Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























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उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि यदि कोई रात के प्रथम भाग में अपनी स्त्री से संभोग कर ले, यद्यपि वीर्य स्खलन न हुआ हो, या फिर उसे स्वप्नदोष हो जाए, तो क्या वह जनाबत की अवस्था में सो सकता है? तो आपने उन्हें इसकी अनुमति यह कहते हुए दे दी कि इस बड़ी नापाकी को शरई वज़ू के द्वारा हलका करना होगा। उसके बाद यदि जनाबत की अवस्था में सो जाता है, तो कोई बात नहीं है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घर में प्रवेश करते समय और खाना खाने से पहले अल्लाह का नाम लेने का आदेश दिया है। जब कोई व्यक्ति घर में प्रवेश करते और खाना खाते समय बिस्मिल्लाह कहता है, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि तुम्हारे लिए इस घर में रात गुज़ारने का स्थान और रात के खाने का प्रबंध नहीं है, क्योंकि घर के मालिक ने तुमसे अल्लाह की शरण ले ली है। इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति घर में दाख़िल होता है और घर में दाखिल होते तथा खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि इस घर में उनके रात गुज़ारने तथा खाने का प्रबंध हो गया है।
अबू बक्र -रज़ियल्लाहु अनहु- का यह कथन इस बात का प्रमाण है कि सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के परिवार के अधिकार से अवगत थे और उनका सम्मान करते थे। अतः आपके परिवार का जो भी व्यक्ति इस्लाम के सीधे मार्ग पर चल रहा होगा और आपकी सुन्नत का अनुसरण करेगा, उसके दो अधिकार हैं : इस्लाम का अधिकार और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के संबंधी होने का अधिकार। इस हदीस से यह बात भी मालूम हुई कि अबू बक्र तथा अन्य सभी सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के परिवार के लोगों से प्रेम रखते थे और उनके साथ अच्छा व्यहार करने की बात कहते थे।
हया इनसान का ऐसा गुण है, जो इनसान को अपने व्यक्तित्व को सुरूप एवं सुशोभित बनाने वाले कार्यों को करने तथा कुरूप एवं अशोभित करने वाले कार्यों से दूर रहने पर आमादा करती है। यही कारण है हया केवल भलाई ही लाती है। इस हदीस का परिदृश्य यह है कि एक व्यक्ति अपने भाई को हया के बारे समझा-बुझा रहा था और उसे हया करने से रोक रहा था। ऐसे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यह बात कही।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो प्रकार के लोगों की मिसाल देकर समझाया है : पहला प्रकार : सदाचारी साथ बैठने वाला तथा मित्र, जो अल्लाह और उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति के कामों की राह दिखाए और नेकी के कामों में सहोयग करे। उसकी मिसाल खुशबू बेचने वाले की तरह है। वह या तो तुमको भेंट के रूप में देगा या तुम उससे ख़रीदोगे या कम से कम जितनी देर उसके साथ रहोगे, उसकी खुशबू तुमको मिलती रहेगी। दूसरा प्रकार : बुरा मित्र एवं साथ बैठने वाला, जो अल्लाह की राह से रोके, गुनाह के कामों में मदद करे, तुम उसके बुरे काम देखो और उसकी मित्रता एवं उसके साथ रहने से तुम्हार व्यक्तित्व पर आँच आए। ऐसे मित्र की मिसाल लोहार की तरह है, जो भट्टी फूँकता रहता हो। वह या तो उड़ती हुई चिंगारियों से तुम्हारे कपड़े जला देगा या फिर उसकी भट्टी के दर्गंध से तुम्हारी तबीयत बेचैन रहेगी।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अक्सर इस बात की दुआ किया करते थे कि अल्लाह आपको दीन पर सुदृढ़ता प्रदान करे और गुमराही तथा बहकावे से सुरक्षित रखे। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु को आश्चर्य हुआ कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ इतनी ज़्यादा क्यों करते हैं, इसलिए आपने उनको बता दिया कि इन्सान के दिल अल्लाह की उंगलियों में से दो उंगलियों के बीच में हैं। वह उनको जैसे चाहता है, पलटता रहता है। दिल ही ईमान तथा कुफ़्र का अवतरण स्थान है। दिल को अरबी में "क़ल्ब" कहा जाता है, क्योंकि बहुत ज़्यादा उलटता-पलटता रहता है। दिल हांडी में मौजूद उस पानी से भी ज़्यादा उलटता-पलटता रहता है, जो तेज़ आँच के कारण खौल रहा हो। ऐसे में अल्लाह जिस व्यक्ति को चाहता है, अपने मार्ग पर सुदृढ़ रखता है और जिसके दिल को चाहता है, अपने मार्ग से विचलित कर देता है।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस-ए-क़ुदसी में बताया है कि अल्लाह की ओर से जिस व्यक्ति की परीक्षा इस प्रकार ली जाए कि उसके किसी प्रिय, जैसे संतान, भाई, चचा, पिता, माता या मित्र की मृत्यु हो जाए और वह अल्लाह के यहाँ प्रतिफल प्राप्त होने की आशा में उसकी जुदाई पर सब्र कर ले, तो उसका प्रतिफल जन्नत के सिवा कुछ और नहीं है।
इस हदीस में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- स्वयं अपने, अपनी संतान तथा अपने धन पर बददुआ करने से मना कर रहे हैं। क्योंकि दुआ एक बहुत बड़ी चीज़ है और कभी-कभी अल्लाह उसे बंदों के हक़ में प्रभावी भी बना देता है। ऐसे में यदि वह ग्रहण हो जाए, तो उसका नुक़सान ख़ुद बददुआ करने वाले को ही, उसकी जान, माल एवं संतान की क्षति के रूप में उठाना पड़ेगा।
इस हदीस में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि बंदे की दुआ उस समय तक ग्रहण होती है, जब तक वह किसी गुनाह के काम या संबंध विच्छेद की दुआ न करे और जल्दबाज़ी न दिखाए। यह सुन किसी ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! जल्दबाज़ी से क्या मुराद है, जिसके कारण दुआ ग्रहण होने से रह जाती है? तो फ़रमाया : बंदा यह कहे कि मैंने बार-बार दुआ की, लेकिन मेरी दुआ ग्रहण नहीं हुई और फिर जल्दबाज़ी दिखाते हुए दुआ करना बंद कर दे।