





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "एक मर्द दूसरे मर्द के गुप्तांग और एक महिला दूसरी महिला के गुप्तांग को न देखे और न ही दो मर्द एक ही कपड़े में लेटें और न दो महिलाएँ एक कपड़े में लेटें।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात से मना किया है कि कोई मर्द किसी मर्द के शरीर छिपाने योग्य भाग को देखे या कोई औरत किसी औरत के शरीर के छुपाने योग्य भाग को देखे। हदीस में आए हुए शब्द "العورة" से मुराद इन्सान के शरीर का वह भाग है, जिसके खुल जाने पर हया आती हो। पुरुष के शरीर का इस तरह का भाग नाफ़ से घुटने तक है। जबकि औरत का पूरा शरीर अजनबी मर्दों के लिए छुपाने योग्य है। अलबत्ता, एक औरत अन्य औरतों एवं महरमों के सामने शरीर के उन अंगों को खोल सकती है, जो घर में काम करते समय आम तौर पर खुल जाया करते हैं। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात से मना किया है कि कोई मर्द दूसरे मर्द के साथ नंगा होकर एक कपड़े में या एक चादर के नीचे रहे या फिर कोई औरत दूसरी औरत के साथ एक कपड़े में या एक चादर के नीचे नंगी होकर रहे। क्योंकि यह एक-दूसरे के गुप्तांग को छूने का सबब बन सकता है और छूना भी देखने ही की तरह मना है। बल्कि उसकी मनाही कहीं अधिक सख़्त है, क्योंकि इससे कहीं ज़्यादा बड़ी बुराइयाँ सामने आ सकती हैं।
इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से मरफ़ूअन रिवायत है: सोते समय अपने घरों में आग जला कर न छोड़ो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।हदीस का अर्थ : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी उम्मत को इस बात से मना कर रहे हैं कि वे जलाई हुई आग को बुझाने से पहले सो जाएँ।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: घंटी शैतान का भजन है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि जानवरों के गले में बाँधी जाने वाली घंटियाँ शैतानी उपकरण हैं, जिनमें लोगों में व्यस्त करके वह उन्हें उनकी रचना के उद्देश्य से भटकाए रखना चाहता है। रही बात सूचना प्रदान करने वाली घंटियों की, तो सऊदी अरब की स्थायी फ़तवा कमेटी ने उनके बारे में कहा है : "घरों एवं शिक्षण संस्थानों में इस्तेमाल में आने वाली घंटियां जायज़ हैं, जब तक उनके अंदर कोई अवैध वस्तु न पाई जाए। मसलन उनका ईसाइयों के नाक़ूस के जैसा होना या संगीत की तरह आवाज़ देना आदि। अगर यह बात पाई जाए, तो हराम होंगी।"
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब तेज़ हवाएँ चलतीं तो यह दुआ पढ़ा करते थे: «اللَّهُمَّ إنِّي أسْأَلُك خَيرها وخير ما فيها وخَير ما أُرسِلت به، وأعوذ بك من شرِّها وشرِّ ما فيها وشرِّ ما أُرسِلت به» अर्थात, “ऐ अल्लाह ! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें में रखी गई है और उस बुराई से जिस के साथ यह भेजी गई है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बताती हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की आदत यह थी कि जब आँधी आती, तो यह दुआ पढ़ते : "ऐ अल्लाह ! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें में रखी गई है और उस बुराई से जिसके साथ यह भेजी गई है।" अल्लाह की पैदा की गई वायु के दो प्रकार हैं : पहला : साधारण वायु, जो डरावनी न हो। इसके लिए कोई नियुक्त ज़िक्र नहीं है। दूसरा : तेज़ चलने वाली वायु, जो डरावनी हो। क्योंकि अल्लाह ने आद समुदाय को बाँझ आँधी द्वारा हलाक कर दिया था। अतः जब आँधी आए, तो यह दुआ पढ़ लिया करो, जो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पढ़ा करते थे : "ऐ अल्लाह ! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ।" इसके माध्यम से अल्लाह से इस वायु की भलाई माँगो और वह अपने अंदर लाभ के रूप में जो भलाई रखती है, उसे माँगो। क्योंकि उसे कभी तो भलाई के साथ भेजा जाता है और कभी बुराई के साथ। अतः उसे जिन बातों के साथ भेजा गया है, उनकी भलाई माँगो। "और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें में रखी गई है और उस बुराई से जिसके साथ यह भेजी गई है।" यानी तुम अल्लाह की शरण माँगों उसकी बुराई से, वह जो कुछ अपने साथ रखती है उसकी बुराई से और उसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी बुराई से। क्योंकि आँधी कभी-कभी किसी समुदाय के लिए यातना के रूप में आती है, अतः उसे उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगनी चाहिए। जब इन्सान उसकी बुारई से, उसके साथ जो कुछ है उसकी बुराई से और उसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगता है, तो उसे अल्लाह उसकी बुराई से बचाता है और उसकी भलाई से लाभान्वित होने का अवसर देता है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना है: हवा अल्लाह की रहमत है। कभी रहमत और कभी यातना लेकर आती है। तो जब तुम उसे देखो, गाली मत दो, बल्कि अल्लाह से उसकी भलाई माँगो और उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगो।
इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।वायु बंदों पर अल्लाह की एक अनुकंपा है, जो कभी अनुकंपा के साथ आती है और कभी यातना के साथ। अल्लाह वायु को अपने बंदों के लिए अनुकंपा के रूप में भेजता है और उसके ज़रिए लोगों को भलाई एवं बरकत प्राप्त होती है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "और हमने जलभरी वायुओं को भेजा।" एक अन्य स्थान पर उसका फ़रमान है : "अल्लाह ही है, जो वायुओं को भेजता है। फिर वह बादल उठाती हैं। फिर वह उसे फैलाता है आकाश में जैसे चाहता है, और उसे घंघोर बना देता है। तो तुम देखते हो बूंदों को निकलते उसके बीच से।" एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और वही है, जो अपनी दया (वर्षा) से पहले वायुओं को (वर्षा) की शुभ सूचना देने के लिए भेजता है और जब वे भारी बादलों को लिए उड़ती हैं, तो हम उसे किसी निर्जीव धरती को (जीवित) करने के लिए पहुँचा देते हैं, फिर उससे जल वर्षा कर, उसके द्वारा प्रत्येक प्रकार के फल उपजा देते हैं।" जबकि कभी यातना के साथ आती है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "अन्ततः, हमने भेज दी उनपर प्रचण्ड वायु, कुछ अशुभ दिनों में। ताकि उन्हें अपमानकारी यातना का स्वाद चखाएं सांसारिक जीवन में।" एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "हमने भेज दी उनपर कड़ी आँधी, एक निरन्तर अशुभ दिन में। जो उखाड़ रही थी लोगों को, जैसे वे खजूर के खोखले तने हों।" एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "उन लोगों ने कहा : ये एक बादल है, हमपर बरसने वाला। बल्कि ये वही है, जिसकी तुमने जल्दी मचाई है। ये आंधी है, जिसमें दुखदायी यातना है।" अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुम उसे देखो, तो उसे गाली मत दो।" अतः किसी मुसलमान के लिए वायु को गाली देना जायज़ नहीं है। क्योंकि वह अल्लाह की एक सृष्टि है, उसके आदेश से चलती है और उसका अपना कोई प्रभाव नहीं होता। अल्लाह के आदेश के बिना न किसी का लाभ कर सकती है, न हानि। अतः उसे गाली देना दरअसल उसके सृष्टिकर्ता एवं संचालक यानी उच्च एवं महान अल्लाह को गाली देना होगा। आगे फ़रमाया : "अतः अल्लाह से उसकी भलाई माँगों और उसकी बुराई से उसी की शरण माँगो।" वायु को गाली देने से मना करने के बाद आपने अपनी उम्मत को निर्देश दिया कि अल्लाह से उसकी भलाई माँगें और उसकी बुराई से उसकी शरण माँगें। यानी अल्लाह से दुआ करें कि वायु के अंदर जो भलाई है, वह उनको प्रदान करे और उसके अंदर जो बुराई है, उसे उनसे दूर रखे।
बुरैदा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मुनाफ़िक़ को सैयद (मालिक, आक़ा, सरदार) मत कहो, क्योंकि यदि वह सैयद है, तो तुमने अपने रब को नाराज़ किया।
इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस का अर्थ यह है कि यदि मुनाफ़िक़ अपनी जाति का सरदार हो और तुमने उसे 'सैयद' के लक़ब से पुकारा, तो तुमने अल्लाह को नाराज़ कर दिया। क्योंकि इस लक़ब से उसे पुकारने का मतलब उसका सम्मान करना है और मुनाफ़िक़ सम्मान का हक़दार नहीं है। इसके विपरीत यदि वह अपने जाति का सरदार न हो और तुमने उसे 'सैयद' कहा, तो तुमने झूठ और सत्य के विपरीत बात कही। अतः दोनों परिस्थितियों में मुनाफ़िक़ के लिए 'सैयद' शब्द बोलना मना है। इसी तरह काफ़िर, अवज्ञाकारी और बिदअती के लिए भी इस शब्द का प्रयोग मना है। यह लोग इस लक़ब के हक़दार हैं ही नहीं। इस मनाही में सहाबा भी आते हैं और उनके बाद के लोग भी। याद रहे कि सहाबा के ज़माने में मुनाफ़िक़ दो प्रकार के थे। पहला : ऐसे मुनाफ़िक, जिन्हें केवल अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आपके भेद से अवगत सहाबी हुज़ैफ़ा -रज़ियल्लाहु अनहु- जानते थे। दूसरा : ऐसे मुनाफ़िक़, जिनके निफ़ाक़ से सहाबा गण अवगत थे। जैसे अब्दुल्लाह बिन उबइ और उस जैसे लोग। इसी प्रकार के निफ़ाक़ पर यह हदीस लागू होती है।
ज़ैद बिन अरक़म (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: इन शौच के स्थानों में शैतान तथा जिन्न उपस्थित रहते हैं। अतः, जब तुममें से कोई शौच के स्थान में आए, तो यह दुआ पढ़े: أعوذُ باللهِ مِنَ الخُبُثِ والخَبَائث अर्थात, मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों (की बुराइयों से) से अल्लाह की शरण में आता हूँ।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।शौच के स्थान में जिन्न एवं शैतान उपस्थि रहते हैं और इस प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं कि इन्सान को कष्ट दे सकें और उसके अंदर बिगाड़ पैदा कर सकें। क्योंकि यह ऐसा स्थान है, जहाँ शरीर के गुप्त अंगों को खोला जाता है और उसमें अल्लाह का नाम भी नहीं लिया जाता। अतः जब कोई मुसलमान शौच के स्थान में पहुँचे, तो यह दुआ पढ़े : "أعوذُ باللهِ مِنَ الخُبُثِ والخَبَائث" यानी मैं तमाम शैतानों, चाहे वह पुरुष हों या स्त्री, की बुराई से अल्लाह की शरण एवं रक्षा में आता हूँ।
अनस- रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है वह कहते हैं कि उन लोगों (सहाबा) के समीप अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अधिक प्रिय कोई भी नहीं था, (इसके बावजूद) वह लोग आप को देख कर खड़े नहीं होते थे क्योंकि वह जानते थे कि अल्लाह के रसूल (-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-) इस से घृणा करते हैं।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।इस हदीस में अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि सहाबा के निकट अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से प्रिय कोई नहीं था। लेकिन इस अत्याधिक प्रेम के बावजूद जब वे अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को आते हुए देखते तो आपके स्वागत में खड़े नहीं होते थे। क्योंकि उन्हें पता था कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने लिए किसी के खड़े होने को अप्रिय जानते हैं।
अबू जुहैफा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास था कि आपने एक व्यक्ति से, जो आपके निकट था, फ़रमायाः "मैं टेक लगाकर नहीं खाता।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।इस हदीस में अबू जुहैफ़ा वह्ब बिन अब्दुल्लाह सुवाई -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का तरीक़ा यह नहीं था कि टेक लगाकर खाना खाएँ। मसलन अपने एक पहलू को तकिया आदि पर रखकर उसके सहारे बैठें या एक हाथ को ज़मीन पर रखकर उसका सहारा लें। आप इस तरह बैठने से परहेज़ करते थे। क्योंकि इस तरह बैठना अधिक भोजन करने का तक़ाज़ा करता है, जो कि भारीपन एवं सुस्ती लाता है और इससे कई शारीरिक नुक़सान भी होते हैं। क्योंकि जब आदमी टेक लगाए हुए होता है, तो उसके खाने की नली सीधी रहने की बजाय एक ओर झुकी हुई रहती है और अपनी प्राकृतिक अवस्था में नहीं होती, जिससे नुक़सान होने की संभावना रहती है। इसी तरह खाना खाते समय टेक लगाकर बैठना इन्सान के अभिमान को प्रदर्शित करता है और विनम्रता के विपरीत है।