





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "रमज़ान से एक या दो दिन पहले रोज़े न रखो। परन्तु जो व्यक्ति (पहले से) रोज़े रख रहा हो, वह रख सकता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सावधानी के तौर पर रमज़ान के एक या दो दिन पहले से रोज़ा शुरू कर देने से मना किया है। इसका कारण यह है कि रमज़ान के रोज़े की अनिवार्यता चाँद देखने से जुड़ी हुई है और तकल्लुफ़ की कोई आवश्यकता नहीं है। अलबत्ता अगर किसी ने पहले से रोज़ा रखने का कोई मामूल बना रखा हो, जैसे एक दिन रोज़ा रखना और एक दिन नाग़ा करना, या फिर सोमवार या बृहस्पतिवार के रोज़े रखना और मामूल का दिन रमज़ान से एक-दो दिन पहले पड़ जाए, तो वह उस दिन रोज़ा रख सकता है। क्योंकि यह रमज़ान का स्वागत नहीं है। इसी तरह, वाजिब रोज़े जैसे- क़ज़ा एवं मन्नत के रोज़े भी रमज़ान से एक-दो दिन पहले रखे जा सकते हैं।
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े (सब पर) एक साअ् खजूर या एक साअ् जौ फ़र्ज़ क़रार दिया है और आदेश दिया है कि उसे नमाज़ के लिए लोगों के निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने रमज़ान के बाद ज़कात अल-फ़ित्र वाजिब की है, जो एक साअ् यानी चार मुद है। मुद दरअसल एक औसत क़द-काठी के इन्सान के लप भर को कहते हैं। ज़कात-ए-फ़ित्र हर ऐसे मुसलमान पर वाजिब है, जिसके पास एक दिन तथा एक रात के खाने से अधिक वस्तु मौजूद हो। ग़ुलाम हो कि आज़ाद, पुरुष हो कि महिला और छोटा हो कि बड़ा। इन्सान ज़कात-ए-फ़ित्र अपनी ओर से तथा ऐसे सभी लोगों की ओर से अदा करेगा, जिनका भरण-पोषण वह करता हो। साथ ही यह भी आदेश दिया कि फ़ितरा लोगों के ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "किसी मुसलमान औरत के लिए जायज़ नहीं कि एक दिन एवं एक रात की यात्रा किसी महरम के बिना करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि किसी मुसलमान स्त्री के लिए किसी महरम व्यक्ति को साथ लिए बिना एक रात की दूरी का सफ़र करना हराम है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो रोज़ा रख कर भूल कर खा ले अथवा पी ले, वह अपना रोज़ा पूरा करे, क्योंकि उसे अल्लाह ने खिलाया एवं पिलाया है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिसने फ़र्ज़ या नफ़ल रोज़ा की हालत में भूलकर कुछ खा या पी लिया, वह अपना रोज़ा पूरा करे। उसे न तोड़। क्योंकि उसने जान-बूझकर खाया या पिया नहीं है। बल्कि ख़ुद अल्लाह ने उसे खिलाया और पिलाया है।
इब्न-ए-अज़हर के आज़ाद किए हुए ग़ुलाम अबू उबैद से रिवायत है, वह कहते हैं : मैंने उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- के साथ ईद की नमाज़ अदा की। उन्होंने फ़रमाया कि यह दो दिन ऐसे हैं, जिनमें रोज़ा रखने से अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मना किया है। एक (रमज़ान के) रोज़ों के बाद इफ़तार (ईद अल-फ़ित्र) का दिन, और दूसरा वह दिन, जिसमें तुम अपनी क़ुरबानी का मांस खाते हो (यानी ईद अल-अज़हा का दिन)।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ईद अल-फ़ित्र के दिन एवं ईद अल-अज़हा के दिन रोज़ा रखने से मना किया है। ईद अल-फ़ित्र के दिन इसलिए कि उस दिन महीना भर रोज़ा रखने के बाद रोज़ा तोड़ने का दिन है और ईद अल-अज़हा के दिन इसलिए कि वह क़ुर्बानी का मांस खाने का दिन है।
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के तलबिया में यह शब्द हुआ करते थे: (ऐ अल्लाह! मैं उपस्थि हूँ। मैं उपस्थित हूँ। मैं उपस्थित हूँ, तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ, निस्संदेह हर प्रशंसा और नेमत तेरी है और तेरी ही बादशाहत है, तेरा कोई साझी नहीं है।) वर्णनकर्ता कहते हैं कि अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- इसमें इन शब्दों की वृद्धि कर लिया करते थे : (मैं उपस्थित हूँ। मैं उपस्थित हूँ। मेरा सौभाग्य है तेरे पास आना। भलाई तेरे ही हाथ में है। चाहत तेरी ही है और अमल भी तेरे ही लिए है।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब हज या उमरा में प्रवेश करना चाहते, तो यह तलबिया कहते : (मैं उपस्थित हूं ऐ अल्लाह, मैं पूर्णतः उपस्थित हूं) ऐ अल्लाह! मैं निष्ठा, एकेश्वरवाद एवं हज आदि के आह्वान पर अनिवार्य रूप से उपस्थित हूँ। (मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं) क्योंकि तू ही अकेला इबादत का हक़दार है। तेरे पालनहार एवं पूज्य होने तथा तेरे नामों एवं गुणों में तेरा कोई साझी नहीं है। (निस्संदेह प्रशंसा), आभार एवं स्तुति तेरी ही है। (एवं नेमत) तेरी ही ओर से प्राप्त होती है और यह चीज़ें तू ही प्रदान करता है, और ये सब (तेरे ही लिए हैं।) इन सभी चीज़ों पर हर हाल में तेरा ही अधिकार है। (एवं बादशाहत) भी तेरी ही है। (तेरा कोई साझी नहीं है।) अतः यह सारी चीज़ें तेरे ही लिए हैं। अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- इसमें इन शब्दों की वृद्धि करते थे : (मैं उपस्थित हूं, और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उपस्थित हूं।) मैं तेरे दरबार में उपस्थि हूँ। मुझे बार-बार यह सौभाग्य प्रदान कर। एवं सारी की सारी (भलाई तेरे हाथ में है।) और तेरे अनुग्रह से ही प्राप्त होती है। (मैं उपस्थित हूं, और मेरी समस्त आशाएँ और इच्छाएँ केवल तुझी से हैं।) माँगा उसी से जाता है, जिसके हाथ में भलाई होती है। (एवं सारे अमल) भी तेरे लिए हैं कि तू ही इबादत का हक़दार है।
आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "शब-ए-क़द्र को (रमज़ान के) अंतिम दस दिनों की विषम रातों में तलाश करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अधिक से अधिक नेकी के कामों के साथ लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) को तलाश करने की कोशिश करने की प्रेरणा दी है। लैलतुल क़द्र के बारे में इसकी ज़्यादा आशा है कि वह रमज़ान के अंतिम दस दिनों की विषम रातों यानी इक्कीसवीं, तेईसवीं, पच्चीसवीं, सत्ताईसवीं और उनतीसवीं रातों में से किसी एक रात में हुआ करती है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है कि : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कुछ सहाबा को स्वप्न में दिखाई दिया कि शब-ए-क़द्र (रमज़ान की) अंतिम सात रातों में है। इसपर आपने फ़रमाया : "मैं देख रहा हूँ कि तुम सब के स्वप्न अंतिम सात रातों पर एकमत हो गए हैं। इसलिए जिसे इस रात की तलाश हो, वह अंतिम सात रातों में तलाश करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कुछ साथियों ने सपना देखा कि शब-ए-क़द्र रमज़ान महीने की अंतिम सात रातों में हुआ करती है। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे स्वप्न रमज़ान की अंतिम दस तिथियों के बारे में सहमत हैं। इसलिए जिसके अंदर इस रात को पाने की इच्छा तथा चाहत हो, वह अधिक से अधिक अच्छे कर्म के साथ इस रात को ढूँढने का प्रयास करे। क्योंकि इसके अंतिम सात तिथियों में होने की संभावना अधिक है। ज्ञात हो कि अंतिम सात रातें रमज़ान महीने के तीस दिन के होने की स्थिति में चौबीसवीं रात से शुरू होती हैं और उनतीसव दिन के होने की स्थिति में तेईसवीं रात से शुरू होती हैं।
अबू ज़र रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कुछ सहाबा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा : हे अल्लाह के रसूल, धनवान लोग सवाब (पुण्य) ले गए; वे हमारी तरह नमाज़ पढ़ते हैं, हमारी तरह रोज़ा रखते हैं, और अपनी अतिरिक्त संपत्ति से सदक़ा (दान) करते हैं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : “क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए वह चीज़ें नहीं बनाई हैं, जिनसे तुम सदक़ा कर सकते हो? हर तस्बीह (सुब्हानल्लाह कहना) सदक़ा है, हर तकबीर (अल्लाहु अकबर कहना) सदक़ा है, हर तहमीद (अल्ह़म्दु लिल्लाह कहना) सदक़ा है, हर तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह कहना) सदक़ा है, भलाई का आदेश देना सदक़ा है, बुराई से रोकना सदक़ा है, और तुम्हारे किसी के साथ वैवाहिक संबंध बनाना भी सदक़ा है।” सहाबा ने पूछा : हे अल्लाह के रसूल, क्या हम अपनी कामवासना पूरी करते हैं तो उसमें भी सवाब (पुण्य) मिलता है? नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : “तुम्हारा क्या विचार है यदि वह इस कामवासना को हराम (अवैध) रूप से पूरी करता है, तो क्या उसे इस पर गुनाह नहीं होता? तो इसी तरह, जब वह इस कामवासना को हलाल (वैध) रूप से पूरी करताता है, तो उसे उस पर पुण्य मिलता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैकुछ निर्धन सहाबा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर अपनी ग़रीबी और अपने मालदार भाइयों की तरह सदक़ा करके बड़ा सवाब प्राप्त न कर पाने और नेकी के कामों में उनके बराबर न हो पाने की शिकायत की और कहा कि हम नमाज़ पढ़ते हैं तो वह भी नमाज़ पढ़ते हैं और हम रोज़ा रखते हैं तो वह भी रोज़ा रखते हैं, लेकिन इसके साथ ही वह अपने अतिरिक्त धन में से सदक़ा करके हम से आगे बढ़ जाते हैं, जबकि हमारे पास सदक़ा करने के लिए कुछ नहीं होता। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको सदक़े के कुछ ऐसे रूप बता दिए, जो वे कर सकते थे। फ़रमाया : क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए सदक़ा करने की राहें निकाल नहीं रखी हैं? 'सुबहानल्लाह' कहना सदक़ा है, 'अल्लाहु अकबर' कहना सदक़ा है, 'अल-हम्दु लिल्लाह' कहना सदक़ा है, 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना सदक़ा है, भलाई का आदेश देना सदक़ा है, बुराई से रोकना सदक़ा है, बल्कि अपनी पत्नी से संभोग करना भी सदक़ा है। सहाबा को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! हमें अपनी वासना पूरी करने का भी सवाब मिलेग? आपने उत्तर दिया : अच्छा यह बताओ कि अगर वह हराम जगह से वासना पूरी करे, जैसे व्यभिचार आदि में लिप्त हो जाए, तो गुनाह होगा या नहीं? बस इसी तरह अगर वासना हलाल जगह से पूरी करता है, तो सवाब मिलेगा।