





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू उमामा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मुझे अम्र बिन अबसा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "अल्लाह अपने बंदे से सबसे निकट रात के अंतिम भाग में होता है। अतः यदि उस समय अल्लाह का स्मरण करने वालों में शामिल हो सको, तो हो जाओ।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदा अपने रब से सबसे ज़्यादा निकट रात के अंतिम तिहाई भाग में हुआ करता है। इसलिए हर व्यक्ति का प्रयास होना चाहिए कि रात के उस भाग में जागकर अल्लाह की इबादत करे, नमाज़ पढ़े, ज़िक्र में व्यस्त रहे और तौबा करे।
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि एक व्यक्ति नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तथा कहा किः मैं आपसे हिजरत करने तथा जिहाद करने पर अल्लाह (तआला) से प्रतिफल की उम्मीद करते हुए बैअ़त करता हूँ। आपने फ़रमायाः क्या तुम्हारे माता-पिता में से कोई जीवित है? उन्होंने कहाः हाँ, बल्कि दोनों जीवित हैं। आपने पूछाः क्या तुम अल्लाह से प्रतिफल चाहते हो? उन्होंने कहाः हाँ। आपने फ़रमायाः तब तुम अपने माता-पिता के पास लौट जाओ तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करो। बुख़ारी तथा मुस्लिम की एक रिवायत में है कि एक व्यक्ति नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तथा जिहाद में सम्मिलित होने की आज्ञा मांगी, तो आपने फ़रमायाः क्या तुम्हारे माता-पिता जीवित हैं? उन्होंने कहाः हाँ। तो आपने फरमायाः उनके प्रति जिहाद करो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक व्यक्ति आया और आपसे अल्लाह के मार्ग में जिहाद तथा हिजरत की इच्छा प्रकट की। वह अपने पीछे अपने माता-पिता को छोड़ आया था और अबू दाऊद की रिवायत में है कि दोनों उसके मारे जाने की आशंका से रोए जा रहे थे। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उससे पूछा : "क्या तेरे माता-पिता में से कोई जीवित है?" उसने कहा कि एक नहीं, बल्कि दोनों जीवित हैं। आपने पूछा : "क्या तुम अल्लाह से प्रतिफल चाहते हो?" उसने कहा कि हाँ, तो आपने फ़रमाया : "अपने माता-पिता के पास लौट जाओ और उनकी अच्छी तरह सेवा करो।" जबकि अबू दाऊद की एक रिवायत में है : "उनके पास लौट जाओ और जिस तरह उनको रुलाया है, उसी तरह उनको हँसाओ।" अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उस व्यक्ति को उस काम की ओर लौटा दिया, जो उसके हक़ में बेहतर तथा अधिक ज़रूरी था। यानी माता-की ओर लौट जाना और उनकी अच्छी तरह सेवा करना। क्योंकि यह, उनकी सेवा, उनकी संतुष्टि और उनके आदेश के अनुपालन में अपने नफ़्स से जिहाद करना है। बुख़ारी एवं मुस्लिम की एक रिवायत में है : "अतः तुम उन दोनों के संबंध में जिहाद करो।" एक अन्य हदीस में स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि माता-पिता की सेवा करना, उनकी बात मानना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने से उत्तम है। अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- की एक रिवायत में है कि एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और आपसे सबसे अच्छा कर्म जानना चाहा, तो आपने फ़रमाया : "सबसे अच्छा कर्म नमाज़ा है।" उसने पूछा कि उसके बाद सबसे अच्छा कर्म कौन-सा है? तो फ़रमाया : "उसके बाद जिहाद है।" उसने कहा कि मेरे माता-पिता जीवित हैं, तो आपने फ़रमाया : "तुम्हारा अपने माता-पिता की सेवा करना इससे अच्छा है।" लेकिन हाँ, यदि जिहाद व्यक्तिगत रूप से अनिवार्य हो, तो उसे माता-पिता की सेवा पर प्राथमिकता प्राप्त होगी।
स़ौबान रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सबसे उत्तम दीनार जिसे इंसान ख़र्च करता है, वह दीनार है जिसे वह अपने परिवार पर ख़र्च करता है, फिर वह दीनार है जो वह अल्लाह की राह में जिहाद करने के लिए खास किए हुए जानवर पर ख़र्च करता है, और फिर वह दीनार है जिसे वह अल्लाह के रास्ते में अपने साथियों पर ख़र्च करता है।" अबू क़िलाबा कहते हैं कि शुरूआत परिवार से की। फिर अबू क़िलाबा ने कहा कि भला कौन व्यक्ति, उस आदमी से पुण्य में बढ़ सकता है, जो अपने छोटे-छोटे बच्चों पर खर्च करता है, ताकि वे दूसरों के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर न हों या अल्लाह तआला उन्हें उसके द्वारा लाभ पहुँचाए तथा उनको निस्पृह कर दे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैयहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खर्च करने के कुछ रूप बयान किए हैं और बताया है कि जब खर्च करने के कई अवसर आपस में टकराने लगें, तो क्रमानुसार जो जितना महत्वपूर्ण हो, उसे महत्व दिया जाना चाहिए। आपने बताया कि एक मुसलमान द्वारा खर्च किया गया सबसे अधिक सवाब वाला धन वह है, जिसे उन लोगों पर खर्च किया जाए, जिनका भरण-पोषण उसपर अनिवार्य है। जैसे पत्नी और बच्चे आदि। उसके बाद नम्बर आता है अल्लाह की राह में जिहाद के लिए तैयार रखे गए सवारी पर खर्च करने का। उसके बाद नम्बर आता है अपने दोस्तों और साथियों पर खर्च करने का, जो अल्लाह की राह में जंग कर रहे हों।
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब तुममें से कोई व्यक्ति ऐसा सपना देखे, जो उसे अच्छा लगे, तो (जान ले कि) यह सपना अल्लाह की ओर से है। अतः उसपर अल्लाह की प्रशंसा करे और उसे (लागों को) बताए। और जब इसके विपरीत ऐसा सपना देखे, जो उसे बुरा लगे, तो (जान ले कि) यह शैतान की ओर से है। अतः उससे अल्लाह की शरण माँगे और किसी को न बताए। इससे उसे कोई हानि नहीं होने वाली।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि नींद की अवस्था में देखा जाने वाला अच्छा हर्षित करने वाला स्वप्न अल्लाह की ओर से होता है। अतः उसपर अल्लाह की प्रशंसा करनी चाहिए और उसे बताना भी चाहिए। इसके विपरीत जब इन्सान को पसंद न आने वाला और दुखी करने वाला स्वप्न नज़र आए, तो जान ले कि यह शैतान की ओर से है। अतः उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगे और किसी को न बताए। इतना कर लेने के बाद उसे कोई हानि नहीं होगी। क्योंकि अल्लाह ने उपर्युक्त वस्तुओं को स्वप्न के नतीजे में सामने आने वाली बुराई से सुरक्षा का ज़रिया बनाया है।
सुहैब रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मोमिन का मामला भी बड़ा अजीब है। उसके हर काम में उसके लिए भलाई है। जबकि यह बात मोमिन के सिवा किसी और के साथ नहीं है। यदि उसे ख़ुशहाली प्राप्त होती है और वह शुक्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है और अगर उसे तकलीफ़ पहुँचती है और सब्र करता है. तो यह भी उसके लिए बेहतर है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मोमिन के हालात को पसंद करते हुए उनपर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। क्योंकि उसके सारे हालात अच्छे हैं। जबकि यह बात मोमिन के सिवा किसी और के साथ नहीं है। अगर उसे खुशियाँ मिलती हैं और वह अल्लाह का शुक्र करता है, तो उसे शुक्र करने का सवाब मिलता है। जबकि उसे कष्ट का सामना होता है और उसे अल्लाह के यहाँ अच्छे प्रतिफल का ज़रिया समझता है, तो उसे सब्र का सवाब मिलता है। इस तरह उसका दामन हर हाल में सवाब से भरा रहता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब छींकते, तो अपना हाथ या कपड़ा अपने मुँह पर रख लेते और अपनी आवाज़ धीमी (या नीची) रखते।
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब छींकते, तो निम्नलिखित काम करते : 1- मुँह पर अपना हाथ या कपड़ा रखते, ताकि मुँह या नाक से कोई ऐसी चीज़ न निकले, जिससे पास बैठे हुए व्यक्ति को कष्ट हो। 2- आवाज़ धीमी कर लेते।
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "क्या मैं तुम्हें वह बात न बतला दूँ, जिसका मुझे तुम्हारे बारे में काना दज्जाल से भी अधिक भय है? सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने कहाः अवश्य, ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहाः "छिपा हुआ शिर्क; आदमी नमाज के लिए खड़ा होता है और यह सोचकर अच्छी तरह नमाज़ पढ़ता है कि कोई उसे देख रहा है।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- काना दज्जाल के फितने को याद करते और उसका भय खाते थे। अतः, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें बताया कि एक काम ऐसा है, जिसका भय उनके बारे में आपको काना दज्जाल के फितने से भी अधिक है। वह है, नीयत और इरादे का शिर्क, जो लोगों के सामने प्रकट नहीं होता। फिर उसकी व्याख्या करते हुए कहा कि ऐसा कार्य जिसे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया जाना चाहिए, उसे आदमी लोगों को दिखाने के लिए अच्छे ढंग से करे। यही नीयत का शिर्क है।
उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : उनसे कहा गया कि आप उसमान रज़ियल्लाहु अनहु के पास जाकर उनसे बात क्यों नहीं करते? इसपर उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : क्या तुम लोग यह समझते हो कि मैं उनसे तुम्हारे सामने ही बात करूँगा? मैं उनसे एकांत में बात करता हूँ, ताकि किसी प्रकार के फ़साद का द्वार न खुले। मैं यह भी नहीं चाहता कि सबसे पहले मैं ही फ़ितने का द्वार खोलूँ। मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनने के बाद यह भी नहीं कहता कि जो व्यक्ति मेरा शासक है, वह सब लोगों से बेहतर है : "क़यामत के दिन एक व्यक्ति लाया जाएगा तथा उसे जहन्नम में फेंक दिया जाएगा, जिससे उसके पेट की अंतड़ियाँ बाहर निकल आएँगी और वह उन्हें लेकर ऐसे घूम रहा होगा, जैसे गधा चक्की के चारों ओर घूमता है। ऐसे में, सारे जहन्नमी उसके पास एकत्र हो जाएँगे और कहेंगे : ऐ अमुक, तेरे साथ ऐसा कैसे हुआ? क्या ऐसा नहीं है कि तू भलाई का आदेश देता था और बुराई से रोकता था? वह उत्तर देगा : हाँ, मैं दूसरों को भलाई का आदेश तो देता था, किन्तु स्वयं उसपर अमल नहीं करता था तथा दूसरों को बुराई से रोकता था, किंतु स्वयं उसमें लिप्त हो जाता था।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैकिसी ने उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहु से पूछा कि आप उसमान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अनहु के पास जाकर उनसे लोगों के बीच प्रकट होने वाले फ़ितने के बारे में बात क्यों नहीं करते और इस आग को बुझाने का प्रयास क्यों नहीं करते? जवाब में उन्होंने कहा कि उन्होंने उनसे बात तो की है, लेकिन राज़दारी के साथ। ताकि उद्देश्य भी पूरा हो जाए और कोई फ़ितना भी सर न उठाए। वह कहना दरअसल यह चाहते थे कि वह खुलकर सबके सामने शासकों का खंडन करना नहीं चाहते। क्योंकि इससे ख़लीफ़ा का अपमान होगा और फ़ितने का द्वारा खुलेगा। वह नहीं चाहते कि यह द्वार सबसे पहले उनके हाथ से खुले। उसके बाद उसामा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया कि वह शासकों को एकांत में नसीहत करते हैं और किसी की चापलूसी नहीं करते कि मुँह पर प्रशंसा कर दें। चाहे शासक ही क्यों न हो। यह तरीक़ा दरअसल उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनने के बाद अपनाया है कि क़यामत के दिन एक व्यक्ति को लाकर जहन्नम में डाल दिया जाएगा। जहन्नम की आग इतनी तेज़ होगी कि गिरने के साथ ही उसके पेट की अंतड़ियाँ निकलकर बाहर आ जाएँगी। फिर वह अपनी अंतड़ियों के साथ चारों ओर ऐसे घूम रहा होगा, जैसे गधा चक्की के चारों ओर घूमता है। यह दृश्य देख जहन्नमी उसके आसपास गोलाकार में एकत्र हो जाएँगे और उससे पूछेंगे कि ऐ अमुक व्यक्ति, क्या तुम हमें अच्छी बात का आदेश देते और बुरी बात से रोका नहीं करते थे? वह जवाब देगा : यह सच है कि मैं तुम्हें अच्छी बात का आदेश देता था, लेकिन खुद उसपर अमल नहीं करता था। बुरी बात से तुम्हें रोकता था, लेकिन उसमें खुद संलिप्त हो जाया तरता था।
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने दो लड़कियों का लालन-पालन किया, यहाँ तक कि वह बड़ी हो गईं, तो क़यामत के दिन वह तथा मैं इस तरह आएँगे।" फिर आपने अपनी ऊँगलियों को मिलाया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने दो बेटियाँ या दो बहनें दी गईं और उसने उनका खर्च उठाया, उनकी तर्बियत की, अच्छाई सिखाई और बुराई से सचेत किया, फिर दोनों बड़ी और वयस्क हो गईं, तो वह और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़यामत के दिन कुछ इस तरह आएँगे। यह कहते समय आपने अपनी शहादत की उंगली और बीच वाली उंगली को मिलाकर दिखाया।