





























Hadeeth Cards
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अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सर्वशक्तिमान और महान रब से रिवायत करते हुए फ़रमाया : "निःसंदेह अल्लाह ने नेकियों और गुनाहों को लिख लिया है। फिर उसका विस्तार करते हुए फ़रमाया : जिसने किसी सत्कर्म का इरादा किया और उसे कर नहीं सका, अल्लाह उसके बदले अपने यहाँ एक पूरी नेकी लिख लेता है और अगर इरादे के अनुसार उसे कर भी लिया, तो उसके बदले में अपने पास दस से सात सौ, बल्कि उससे भी अधिक नेकियाँ लिख देता है। और अगर किसी बुरे काम का इरादा किया, लेकिन उसे किया नहीं, तो अल्लाह उसके बदले में भी एक पूरी नेकी लिख देता है और अगर इरादे के अनुसार उसे कर लिया, तो उसके बदले में केवल एक ही गुनाह लिखता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह ने अच्छे कामों और बुरे कामों का निर्धारण किया और उसके बाद दो फ़रिश्तों को बताया कि उनको कैसे लिखें : जिसने कोई अच्छा काम करने का इरादा किया और उसे कर न सका, तब भी उसके लिए एक नेकी लिखी जाती है। अगर उसे कर लिया, तो उसके लिए दस से सात सौ, बल्कि उससे भी अधिक नेकियाँ लिखी जाती हैं। नेकी में यह वृ्द्धि दिल के अंदर मौजूद एख़लास (निष्ठा) और उस कार्य से दूसरों को होने वाले लाभ आदि के अनुसार होती है। इसके विपरीत जिसने कोई बुरा काम करने का इरादा किया और फिर उसे अल्लाह के लिए छोड़ दिया, उसके लिए एक नेकी लिखी जाती है। लेकिन अगर उसे दिलचस्पी न होने के कारण छोड़ा और उसके साधनों पर भी हाथ न लगाया, तो कुछ नहीं लिखा जाता। जबकि अगर सामर्थ्य न होने की वजह से छोड़ा, तो उसकी नीयत को उसके विरुद्ध लिखा जाता है। और अगर उसे कर लिया, तो उसका एक गुनाह लिखा जाता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह तुम्हारे रूप और तुम्हारे धनों को नहीं देखता, बल्कि तुम्हारे दिलों और कर्मों को देखता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह बंदों के रूप-रंग और उनके शरीर को नहीं देखता कि खूबसूरत है या बदसूरत? स्वस्थ है या बीमार? उनके धन को भी नहीं देखता कि कम है या ज़्यादा? सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह इन चीज़ों तथा इनमें उनके कम एवं अधिक होने पर उनकी पकड़ नहीं करता और इनके आधार पर उनका हिसाब नहीं लेता। अल्लाह उनके दिलों और उनमें मौजूद तक़वा, विश्वास, सच्चाई और निष्ठा या फिर दिखावा और प्रसिद्ध होने के इरादे को देखता है। इसी तरह उनके कर्मों को देखता है कि सही हैं या ग़लत और इन्हीं बातों के आधार पर उनको सवाब या दंड देता है।
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : एक दिन हम लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के पास बैठे हुए थे कि अचानक एक व्यक्ति प्रकट हुआ। उसके वस्त्र अति सफ़ेद एवं बाल बहुत काले थे। उसके शरीर में यात्रा का कोई प्रभाव भी नहीं दिख रहा था और हममें से कोई उसे पहचान भी नहीं रहा था l वह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने बैठ गया और अपने दोनों घुटने आपके घुटनों से मिला लिए और दोनों हथेलियाँ अपने दोनों रानों पर रख लीं। फिर बोला : ऐ मुहम्मद! मुझे बताइए कि इस्लाम क्या है? आपने उत्तर दिया : "इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमजान के रोज़े रखो तथा यदि सामर्थ्य हो (अर्थात् सवारी और रास्ते का ख़र्च उपलब्ध हो) तो अल्लाह के घर काबा का हज करो।" उसने कहा : आपने सही बताया। उमर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि हमें आश्चर्य हुआ कि यह कैसा व्यक्ति है, जो पूछ भी रहा है और फिर स्वयं उसकी पुष्टि भी कर रहा है?! उसने फिर कहा : मुझे बताइए कि ईमान क्या क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "ईमान यह है कि तुम विश्वास रखो अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी पुस्तकों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा विश्वास रखो भाग्य पर अच्छी हो या बुरी।" उस व्यक्ति ने कहा : आपने सही फ़रमाया। इसके बाद उसने कहा कि मुझे बताइए कि एहसान क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : "अल्लाह की इबादत इस तरह करो, जैसे तुम उसे देख रहे हो। यदि अल्लाह को देखने की कल्पना उत्पन्न न हो सके तो (कम-से-कम यह ध्यान रहे) कि वह तुम्हें देख रहा हैl" उसने फिर पूछा : मुझे बताइए कि क़यामत कब आएगी? आपने फ़रमाया : "जिससे प्रश्न किया गया है वह (इस विषय में) प्रश्न करने वाले से अधिक नहीं जानता।" उसने कहा : तो फिर मुझे क़यामत की निशानियाँ ही बता दीजिए? आपने कहा : "क़यामत की निशानी यह है कि दासियां अपने मालिक को जन्म देने लगें और नंगे पैर, नंगे बदन, निर्धन और बकरियों के चरवाहे, अपने ऊँचे-ऊँचे महलों पर गर्व करने लगें।" (उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैंं कि) फिर वह व्यक्ति चला गया। जब कुछ क्षण बीत गए तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : "ऐ उमर! क्या तुम जानते हो कि यह सवाल करने वाला व्यक्ति कौन था?" मैंने कहा : अल्लाह और उसके रसूल ही भली-भाँति जानते हैं। तो आपने फरमाया : "यह जिबरील (अलैहिस्सलाम) थे, जो तुम्हें तुम्हारा धर्म सिखाने आए थे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैउमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि जिबरील अलैहिस्सलाम सहाबा के पास एक अनजान व्यक्ति का रूप धारण करके आए। उनकी कुछ विशेषताएँ इस प्रकार थीं कि उनके वस्त्र अति सफ़ेद एवं बाल बहुत काले थे। उनके शरीर पर यात्रा का कोई प्रभाव, जैसे थकावट, धूल-मिट्टी, बालों का बिखरा हुआ होना और कपड़ों का मैला-कुचैला होना आदि नहीं दिख रहा था। वहाँ उपस्थित कोई व्यक्ति उनको पहचान भी नहीं पा रहा था। उस समय सहाबा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बैठे हुए थे। वह आपके सामाने एक विद्यार्थी की तरह बैठ गए और इसके बाद आपसे इस्लाम के बारे में पूछा, तो आपने जो जवाब दिया, उसमें दोनों गवाहियों का इक़रार, पाँच वक़्तों की नमाज़ों की स्थापना, ज़कात उसके हक़दारों को देना, रमज़ान मास के रोज़े रखना और सामर्थ्य रखने वाले के लिए अल्लाह के घर काबा का हज करना शामिल था। जवाब सुन पूछने वाले ने कहा : आपने सच कहा है। इसपर सहाबा को आश्चर्य हुआ कि इनका पूछना यह दर्शा रहा है कि वह जानते नहीं हैं, लेकिन फिर वह आपकी बात की पुष्टि भी कर रहे हैं। फिर उन्होंने आपसे ईमान के बारे में पूछा, तो आपने जो जवाब दिया, उसमें ईमान के छह स्तंभों पर विश्वास रखना शामिल है, जो इस प्रकार हैं : अल्लाह के अस्तित्व और उसके गुणों पर विश्वास रखना, उसे अपने कार्यों जैसे सृष्टि करना आदि में अकेला मानना और एकमात्र उसी को इबादत का हक़दार जानना, इस बात पर विश्वास रखना कि फ़रिश्ते, जिनको अल्लाह ने नूर से पैदा किया है, उसके सम्मानित बंदे हैं, जो अल्लाह की अवज्ञा नहीं करते तथा उसके आदेशों का पालन करते हैं, अल्लाह की ओर से रसूलों पर उतरने वाली किताबों, जैसे क़ुरआन, तौरात और इंजील आदि पर विश्वास रखना, इन्सानों को अल्लाह का दीन पहुँचाने वाले रसूलों, जैसे नूह, इबराहीम, मूसा, ईसा और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, पर विश्वास रखना, आख़िरत के दिन पर विश्वास रखना, जिसमें मौत के बाद की बरज़ख़ी ज़िंदगी के साथ-साथ इस बात पर विश्वास भी शामिल है कि इन्सान को मौत के बाद दोबारा जीवित करके उठाया जाएगा और उसका हिसाब व किताब होगा, जिसके बाद उसका ठिकाना या तो जन्नत होगा या फिर जहन्नम तथा इस बात पर विश्वास रखना कि अल्लाह ने अपने पूर्व ज्ञान और अपनी हिकमत के अनुसार सारी चीज़ों का अंदाज़ा करके उनको लिख रखा है और बाद में वह सारी चीज़ें उसके इरादे से उसके अंदाज़े के मुताबिक़ ही सामने आती हैं और वही उनकी रचना भी करता है। फिर उन्होंने आपसे एहसान के बारे में पूछा, तो आपने बताया कि एहसान यह है कि इन्सान अल्लाह की इबादत इस तरह करे, गोया वह अल्लाह को देख रहा है। अगर वह इस स्थान तक पहुँच न सके, तो अल्लाह की इबादत यह सोचकर करे कि अल्लाह उसे देख रहा है। पहला स्थान दर्शन का है। यह सबसे ऊँचा स्थान है। जबकि दूसरा स्थान ध्यान में रखने का है। फिर उन्होंने आपसे पूछा कि क़यामत कब आएगी, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि क़यामत कब आएगी, यह बात उन बातों में से है, जिनको अल्लाह ने किसी को नहीं बताया है। अतः इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। न जिससे पूछा गया है, उसके पास और न पूछने वाले के पास। फिर उन्होंने आपसे क़यामत की निशानियों के बारे में पूछा, तो आपने बताया कि उसकी एक निशानी यह है कि दासियों तथा उनकी संतानों की बहुलता होगी या फिर यह कि बच्चे अपनी माताओं की बहुत ज़्यादा अवज्ञा करने लगेंगे और उनके साथ दासियों जैसा व्यवहार करेंगे। दूसरी निशानी यह है कि आख़िरी ज़माने में बकरियों के चरवाहों तथा निर्धन लोगों को बड़ी मात्रा में धन प्रदान किए जाएँगे और वे सुंदर तथा मज़बूत भवनों के माले में एक-दूसरे पर अभिमान करेंगे। अंत में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि पूछने वाले जिबरील थे, जो सहाबा को इस्लाम सिखाने के लिए आए थे।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने हमारे इस दीन में कोई ऐसी नई चीज़ बनाली, जो उसका हिस्सा नहीं है, तो वह ग्रहणयोग्य नहीं है।" (सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम) सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके संबंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह ग्रहणयोग्य नहीं है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने दीन के अंदर कोई नई चीज़ बनाई या ऐसा कोई काम किया, जो क़ुरआन एवं हदीस से प्रमाणित न हो, तो उसे उसी के मुँह पर मार दिया जाएगा और वह अल्लाह के यहाँ क़बूल नहीं किया जाएगा।
अबूज़र रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने बरकत वाले और महान रब से रिवायत करते हैं कि उसने कहा है : "ऐ मेरे बंदो! मैंने अत्याचार को अपने ऊपर हराम कर लिया है और उसे तुम्हारे बीच हराम किया है, अतः तुम एक-दूसरे पर अत्याचार न करो। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग पथभ्रष्ट हो, सिवाय उसके जिसे में मार्ग दिखा दूँ, अतः मुझसे मार्गदर्शन मांगो करो, मैं तुम्हें सीधी राह दिखाऊँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग भूखे हो, सिवाय उसके जिसे मैं खाना खिलाऊँ, अतः मुझसे भोजन माँगो, मैं तुम्हें खाने को दूँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग नंगे हो, सिवाय उसके जिसे मैं कपड़ा पहनाऊँ, अतः मुझसे पहनने को कपड़े माँगो, मैं तुम्हें पहनाऊँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम रात-दिन त्रुटियाँ करते हो और मैं तमाम गुनाहों को माफ़ करता हूँ, अतः मुझसे क्षमा माँगो, मैं तुम्हें क्षमा करूँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम मुझे नुक़सान पहुँचाने के पात्र नहीं हो सकते कि मुझे नुक़सान पहुँचाओ और मुझे नफ़ा पहुँचाने के पात्र भी नहीं हो सकते कि मुझे नफ़ा पहुँचाओ। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा इनसान और जिन्न तुम्हारे अंदर मौजूद सबसे आज्ञाकारी इनसान के दिल पर जमा हो जाएँ, तो इससे मेरी बादशाहत में तनिक भी वृद्धि नहीं होगी। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा तुम्हारे इनसान और जिन्न तुम्हारे अंदर मौजूद सबसे पापी इंसान के दिल पर जमा हो जाएँ, तो भी इससे मेरी बादशाहत में कोई कमी नहीं आएगी। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा इनसान और जिन्न एक ही मैदान में खड़े होकर मुझसे माँगें और मैं प्रत्येक को उसकी माँगी हुई वस्तु दे दूँ, तो ऐसा करने से मेरे ख़ज़ाने में उससे अधिक कमी नहीं होगी, जितना समुद्र में सूई डालकर निकालने से होती है। ऐ मेरे बंदो! यह तुम्हारे कर्म ही हैं, जिन्हें मैं गिनकर रखता हूँ और फिर तुम्हें उनका बदला भी देता हूँ। अतः, जो अच्छा पाए, वह अल्लाह की प्रशंसा करे और जो कुछ और पाए, वह केवल अपने आपको कोसे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि पवित्र एवं महान अल्लाह ने कहा है कि उसने अपने ऊपर अत्याचार को हराम कर लिया है और उसे अपनी सृष्टियों के लिए भी हराम कर दिया है, अतः कोई किसी पर अत्याचार न करे। अल्लाह ने कहा है कि सारे इन्सान सत्य के मार्ग से भटके हुए हैं, सिवाय उसके जिसे वह सत्य का मार्ग दिखाए और सत्य के रास्ते पर चलने का सुयोग प्रदान करे। जो अल्लाह से सत्य के मार्ग पर चलने का सुयोग माँगता है, उसे अल्लाह यह सुयोग प्रदान करता है। अल्लाह ने कहा है कि सारे इन्सान अपनी तमाम ज़रूरतों के लिए अल्लाह के मोहताज हैं और जो अल्लाह से ज़रूरतें पूरी करने की दुआ करता है, अल्लाह उसकी ज़रूरतें पूरी कर देता है। अल्लाह ने कहा है कि सारे इन्सान दिन-रात गुनाह करते हैं और अल्लाह उनके गुनाहों पर पर्दा डालता है तथा क्षमा माँगने पर क्षमा भी करता है। अल्लाह ने कहा है कि इन्सान अल्लाह को न तो हानि पहुँचा सकते हैं और न उसे लाभ पहुँचा सकते हैं। अल्लाह ने कहा है कि सारे इन्सान अगर उनके अंदर मौजूद सबसे धर्मशील व्यक्ति के दिल पर एकत्र हो जाएँ, तो उनकी इस धर्मशीलता से अल्लाह की बादशाहत में कोई वृद्धि नहीं होगी। इसी तरह अगर सारे इन्सान उनके अंदर मौजूद सबसे गुनहगार व्यक्ति के दिल पर एकत्र हो जाएँ, तो उनके गुनहगार हो जाने से अल्लाह की बादशाहत में कोई कमी नहीं आएगी। क्योंकि इन्सान कमज़ोर तथा हर हाल, हर ज़माने और हर स्थान में अल्लाह के मोहताज हैं, जबकि अल्लाह पाक बेनियाज़ और निस्पृह है। अल्लाह ने कहा है कि अगर सारे इन्सान और सारे जिन्न, पहले के भी और बाद के भी, एक ही स्थान में जमा हो जाएँ और अल्लाह से माँगने लगें और अल्लाह हर एक की झोली भर दे, तो इससे अल्लाह के ख़ज़ाने में कोई कमी नहीं आएगी। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह समुद्र में एक सूई डालकर निकाल लेने से समुद्र के पानी में कोई कमी नहीं होती। ऐसा इसलिए कि अल्लाह निस्पृह है। अल्लाह ने कहा है कि वह बंदों के कर्मों को सुरक्षित तथा उनके लिए गिनकर रखता है और वह क़यामत के दिन उनको उनके कर्मों का प्रतिफल देगा। ऐसे में जो अपने कर्मों का प्रतिफल अच्छा पाए, वह अल्लाह का शुक्र अदा करे कि उसने उसे नेकी के काम करने का सुयोग प्रदान किया और जो अपने कर्मों का प्रतिफल इससे भिन्न पाए, वह अपने बुराई का आदेश देने वाले नफ़्स को कोसे, जो उसे नाकामी की ओर ले गया।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैं एक दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे सवार था कि इसी बीच आपने कहा : "ऐ बच्चे! मैं तुम्हें कुछ बातें सिखाना चाहता हूँ। अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा। अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब माँगो, तो अल्लाह से माँगो और जब मदद तलब करो, तो अल्लाह से तलब करो। तथा जान लो, यदि पूरी उम्मत तुम्हें कुछ लाभ पहुँचाने के लिए एकत्र हो जाए, तो तुम्हें उससे अधिक लाभ नहीं पहुँचा सकती, जितना अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है। तथा यदि सब लोग तुम्हारी कुछ हानि करने के लिए एकत्र हो जाएँ, तो उससे अधिक हानि नहीं कर सकते, जितनी अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिखा है। क़लम उठा ली गई है और पुस्तकें सूख चुकी हैं।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा बता रहे हैं कि वह छोटे थे और एक दिन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे सवारी पर बैठे हुए थे कि आपने कहा : मैं तुम्हें कुछ बातें सिखाऊँगा, जिनसे अल्लाह तुम्हें फ़ायदा पहुँचाएगा : अल्लाह के आदेशों की रक्षा करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहकर इस तरह अल्लाह की रक्षा करो कि वह तुमको नेकी और अल्लाह से निकट करने वाले कामों में पाए, अवज्ञाकारियों और गुनाहों में न पाए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो बदले में अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत की अप्रिय चीज़ों से तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम जहाँ भी जाओगे, हर काम में तुम्हारी मदद करेगा। जब कुछ माँगना हो, तो केवल अल्लाह से माँगो। क्योंकि वही माँगने वालों की मुरादें पूरी करता है। जब मदद तलब करनी हो, तो केवल अल्लाह से तलब करो। तुम्हारे दिल में इस बात का विश्वास होना चाहिए कि अगर धरती के ऊपर मौजूद सारे लोग तुम्हारा भला करना चाहें, तो उतना ही कर सकते हैं, जितना अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिख रखा है और धरती पर बसने वाले सारे लोग तुम्हारा बुरा करना चाहें, तो उससे ज़्यादा नहीं कर सकते, जितना अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिख रखा है। इन सारी बातों को अल्लाह ने अपनी हिकमत तथा ज्ञान के तक़ाज़े के अनुसार लिख रखा है और अल्लाह के लिखे में कोई बदलाव संभव नहीं है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मेरी उम्मत के सारे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे, सिवाय उसके, जो इनकार करेगा।" कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! भला इनकार कौन करेगा? तो फ़रमाया : "जो मेरे आदेशों का पालन करेगा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो मेरी अवज्ञा करेगा, वही इनकार करने वाला होगा।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि आपकी पूरी उम्मत जन्नत में जाएगी, सिवाय उसके जो खुद मना कर दे। यह सुन सहाबा ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! भला मना कौन करेगा?! इसका उत्तर देते हुए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : जिसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण किया, वह जन्नत में जाएगा और जिसने अवज्ञा की तथा शरीयत का पालन करने से भागा, उसने अपने बुरे कर्म द्वारा जन्नत में जाने से इनकार कर दिया।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो किसी समुदाय से अनुरूपता ग्रहण करे, वह उसी में से है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जो किसी अविश्वासी, अवज्ञाकारी अथवा सत्कर्मी समुदाय की समरूपता धारण करेगा, यानी अक़ायद (आस्थाओं), इबादतों या रीति-रिवाजों से संबंधित उनकी किसी विशिष्टता को अपनाएगा, उसकी गिन्ती उसी में होगी। क्योंकि प्रत्यक्ष समरूपता आंतरिक समरूपता का कारण बनती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी समुदाय की समरूपता धारण करना उस समुदाय के मानसिक प्रभाव का नतीजा हुआ करता है और यह चीज़ उनसे प्रेम, उनके सम्मान और उनकी ओर झुकाव का कारण भी बन सकती है। चुनांचे इसके नतीजे में कभी-कभी आंतरिक और इबादत तक में उनकी समरूपता तक बात बहुँच जाती है।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा कि सबसे बड़ा गुनाह क्या है? तो फ़रमाया : "यह है कि तुम अल्लाह का साझी बनाओ, हालाँकि उसी ने तुम को पैदा किया है।" मैंने कहा : निस्संदेह यह एक बहुत बड़ा गुनाह है। मैंने कहा : फिर कौन-सा? फ़रमाया : "फिर यह कि तुम अपनी संतान को इस भय से मार डालो कि वह तुम्हारे साथ खाएगी।" मैंने कहा : फिर कौन-सा? तो फ़रमाया : "फिर यह कि तुम अपने पड़ोसी की पत्नी से दुष्कर्म करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि सबसे बड़ा गुनाह क्या है? तो आपने कहा : सबसे बड़ा गुनाह सबसे बड़ा शिर्क है। शिर्क नाम है किसी को पूज्य एवं रब मानने या नामों एवं गुणों में अल्लाह के समान या समकक्ष बनाने का। इस गुनाह को अल्लाह तौबा के बिना माफ़ नहीं करेगा। अगर कोई व्यक्ति शिर्क में संलिप्त होकर मर गया तो हमेशा जहन्नम में रहेगा। उसके बाद दूसरा बड़ा गुनाह है अपनी संतान का इस भय से क़त्ल करना कि वह साथ में खाएगी। वैसे तो किसी की अवैध हत्या बहुत बड़ा पाप है। लेकिन पाप उस समय और बड़ा हो जाता है, जब मरने वाले का मारने वाले से रिश्ता हो। फिर, यह गुनाह उस समय और भी विशाल हो जाता है, जब हत्या इस भय से की जाए कि यदि वह जीवित रहा, तो हत्यारा के साथ अल्लाह की दी हुई रोज़ी खाएगा। इस हदीस में बताया गया तीसरा बड़ा गुनाह यह है कि आदमी अपने पड़ोसी की पत्नी को बहला-फुसलाकर राज़ी कर ले और उसके साथ दुष्कर्म करे। वैसे तो व्यभिचार हराम है, लेकिन इसका गुनाह उस समय और बढ़ जाता है, जब व्यभिचार पड़ोसी जिसके साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया गया है उसकी पत्नी के साथ किया जाए।