





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "दो आँखों को जहन्नम की आग छू भी नहीं सकती; एक वह आँख जो अल्लाह के डर से रोए और दूसरी वह आँख जो अल्लाह के मार्ग में पहरेदारी करते हुए जागे।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।इस हदीस का अर्थ यह है कि आग ऐसी आँख को नहीं छूएगी, जो अल्लाह के भय से रोए। जब बंदा अल्लाह की महानता एवं सामर्थ्य तथा अपनी विवशता एवं अल्लाह का हक़ अदा करने में कोताही को याद करता है, तो उसकी दया की आशा में एवं उसके दंड एवं नाराज़गी के भय से रो पड़ता है। इस प्रकार के व्यक्ति को आग से मुक्ति का वचन दिया गया है। दूसरी आँख जिसे आग नहीं छूएगी, वह आँख है, जो अल्लाह के मार्ग में सीमाओं एवं युद्ध के मैदानों में जागकर रात गुज़ारे, ताकि मुसलमानों की जान की सुरक्षा हो सके। आपके शब्द "दोनों आँखों को आग नहीं छूँएगी" में शरीर के एक अंग का नाम लेकर पूरा शरीर मुराद लिया गया है। आशय यह है कि जो व्यक्ति अल्लाह के भय से रोया और जिसने अल्लाह के मार्ग में पहरेदारी करते हुए रात गुज़ारी, अल्लाह दोनों के शरीर को आग पर हराम कर देगा।
कअब बिन इयाज़- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते सुना हैः "हर उम्मत के लिए एक आज़माइश होती है और मेरी उम्मत के लिए वह आज़माइश धन है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।काब बिन अयाज़ -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "हर संप्रदाय के लिए एक परीक्षा की वस्तु होती है" हदीस में प्रयुक्त शब्द फ़ितना से मुराद वह चीज़ें हैं, जिनके द्वारा परीक्षा एवं आज़माइश होती है। "और मेरी उम्मत के लिए परीक्षा की वस्तु धन है।" क्योंकि धन इनसान के अधिकार को सँवारने में उत्पन्न करता है। चुनांचे धन में संलिप्तता इनसान के दिल को गाफ़िल करती और आख़िरत की तैयारी से दूर कर देती है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "मेरी उम्मत के सभी लोगों को माफ़ कर दिया जाएगा, सिवाय उनके जो खुलम-खुल्ला गुनाह करते हैं। तथा खुलम-खुल्ला गुनाह करने का एक रूप यह है कि आदमी रात को कोई गुनाह करे और सुबह आए तो वह कहता फिरे कि ऐ अमुक! मैंने रात को ऐसा और ऐसा किया है, हालांकि अल्लाह ने उसे लोगों से छुपा रखा था। उसके रब ने रात भर उसके गुनाह को छिपा रखा, लेकिन उसने सुबह को अल्लाह के डाले हुए परदे को उठा दिया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि इस बात की आशा रहती है कि अल्लाह गुनाह करने वाले मुसलमान को क्षमा कर दे। लेकिन ऐसा अभिमान एवं निर्लज्जता के साथ गुनाह करने वाले के साथ नहीं होता। वह व्यक्ति क्षमा का हक़दार नहीं है जो रात में गुनाह करे और सुबह लोगों को बताता फिरे कि उसने बीती रात अमुक गुनाह किया है, जबकि अल्लाह ने उसके गुनाह पर पर्दा डाल रखा था। पूरी रात अल्लाह ने उसपर पर्दा डाले रखा और सुबह उठकर उसने अल्लाह के डाले हुए पर्दे को उठा दिया।
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है : "तुममें से हर व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में आनी चाहिए कि वह अल्लाह से अच्छा गुमान रखता हो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि एक मुसलमान की मृत्यु अल्लाह से अच्छा गुमान रखते हुए ही होनी चाहिए। मरते वक़्त उम्मीद का पहलू प्रबल होना चाहिए और दिल में यह उम्मीद होनी चाहिए कि अल्लाह उसपर रहम करेगा और उसे माफ़ कर देगा। क्योंकि असल में, डर की ज़रूरत कर्मों को बेहतर बनाने के लिए होती है और वह समय कर्म का होता नहीं है। इसलिए, वहाँ उम्मीद का पहलू प्रबल होना चाहिए।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस रात मुझे मेराज कराई गई, उस रात मैं इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिला। तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मुझसे कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कहना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बड़ी अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। जन्नत एक चटियल मैदान है और उसमें पेड़ लगाने का काम "सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर" द्वारा होता है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि इस्रा एवं मेराज की रात आपकी मुलाक़ात अल्लाह के परम मित्र इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई, तो उन्होंने कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कह देना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बहुत अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। खारेपन का नाम व निशान तक नहीं है। जन्नत एक समतल, पेड़-पौधों से ख़ाली और बहुत बड़ा मैदान है, जिसमें पेड़ लगाने का काम कुछ पवित्र शब्दों द्वारा होता है। इन पवित्र शब्दों को "अल-बाक़ियात अल-सालिहात" यानी बाक़ी रह जानी वाली नेकियाँ भी कहा जाता है। ये शब्द हैं : "सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर", जब जब कोई मुसलमान इन शब्दों को कहता है और दुहराता है, तो उसके लिए जन्नत में पेड़ लगा दिया जाता है।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुनाः नुबुव्वत में से केवल शुभ सूचनाएँ बाकी रह गई हैं। सहाबा ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! शुभ सूचनाएँ क्या हैं? फ़रमायाः अच्छा स्वप्न।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस में बताया है कि अच्छे स्वप्न शुभ सूचना देने वाली चीज़ें और वह्य का सिलसिला बंद होने के बाद शेष रहने वाले नबूवत के आसार में से है। अब आने वाले समय में क्या कुछ होने वाला है, उसे जानने का एकमात्र साधन अच्छे स्वप्न हैं।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः यदि मेरे पास उहुद पर्वत के बराबर सोना हो जाए तो मुझे यह अच्छा नहीं लगेगा कि उसका कुछ भी भाग मेरे पास तीन दिन तक बाकी रहे, सिवाय उसके जिसे मैंने क़र्ज़ चुकाने के लिए बचा रखा हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है और शब्द बुख़ारी के हैं।यदि मैं उहुद पर्वत के बराबर भी शुद्ध सोने का मालिक बन जाऊँ, तो मैं पूरे को अल्लाह के मार्ग में खर्च कर दूँगा और उसका मात्र उतना भाग ही बचाकर रखूँगा, जितने की ज़रूरत अधिकारों की अदायगी एवं कर्ज़ों को चुकाने के लिए हो।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे कुछ रिश्तेदार हैं, मैं उनसे रिश्ता निभाता हूँ और वे मुझसे रिश्ता काटते हैं। मैं उनसे अच्छा व्यवहार करता हूँ और वे मेरे साथ बुरा बर्ताव करते हैं। मैं उन्हें सहनशीलता दिखाता हूँ और वे अशिष्टता का प्रदर्शन करते हैं। तो आपने कहा : "अगर तुम्हारी बातें सही हैं, जो तुम कह रहे हो, तो मानो तुम उनके मुँह में गरम राख ठूँस रहे हो। तुम जब तक इसे जारी रखोगे, अल्लाह की ओर से तुम्हारे साथ उनके विरुद्ध एक सहायक मौजूद रहेगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैएक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के यहाँ आकर शिकायत की कि उसके कुछ रिश्तेदार हैं, जिनके साथ वह अच्छा व्यवहार करता है, लेकिन वे उसके साथ बुरा व्यवहार करते हैं। वह रिश्ता जोड़ता है उनके पास आता जाता है लेकिन वे उसका साथ रिश्ता काटते हैं। वह उनके साथ प्यार और ईमानदारी से पेश आता है है लेकिन वे उसके साथ अन्याय और बेरहमी का बर्ताव करते हैं। वह सहनशीलता दिखाता है तथा क्षमा करता है लेकिन वे उसके साथ नासमझी की वजह से बुरे शब्दों और कामों से पेश आते हैं। ऐसे में उसकी ओर से उनके साथ रिश्ते-नातों का लिहाज़ रखने का सिलसिला जारी रहना चाहिए या नहीं? अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: अगर तुम्हारी बात सच है, तो तुम उन्हें उनकी ही नज़रों में अपमानित और ज़लील कर रहे हो। उनकी ग़लत हरकतों के बावजूद उन पर ढेर सारा उपकार करके, गोया तुम उन्हें गर्म राख खिला रहे हो। जब तक तुम उनके प्रति अपना उपकार जारी रखोगे और वे तुम्हारे प्रति अपना बुरा व्यवहार जारी रखेंगे, अल्लाह की ओर से तुम्हारे साथ एक सहायक नियुक्त होगा, जो उनके विरुद्ध तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हें उनके अत्याचार से बचाएगा।
मुसतौरिद बिन शद्दाद- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः आख़िरत की तुलना में दुनिया ऐसी है, जैसे तुममें से कोई अपनी उँगली समुद्र में डाले (और उठाए)। उसे देखना चाहिए कि उँगली के साथ कितना पानी आया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।हदीस का अर्थ : यदि तुम आख़िरत की तुलना में दुनिया की हक़ीक़त जानना चाहो, तो पहले समुद्र में अपनी उँगली डुबाओ और उसके बाद उठाकर देखो कि उसमें कितना पानी लगकर आता है? ज़ाहिर सी बात है कि उसके साथ जो पानी लगकर आएगा, वह समुद्र की तुलना में कहीं नहीं ठहरेगा। बिलकुल यही हालत है आख़िरत की तुलना में दुनिया का। एक तरफ़ दुनिया की आयु छोटी है और उसकी सुख-सुविधाएँ नाशवान हैं, तो दूसरी ओर आख़िरत सदैव रहने वाली है और उसकी नेमतें एवं सुख-सुविधाएँ हमेशा रहने वाली। इन तमाम बातों में दोनों के बीच वही तुलना है, जो उँगली से लगकर आने वाले पानी और समुद्र के बीच है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : {فما متاع الحياة الدنيا في الآخرة إلا قليل} (जबकि परलोक की तुलना में सांसारिक जीवन के लाभ बहुत थोड़े हैं।) अतः इनसान को जिस क़दर सुख-सुविधाएँ एवं आनंद प्राप्त हैं, उनसे बंदा थोड़े-से समय के लिए, वह भी बेशुमार टीस और अनगिनत कचोट के साथ, लाभान्वित होगा। उनपर अभिमान और उनकी नुमाइश की आयु बहुत छोटी है। बहुत जल्द सब कुछ छिन जाना है और उसके बाद अफ़सोस एवं पछतावे के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आना है : {وما أوتيتم من شيء فمتاع الحياة الدنيا وزينتها وما عند الله خير وأبقى أفلا تعقلون} (जो कुछ तुम दिए गए हो, वह सांसारिक जीवन का सामान तथा उसकी शोभा है और जो अल्लाह के पास है वह उत्तम तथा स्थायी है। क्या तुम समझते नहीं हो?) अतः अल्लाह के पास जो सुख-सुविधाएँ, आनंदमय जीवन, महल एवं खुशियाँ प्राप्त होंगी, वह गुण एवं मात्रा में अधिक उत्तम एवं अधिक टिकाऊ होंगी और कभी ख़त्म नहीं होंगी।