





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ''क्या मैं तुम्हें ऐसी बातें न बताऊँ, जिनके ज़रिए अल्लाह गुनाहों को मिटा देता है और दर्जे ऊँचे कर देता है?" सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल! फ़रमाया : "परेशानियों के बावजूद अच्छी तरह वज़ू करना, इन्सान का अधिक से अधिक मस्जिद जाना और नमाज़ के बाद अगली नमाज़ की प्रतीक्षा करना। यही पहरेदारी है।''
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा से पूछा कि क्या वह चाहते हैं कि आप उनको कुछ ऐसे कार्यों के बारे में बताएँ, जो गुनाहों की क्षमा, उन्हें इन्सान के कर्म लिखने वाले फ़रिश्तों के रजिस्टर से मिटा दिए जाने और जन्नत में ऊँचे स्थान के सबब बनते हों। सहाबा ने कहा : अवश्य ही बताएँ। आपने फ़रमाया : 1- परेशानी, जैसे ठंडी, पानी की कमी शारीरिक कष्ट एवं पानी गर्म होने के बावजूद पूरे तौर पर और अचछी तरह वज़ू करना। 2- मस्जिदों की ओर ज़्यादा क़दम चलना। इसकी दो सूरतें हो सकती हैं। मस्जिद से घर दूर हो या मस्जिद आना-जाना ज़्यादा हो। हदीस में आए हुए शब्द "अल-ख़ुता" के मायने दो क़दमों के बीच की दूरी के हैं। 3- नमाज़ के समय की प्रतीक्षा करना, उसमें दिल का अटका रहना, उसकी तैयारी करना और जमात के साथ नमाज़ पढ़ने की प्रतीक्षा में मस्जिद के अंदर बैठे रहना। एक नमाज़ पढ़ लेने के बाद मस्जिद में बैठकर दूसरी नमाज़ की प्रतीक्षा करना। उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि दरअसल यही कार्य हक़ीक़ी मुराबता यानी दुश्मन से रक्षा के लिए सरहद की पहरेदारी है। क्योंकि यह अंतरात्मा की ओर आने वाले शैतानी रास्तों को बंद करते हैं, अनुचित आकांक्षाओं को दबाते हैं और हृदय को शैतान द्वारा डाले गए बुरे ख़्यालात को ग्रहण करने से रोकते हैं। इस प्रकार, अल्लाह की सेना को शैतान की सेना पर विजय प्राप्त होती है। यह सबसे बड़ा जिहाद है इसी लिए यह दुश्मन से सीमा की रक्षा करने जैसा है।
अबू दरदा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "क्या मैं तुम्हें तुम्हारा सबसे उत्तम कार्य न बताऊँ, जो तुम्हारे रब के निकट सबसे ज़्यादा सराहनीय, तुम्हारे दरजे को सबसे ऊँचा करने वाला, तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी दान करने से बेहतर तथा इस बात से भी बेहतर है कि तुम अपने शत्रु से भिड़ जाओ और तुम उनकी गर्दन मार दो और वह तुम्हारी गर्दन मार दें?" सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल! तो फ़रमाया : "उच्च एवं महानअल्लाह का ज़िक्र करना।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से पूछा : क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें बता दूँ और सिखा दूँ कि तुम्हारे सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के यहाँ तुम्हारा कौन-सा कार्य सर्वोत्तम, सर्वाधिक सम्माननीय, सर्वाधिक विकसित, सर्वाधिक पवित्रऔर सर्वाधिक स्वच्छ है? जन्नत में तुम्हारे स्थान को सबसे अधिक ऊँचा करने वाला है? तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी सदक़ा करने से बेहतर है? इस बात से भी उत्तम है कि तुम अविश्वासियों से युद्ध करो, फिर तुम उनकी गर्दन मारो और वह तुम्हारी गर्दन मारें? सहाबा ने उत्तर दिया : हम अवश्य ही चाहेंगे कि आप हमें इस प्रकार का काम बताएँ। तब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : सभी समयों एवं सभी परिस्थितियों में अल्लाह का ज़िक्र करना।
सुलैमान बिन सुरद रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ बैठा हुआ था और (निकट ही) दो व्यक्ति एक-दूसरे को गाली गलौज कर रहे थे। उनमें एक व्यक्ति का चेहरा ग़ुस्से के कारण लाल हो गया था और उसकी रगें फूल गई थीं। यह देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर यह व्यक्ति उसे पढ़ ले, तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाए। अगर इसने कहा : मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ। तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा।" अतः लोगों ने उससे कहा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "शैतान से अल्लाह की शरण माँग।" तो उसने उत्तर दिया : क्या मैं पागल हूँ?
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदो व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने एक-दूसरे को गाली-गलौज कर रहे थे। एक की हालत तो यह थी कि उसका चेहरा लाल हो चुका था और उसकी गर्दन की रगें फूल चुकी थीं। यह दृश्य देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर इस ग़ुस्से वाले व्यक्ति ने उसे कह लिया, तो उसका ग़ुस्सा दूर हो जाएगा। उसे "मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" कह लेना चाहिए। चुनांचे सहाबा ने उससे कहा कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने तुझे "मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ" पढ़ने के लिए कहा है। लेकिन उसने उत्तर दिया : क्या मैं पागल हूँ? उसे लगता था कि अल्लाह की शरण वही माँगता है, जो पागलपन का शिकार हो।
अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "अच्छा सपना अल्लाह की ओर से है और बुरा सपना शैतान की ओर से। अतः जब तुम में से कोई व्यक्ति डरावना सपना देखे, तो तीन बार बाएँ ओर थुत्कारे और उस सपने की बुराई से अल्लाह की शरण माँगे,(ऐसा करने से) यह उसकी हानि नहीं करेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि अच्छा और ख़ुशी देने वाला स्वप्न अल्लाह की ओर से है। जबकि अप्रिय एवं चिंतित करने वाला स्वप्न शैतान की ओर से है। अतः जो व्यक्ति अप्रिय स्वप्न देखे, वह बाईं ओर थुत्कारे और उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगे। क्योंकि अल्लाह ने उक्त कार्य को बुरे स्वप्न के नतीजे में सामने आने वाली अप्रिय घटना से सुरक्षा का साधन बनाया है।
उक़बा बिन आमिर जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुक्ति क्या है? आपने उत्तर दिया : "अपनी ज़बान पर नियंत्रण रखो, अपने घर के अंदर ही रहा करो और अपने गुनाहों पर रोया करो।"
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैउक़बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अनहु ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि वह कौन-कौन सी चीज़ें हैैं, जो एक मोमिन के लिए दुनिया एवं आख़िरत में मुक्ति का सबब बनती हैं? चुनांचे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनसे कहा कि तीन बातों का ख़्याल रखा करो : 1- सभी प्रकार की बुरी एवं व्यर्थ बातों से अपनी ज़बान की रक्षा करो और केवल अच्छी बातों के लिए ही मुँह खोला करो। 2- अपने घर में रहा करो ताकि तनहाई में अल्लाह की इबादत कर सको, उसकी बंदगी में लगे रहो और फ़ितनों से अलग रहा करो। 3- अपने गुनाहों पर रोया करो, शर्मिंदा रहो और अल्लाह के सामने तौबा करो।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है : एक देहाती अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहा : मुझे कोई ऐसा कर्म बताएँ कि उसे करूँ, तो जन्नत में दाखिल हो जाऊँ। फ़रमाया : "अल्लाह की इबादत करो, किसी को उसका साझी न बनाओ, फ़र्ज़ नमाज़ कायम करो, फ़र्ज़ ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो।" उसने कहा : उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा। जब वह वापस हुआ, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो किसी जन्नती व्यक्ति को देखना चाहे, वह इसे देख ले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदेहात का रहने वाला एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया, ताकि आप उसे जन्नत में दाख़िल करने वाला कोई अमल बता दें। अतः आपने उसे बताया कि जन्नत में प्रवेश और जहन्नम से मुक्ति इस्लाम के स्तंभों के अनुपालन पर निर्भर है, जो इस प्रकार हैं : एक अल्लाह की इबादत करना और किसी को उसका साझी न बनाना। पाँच वक़्त की नमाज़ क़ायम करना, जिन्हें अल्लाह ने रात और दिन में अपने बंदों पर फ़र्ज़ किया है। धन की ज़कात, जो अनिवार्य है, निकाल कर हक़दारों को देना। रमज़ान महीने के रोज़े समय पर पाबंदी से रखना। इतना सुनने के बाद उस व्यक्ति ने कहा : उस हस्ती की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं आपसे सुने हुए अनिवार्य कार्यों से न ज़्यादा करूँगा, न कम। अतः जब वह व्यक्ति जाने लगा, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : जिसे कोई जन्नती इन्सान देखना हो, वह इस देहाती व्यक्ति को देख ले।
सह्ल बिन साद साइदी- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "अगर दुनिया, अल्लाह के निकट मच्छर के पर के बराबर भी महत्व रखती, तो अल्लाह किसी काफ़िर को उसका एक घूँट पानी तक नहीं देता।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।इस हदीस में बयान किया गया है कि दुनिया अल्लाह के निकट एक तुच्छ एवं मूल्यहीन वस्तु है। यदि अल्लाह के निकट उसका ज़रा भी मूल्य होता, तो किसी काफ़िर को उसकी नेमतों से लाभान्वित होने का अवसर देना तो दूर, एक घूँट पानी तक न देता। जबकि इसके विपरीत आख़िरत कभी न ख़त्म होने वाली नेमतों का घर है, जो विशेष रूप से मोमिनों के लिए तैयार की गई है और उसमें काफ़िरों को प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। अतः ईमान वालों को इस तथ्य से अवगत होना चाहिए और दुनिया की ओर झुकाव से बचना चाहिए, क्योंकि यह इनसान की यात्रा का एक पड़ाव है हमेशा रहने की जगह नहीं है। उन्हें दुनिया से केवल इतनी चीज़ें प्राप्त करनी चाहिए कि आख़िरत में, जो कि हमेशा रहने का घर है, उनके काम आ सकें। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "तथा जो कुछ तुम दिये गये हो, वह सांसारिक जीवन का सामान तथा उसकी शोभा है और जो अल्लाह के पास है उत्तम तथा स्थायी है, तो क्या तुम समझते नहीं हो? तो क्या जिसे हमने वचन दिया है एक अच्छा वचन और वह पाने वाला हो उसे, उसके जैसा हो सकता है, जिसे हमने दे रखा है (तुच्छ) सांसारिक जीवन का सामान, फिर वह प्रलय के दिन उपस्थित किये लोगों में होगा?"
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो।" किसी ने पूछा : कौन ऐ अल्लाह के रसूल? फ़रमाया : "जिसने अपने माता-पिता को बुढ़ापे में पाया, चाहे दोनों में से एक को पाया हो या दोनों को, परन्तु (उनकी सेवा करके) जन्नत में दाखिल नहीं हुआ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी के लिए अपमान एवं तिरस्कार की बद-दुआ करते हुए नाक मिट्टी में मिलने तक की बात कह डाली और वह भी यह बात तीन बार कही। किसी ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह बद-दुआ आप किसके विरुद्ध फ़रमा रहे हैं? आपने कहा : जिसने अपने माता-पिता या दोनों में से एक को बुढ़ापे में पाया और दोनों की सेवा करके जन्नत में दाख़िल होने का सामान न कर सका। न उनके साथ अच्छा व्यवहार किया और न उनका आज्ञाकारी बना।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का के रास्ते में चल रहे थे कि जुमदान नामी एक पर्वत के पास से गुज़रे। अतः फ़रमाया : "चलते रहो, यह जुमदान है। अतुल्य विशेषता वाले लोग आगे हो गए।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यह अतुल्य विशेषता वाले लोग कौन हैं? फ़रमाया : "अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले पुरुष और अल्लाह को बहुत-ज़्यादा याद करने वाली स्त्रियाँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अल्लाह का बहुत ज़्यादा ज़िक्र करने वालों का स्थान बयान फ़रमाया है और बताया है कि उनको यह विशिष्टता प्राप्त हो गई कि वे दूसरों से आगे बढ़कर जन्नत के ऊँचे दर्जे प्राप्त करने में कामयाब हो गए। आपने उनकी समानता जुमदान पहाड़ से दी है, जो दूसरे पहाड़ों से अलग पहचान रखता है।