कारण उसे कुछ यातनाओं का सामना करना पड़े। इसी प्रकार जो व्यक्ति इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में हमेशा रहेगा।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक बात कही है और मैंने एक बात कही है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि वह किसी को अल्लाह का समकक्ष बनाकर पुकार रहा था, वह जहन्नम में प्रवेश करेगा।" जबकि मैंने कहा है : जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि उसने किसी को अल्लाह का समकक्ष बनाकर नहीं पुकारा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने ऐसा कोई काम अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए किया, जिसे केवल अल्लाह के लिए किया जाना ज़रूरी है, जैसे अल्लाह के अलावा किसी और से कुछ माँगा या मसीबत के समय फ़रयाद (प्रार्थना) की और वह इसी अवस्था में मर गया, तो वह जहन्नम जाने वालों में शामिल होगा। जबकि अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु ने आगे कहा है कि जिसकी मृत्यु इस अवस्था में हुई कि उसने किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराया, तो जन्नत में प्रवेश करेगा।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अतिशयोक्ति करने वाले हलाक हो गए।" आपने यह बात तीन बार कही।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बिना ज्ञान और प्रमाण के अपने दीन और दुनिया तथा कथन एवं कर्म में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई शरई सीमा से आगे बढ़ने वाले नाकाम व नामुराद होंगे।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुम) अल्लाह तआला के फ़रमानः (وَقَالُوا لا تَذَرُنَّ آلِهَتَكُمْ وَلا تَذَرُنَّ وَدًّا وَلا سُوَاعًا وَلا يَغُوثَ وَيَعُوقَ وَنَسْرًا) (और उन्होंने कहा, अपने इष्ट-पूज्यों को कदापि न छोड़ो और न वद्द को छोड़ो और न सुवा को और न यग़ूस और न यऊक़ और नस्र को) के बारे में कहते हैंः इस आयत में जो नाम आए हैं, वह दरअसल नूह (अलैहिस्सलाम) के समुदाय के कुछ सदाचारी बंदों के नाम हैं। जब उनकी मृत्यु हो गई, तो शैतान ने उनके समुदाय के दिल में डाला कि जहाँ वे बैठा करते थे, वहाँ उनका बुत बनाकर खड़ा कर दिया जाए तथा इन बुतों को उन्हीं का नाम दे दिया जाए। चुनांचे उन्होंने उसकी बात मान ली। मगर अभी उपासना का आरंभ नहीं हुआ था। लेकिन जब बुत खड़ा करने वाले लोग दुनिया से चल बसे और वास्तविकता को जानने वाले न रहे, तो उनकी पूजा शुरू हो गई।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) इस आयत की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यह पूजित प्रतिमाएँ, जिनके बारे में अल्लाह तआला ने बताया है कि नूह (अलैहिसल्लाम) के द्वारा अपनी क़ौम को इस बात से मना किए जाने के बाद भी कि किसी को अल्लाह का साझी न ठहराना, उनकी क़ौम के लोगों ने आपस में एक-दूसरे को उनकी इबादत जारी रखने की ताकीद की थी, दरअसल उनके कुछ सदाचारी लोगों के नाम हैं। हुआ यह कि नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने शैतान के बहकावे में आकर उनके बारे में अतिशयोक्ति की और उनका चित्र लगा लिया। फिर एक दिन ऐसा आया कि इन चित्रों को बुत में बदल दिया गया और उनकी पूजा आरंभ हो गई।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को मोहलत दी या उसे माफ़ कर दिया, उसे अल्लाह क़यामत के दिन अपने अर्श की छाया के नीचे जगह देगा, जिस दिन उसके (अर्श के) छाया के सिवा कोई छाया नहीं होगी।"
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिसने किसी क़र्ज़दार को मोहलत दी या उसे क़र्ज़ का कुछ भाग माफ़ कर दिया, उसका प्रतिफल यह है कि क़यामत के दिन, जब सूरज बंदों के सरों के निकट आ जाएगा और गर्मी बड़ी सख़्त होगी, अल्लाह उसे अपनी अर्श की छाया के नीचे जगह देगा। उस दिन हालत यह होगी कि छाया उसी को नसीब होगी, जिसे अल्लाह प्रदान करेगा।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसके साथ अल्लाह भलाई का इरादा करता है, उसे मुसीबतों में डालकर आज़माता है।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह जब अपने किसी मोमिन बंदे के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे उसकी जान, माल और परिवार से संबंधित किसी परेशानी में डालकर आज़माता है, क्योंकि इसके नतीजे में बंदा अल्लाह से गिड़गिड़ाकर दुआ करता है, बंदे के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और उसके दर्जे ऊँचे कर दिए जाते हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो बातें मैं तुम्हें बताना छोड़ दूँ, उनके बारे में तुम मुझे मेरे हाल पर रहने दो, क्योंकि तुमसे पहले के लोगों को केवल इसी बात ने विनष्ट किया कि वे अत्यधिक प्रश्न करते और अपने नबियों से मतभेद करते थे। अतः, जब मैं किसी चीज़ से मना करूँ तो उससे बचते रहो और जब किसी चीज़ का आदेश दूँ तो जहाँ तक हो सके, उसका पालन करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि शरीयत के विधान तीन प्रकार के हैं : वो विधान जिनके बारे में ख़ामोशी बरती गई है, वो विधान जो मनाही के रूप में हैं और वो विधान जो आदेश के रूप में हैं। पहला प्रकार : वो विधान जिनके बारे में शरीयत ख़ामोश है। कोई निर्देश नहीं देती। इस प्रकार के विधानों के बारे में इस्लाम का यह उसूल याद रखना चाहिए कि असलन कोई भी चीज़ वाजिब नहीं हुआ करती। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर में इस शंका के कारण कि कहीं आकाश से वाजिब या हराम होने से संबंधित आदेश न उतर आए, किसी ऐसी चीज़ के बारे में प्रश्न करने से बचना ज़रूरी था, जो सामने न आई हो। क्योंकि अल्लाह ने उसे बंदों पर दया के तौर पर छोड़े रखा है। लेकिन आपकी मृत्यु के बाद प्रश्न अगर फ़तवा लेने या दीन के आवश्यक मसायल का ज्ञान प्राप्त करने के इरादे से किया जाए, तो न केवल जायज़ है, बल्कि इसका आदेश दिया गया है। लेकिन प्रश्न अगर बाल की खाल निकालने के इरादे से किया जाए, तो इस हदीस के आलोक में इस तरह से प्रश्न करना मना होगा। क्योंकि इस प्रकार का प्रश्न अंततः उसी प्रकार की परिस्थिति सामने ला सकता है, जो बनी इसराईल के लिए उत्पन्न हो गई थी। हुआ यह था कि उनको एक गाय ज़बह करने का आदेश दिया गया था। ऐसे में अगर कोई भी गाय ज़बह कर देते, तो आदेश का पालन हो जाता, लेकिन उन्होंने बाल की खाल निकालनी शुरू की, तो उनकी परेशानी बढ़ती चली गई। दूसरा : वो विधि-विधान, जिनसे मना किया गया है। इनसे दूर रहने वाले को सवाब मिलेगा और इनमें संलिप्त होने वाले को दंड। अतः इस प्रकार की तमाम चीज़ों से बचना ज़रूरी है। तीरा प्रकार : वो विधि-विधान जिनका आदेश दिया गया है। इनका पालन करने वाले को सवाब मिलेगा, और इन्हें छोड़ने वाले को दंड। अतः इन्हें क्षमता अनुसार करना ज़रूरी है।