





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "कर्तव्यनिष्ठ दास के लिए दोगुना प्रतिफल है।" उस हस्ती की क़सम, जिसके हाथ में अबू हुरैरा की जान है, यदि अल्लाह के मार्ग में जिहाद, हज तथा माँ की देख-रेख की ज़िम्मेवारी न होती, तो मैं इस बात को पसंद करता कि दासता की अवस्था में मरूँ।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अम्र बिन अबसा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि मैं जाहिलियत काल में यह समझता था कि लोग गुमराह हैं और वे किसी सही पथ पर नहीं हैं। लोग मुर्तियों की पूजा किया करते थे। इसी बीच मैंने सुना कि एक व्यक्ति मक्का में कुछ बातें बता रहा है। अतः, अपनी सवारी पर बैठकर उसके पास पहुँच गया। वह व्यक्ति अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- थे, जो अपनों के अत्याचार के कारण छुपकर दावत दे रहे थे। मैं चुपके से मक्का में आपके पास आया और कहा : आप कौन हैं? फ़रमाया : “मैं नबी हूँ।" मैंने कहा : नबी क्या होता है? फ़रमाया : “मुझे अल्लाह ने भेजा है।" मैंने कहा : क्या देकर भेजा है? फ़रमाया : “सगे-संबंधियों पर उपाकर करने, बुतों को तोड़ने तथा एक अल्लाह को मानने और उसके साथ किसी को साझी न बनाने का आदेश देकर भेजा है।" मैंने कहा : इसमें कौन लोग आप के साथ हैं? फ़रमाया : “एर आज़ाद और एक गुलाम।" उस समय आपके साथ अबू बक्र और बिलाल थे। मैंने कहा : मैं भी आपका अनुसरण करना चाहता हूँ। फ़रमाया : “आज तुम इसकी क्षमता नहीं रखते। क्या तुम नहीं देख रहे हो कि मेरे साथ लोगों का क्या आचरण है? लेकिन अपने घर लौट जाओ और जब सुनो कि मैं खुलेआम प्रचार करने लगा हूँ, तो मेरे पास आ जाना।" वह कहते हैं कि मैं अपने घर वापस आ गया और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मदीना पधारे और मेरे घर के कुछ लोग भी मदीना पहुँचे। मैंने उनसे पूछा कि मदीना आने वाले व्यक्ति का क्या समाचार है? उन लोगों ने कहा : लोग बड़ी जल्दी से उनके पास आ रहे हैं। उनके समुदाय ने उन्हें क़त्ल करना चाहा था, लेकिन क़त्ल नहीं कर सके। फिर मैं मदीना आया और आपके पास जाकर कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप मुझे पहचानते हैं? फ़रमाया : “हाँ, तुम ही तो हो न, जो मुझसे मक्का में मिले थे?" कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, आप मुझे वह चीज़े बताएँ, जो अल्लाह ने आपको सिखाया है और मैं नहीं जानता हूँ। मुझे नमाज़ के बारे में बताएँ। फ़रमाया : “सुबह की नमाज़ पढ़ो और फिर नमाज़ न पढ़ो, यहाँ तक कि सूर्य एक भाला के बराबर हो जाए; क्योंकि सूर्य शैतान की दो सींगों के बीच निकलता है और उस समय काफ़िर उसे सजदा करते हैं। फिर नमाज़ पढ़ो, क्योंकि नमाज़ के समय फ़रिश्ते उपस्थित होते हैं और लिखते हैं, यहाँ तक कि क्षाया भाले के साथ खड़ी हो जाए, तो फिर नमाज़ से रुक जाओ; क्योंकि उस समय जहन्नम की अग्नि भड़काई जाती है। फिर जब क्षाया आगे बढ़ जाए, तो नमाज़ पढ़ो; क्योंकि फ़रिश्ते उपस्थित होकर लिखते हैं और उसकी गवाही भी देंगे। ऐसा अस्र की नमाज़ पढ़ने तक करते रहो। फिर -जब अस्र की नमाज़ पढ़ लो- तो सूर्य अस्त होने तक नमाज़ न पढ़ो; क्योंकि सूर्य शैतान की दो सींगों के बीच अस्त होता है और उस समय काफ़िर उसे सजदा करते हैं। वह कहते हैं मैंने कहाः ऐ अल्लाह के नबी, मुझे वज़ू के बारे में बताएँ। फ़रमाया : “तुममें से जो भी वज़ू का पानी पास लेता है और कुल्ली करता है तथा नाक में पानी डालकर नाक झाड़ता है, तो उसके चेहरे के पाप दाढ़ी के किनारों से पानी के साथ झड़ जाते हैं। फिर जब दोनों हाथों को कोहनी सहित धोता है, तो उसके दोनों हाथों के पाप पानी के साथ उँगलियों के पोरों से झड़ जाते हैं। फिर जब सिर का मसह करता है, तो उसके सिर के पाप बालों के किनारों से पानी के साथ गिर जाते हैं। फिर जब दोनों पैरों को टखनों समेत धोता है, तो उसके पैरों के पाप पानी के साथ उँगलियों के पोरों से झड़ जाते हैं। अब अगर वह नमाज़ पढ़ने खड़ा होता है और अल्लाह की प्रशंसा करता है और उसकी बड़ाई बयान करता है, जिसका वह अधिकारी है, तथा अपने दिल को अल्लाह से जोड़ लेता है, तो वह पापों से इस तरह निकल आता है, जैसे उस दिन होता है, जिस दिन उसकी माँ ने जना हो।" जब अम्र बिन अबसा ने यह हदीस अल्लाह के रसूल –सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबी अबू उमामा –रज़ियल्लाहु अनहु- को बताई, तो अबू उमामा ने कहा : ऐ अम्र बिन अबसा, देख लो तुम क्या कह रहे हो! एक ही स्थान पर इस व्यक्ति को इतनी नेकियाँ दी जा रही हैं! तो अम्र ने कहा : ऐ अबू उमामा! मेरी आयु अधिक हो चुकी है, मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, मौत का समय भी समीप हो चुका है और इस अवस्था में मुझे अल्लाह तआला एवं उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर झूठ बोलने की कोई आवश्यक्ता नहीं है! यदि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से इसे एक, दो, तीन बार -उन्होंने सात बार तक गिना दिया- भी सुना न होता, तो मैं कभी नहीं बताता, लेकिन मैंने इससे भी अधिक बार सुना है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अनस -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि अबू तलहा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- का एक पुत्र बीमार था। अबू तलहा कहीं बाहर गए, तो उसकी मृत्यू हो गई। जब वह लौटकर आए, तो कहा : मेरे बेटे का क्या हुआ? बच्चे की माँ उम्मे सुलैम ने कहा : वह पहले से अधिक आराम में है। फिर उन्होंने उनके सामने खाना रख दिया, तो उन्होंने रात का खाना खाया। उसके बाद पत्नी से सहवास भी किया। जब वह यह सब कुछ कर चुके, तो उनकी पत्नी ने कहा : लोगों ने बच्चे को दफ़न कर दिया है। सुबह हुई, तो अबू तलहा अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और सब कुछ बताया। आपने उनसे पूछा : “क्या तुमने आज रात को सहवास किया है?” उन्होंने उत्तर दिया : हाँ। फ़रमायाः “ऐ अल्लाह इन दोनों में बरकत दे!” चुनाँचे उनके यहाँ बच्चा पैदा हुआ, तो अबू तलहा ने मुझसे कहा कि उसे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास ले जाओ। उन्होंने साथ में कुछ खजूरें भी भेजीं। जब हम वहाँ पहुँचे, तो आपने पूछा : “क्या इसके साथ कुछ है?” मैंने कहा : हाँ कुछ खजूरें हैं। तो नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें लेकर अपने मुँह में रखकर चबाया, फ़िर उसे अपने मुँह से निकालकर बच्चे के मुँह में डाल दिया और उसका नाम अब्दुल्लाह रखा। एक रिवायत में है : इब्ने उययना फरमाते हैं : एक अंसारी ने कहा : मैंने नौ बच्चे देखे। प्रत्येक बच्चा क़ुरआन पढ़ने वाला था। यानी उस नवजात अब्दुल्लाह की संतान-संतति में से। एक और रिवायत में है : अबू तलहा का एक बेटा मर गया, तो उम्मे सुलैम ने अपने घर वालों से कहा कि अबू तलहा को मुझसे पहले कोई इस संबंध में न बताए। जब अबू तलहा घर आए, तो उम्मे सुलैम ने रात का खाना सामने रखा और उन्होंने खा-पी लिया। फिर उम्मे सुलैम ने अबू तलहा के लिए उसी तरह बेहतरीन अंदाज़ में बनाव सिंगार किया, जैसे वह पहले किया करती थीं और अबू तलहा ने उनसे सहवास कर लिया। जब उम्मे सुलैम ने देखा कि अबू तलहा आसूदा हो चुके हैं और सहवास भी कर चुके हैं, तो कहने लगीं : ऐ अबू तलहा! आपका क्या ख़याल है, यदि कुछ लोग किसी घर वाले को कोई सामान प्रयोग करने के लिए दें और फिर वे उनसे वापस माँगे, तो क्या प्रयोग के लिए लेने वाले उसे रोक सकते हैं? अबू तलहा ने कहा : नहीं। उम्मे सुलैम ने कहा : समझ लो कि वह सामान तुम्हारा बेटा ही है। अनस –रज़ियल्लाहु अनहु- का कहना है कि इसपर अबू तलहा नाराज़ हो गए और बोले : तुमने मुझे छोड़े रखा, यहाँ तक कि जब मैं नापाक हो गया, तो मुझे मेरे बेटे की सूचना दी! फिर वह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और पूरी घटना बताई, तो आपने फ़रमाया : “अल्लाह तुम्हारी रात में बरकत दे। अनस –रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : चुनाँचे वह गर्भवती हो गईं। अनस –रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक यात्रा में थे और उम्मे सुलैम भी उनके साथ थीं। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब यात्रा से मदीना आते, तो रात के समय मदीने में दाख़िल नहीं होते थे। चुनाँचे जब वे मदीने के निकट आए, तो उम्मे सुलैम को प्रसव पीड़ा आरंभ हो गई। अतः, उनकी देखभाल के लिए अबू तलहा को रुकना पड़ा। जबकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- चल पड़े। अनस –रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : ऐस में, अबू तलहा ने कहा : ऐ मेरे रब! तू जानता है कि जिस तरह मुझे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ निकलना पसंद है, उसी तरह आपके साथ वापस होना भी पसंद है। और अब मुझे जिस कारण से रुकना पड़ रहा है, उसे तू देख रहा है! चुनाँचे उम्मे सुलैम ने कहा : मुझे जो प्रसव पीड़ा महसूस हो रही थी, वह अब महसूस नहीं हो रही है। अतः, अब चलो, चलते हैं। चुनाँचे हम चल पड़े। जब दोनों मदीना पहुँच गए, तो उनको एक बेटा पैदा हुआ। मेरी माँ ने मुझसे कहा : ऐ अनस! इसे कोई दूध न पिलाए, यहाँ तक कि तुम इसे सुबह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास ले जाओ। सुबह हुई, तो मैं उसे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास ले गया। … फिर उन्होंने पूरी हदीस बयान की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि जब अल्लाह तआला ने अपने रसूल को मक्का पर विजय प्रदान की, तो खुज़ाआ क़बीले ने बनू लैस क़बीले के एक व्यक्ति को, अपने एक व्यक्ति के बदले में क़त्ल कर दिया, जो जाहिलियत काल में क़त्ल हुआ था। ऐसे में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- खड़े हुए और फ़रमायाः "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मक्का से हाथी वालों को रोक दिया था और उसने अपने रसूल तथा मोमिनों को उसपर विजय प्रदान की है। देखो, यह न तो मुझसे पहले किसी के लिए हलाल हुआ था और न मेरे बाद किसी के लिए हलाल होगा। यह मेरे लिए भी केवल दिन की एक घड़ी के लिए हलाल हुआ था और इस समय हराम है। न उसका पेड़ काटा जा सकता है, न उसकी ताज़ा घास को काटा जा सकता है, न उसके काँटे को काटा जा सकता है और न उसके गिरे हुए सामान को उठाया जा सकता है। हाँ, यदि कोई एलान करने के लिए उठाए, तो और बात है। तथा जिसके किसी व्यक्ति को मार दिया जाए, उसे दो बातों में से जो बेहतर लगे, करने का अख़्तियार होगा; या तो क़त्ल करे या दियत (वह धन जो किसी को मार डालने या अंग भंग करने के बदले में दिया जाए) ले।" इतने में यमन का अबू शाह नामी एक व्यक्ति खड़ा हुआ और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे लिए लिख दीजिए। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "अबू शाह के लिए लिख दो।" फिर अब्बास - रज़ियल्लाहु अन्हु- खड़े हुए और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, हमें इज़ख़िर नामक पौधे को काटने की अनुमति दीजिए, क्योंकि हम उसे अपने घरों और क़ब्रों में डालते हैं। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "हाँ, इज़ख़िर पौधे को काटने की अनुमति है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) बता रहे हैं कि जब मक्का पर विजय प्राप्त हुई, तो ख़ुज़ाआ क़बीले के एक व्यक्ति ने हुज़ैल क़बीले के एक व्यक्ति का, अपने एक व्यक्ति के बदले में, जो जाहिलियत काल में मारा गया था, वध कर दिया। यह देख नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खड़े हुए और ख़ुतबे में वह सारी बातें कहीं, जिनका ज़िक्र हदीस में है। चुनांचे मक्का की हुरमत बयान की और यह बताया कि अल्लाह ने उससे हाथी वालों को रोक दिया था और अपने नबी के लिए दिन के कुछ समय के लिए हलाल किया था। विदित हो कि इस हदीस में उल्लिखित शब्द 'الساعة' से आशय उसका आम अर्थ यानी एक घंटा नहीं, बल्कि उससे आशय विजय दिवस का कुछ भाग है। क्योंकि उस दिन सुबह से अस्र तक आपके लिए युद्ध करना हलाल किया गया था। आपने यह भी बताया कि उसके बाद फिर उसकी हुरमत लौट आई। साथ ही यह भी बताया कि उसके काँटे को काटा नहीं जा सकता, उसके पेड़ को नहीं काटा जा सकता और इज़खिर के सिवा हरम की सीमाओं के अंदर उगने वाली किसी घास को काटा नहीं जा सकता और वहाँ पड़े हुए किसी सामान को उठाया नहीं जा सकता। यह और बात है कि कोई एलान करने के लिए उठाए।
अबू हुरैरा और ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी -रज़ियल्लाहु अनहुमा- कहते हैं कि एक देहाती अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर बोलाः ऐ अल्लाह के रसूल, मैं आपको अल्लाह की क़सम देकर कहता हूँ कि आप हमारे बीच केवल अल्लाह की पुस्तक के अनुसार निर्णय करेंगे। दूसरे व्यक्ति ने, (जो पहले की तुलना में अधिक समझदार था) कहाः ठीक है, आप हमारे बीच अल्लाह की किताब के अनुसार निर्णय कर दें और मुझे बोलने की अनुमति दें। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "ठीक है, कहो।" उसने कहाः मेरा बेटा इस आदमी के यहाँ काम करता था और उसने इसकी पत्नी से व्यभिचार कर लिया। मुझे बताया गया है कि मेरे बेटे को संगसार किया जाना है। अतः मैंने उसकी गरदन छुड़ाने के लिए सौ बकरी और एक दासी दे दी। फिर मैंने जानकारों से पूछा, तो बताया कि मेरे बेटे को सौ कोड़े लगाने हैं और एक साल देश निकाला देना है, जबकि उसकी पत्नी को संगसार किया जाना है। यह सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "उस ज़ात की क़सम, जिसके हाथ में मेरे प्राण हैं, मैं तुम्हारे बीच अल्लाह की पुस्तक के अनुसार ही निर्णय करूँगा। दासी और बकरियाँ तुम्हें वापस मिलेंगी। तुम्हारे बेटे को सौ कोड़े लगेंगे और उसे एक साल का देश निकाला दिया जाएगा। ऐ उनैस (असलम क़बीले का एक व्यक्ति), तुम इसकी पत्नी के पास जाओ। यदि वह स्वीकार कर ले, तो उसे संगसार (इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का प्राणदंड जिसमें अपराधी को ज़मीन में कमर तक गाड़कर उसके सिर पर पत्थरों की वर्षा करके मार दिया जाता है) कर दो।" चुनांचे उनैस -रज़ियल्लाहु अनहु- उसके पास गए और उसने स्वीकार कर लिया, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के आदेश पर उसे संगसार कर दिया गया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में बताया गया है कि एक व्यक्ति दूसरे के यहाँ काम करता था और उसकी पत्नी से व्यभिचार कर लिया। व्यभिचार करने वाले के पिता ने सुन रखा था कि हर व्यभिचारी का संगसार होना है, इसलिए गरदन छुड़ाने के लिए उस स्त्री के पति को सौ बकरी और एक दासी दे दी। उसके बाद कुछ जानकार लोगों से पूछा, तो पता चला कि संगसार उसके बेटे का नहीं, बल्कि उस स्त्री का होना है। जबकि उसके बेटे को सौ कोड़ लगने हैं और एक वर्ष के लिए देश से निकालना है। अतः, व्यभिचारिणी का पति और व्यभिचारी का पिता, दोनों अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, ताकि आप उनके बीच अल्लाह की किताब के अनुसार निर्णय कर दें। चुनांचे आपने सौ बकरियाँ और दासी व्यभिचारी के पिता को लौटा दी और उसे बताया कि उसके बेटे को सौ कोड़े लगने हैं और एक वर्ष के लिए देश से निकालना है, क्योंकि वह शादीशुदा नहीं है। फिर आपने व्यभिचारिणी से पूछताछ का आदेश दिया और जब उसने अपराध स्वीकार कर लिया, तो उसे संगसार कर दिया, क्योंकि वह शादीशुदा थी।
अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें किसी जंग में भय की नमाज़ पढ़ाई। एक जमात आपके साथ खड़ी हो गई और एक जमात शत्रु के सामने खड़ी रही। जो लोग आपके साथ थे, उन्हें आपने एक रकात पढ़ाई। फिर वह लोग चले गए और दूसरे लोग आए। आपने उन्हें भी एक रकात पढ़ाई। फिर दोनों गिरोहों ने बाद में एक-एक रकात पढ़ ली।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने, सहाबा को बहुदेववादियों के विरुद्ध किए गए किसी युद्ध में, भय की नमाज़ पढ़ाई, जब मुसलमानों को अपने काफ़िर शत्रुओं का सामना था और इस बात का भय था कि कहीं काफ़िर उन्हें नमाज़ पढ़ते देख उनपर धावा न बोल दें। चूँकि दुश्मन क़िबले की दिशा में नहीं थे, इसलिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों को दो भागों में बाँट दिया; एक भाग आपके साथ नमाज़ में खड़ा हो गया और दूसरा भाग दुश्मन के सामने खड़ा होकर नमाज़ियों की पहरेदारी करता रहा। चुनांचे आपने अपने साथ खड़े लोगों को एक रकात पढ़ाई। फिर वे जाकर दुश्मन के सामने खड़े हो गए और नमाज़ में ही रहे। फिर दूसरा गिरोह आया, जो नमाज़ में शामिल नहीं था तथा आपने उन्हें एक रकात पढ़ाकर सलाम फेर दिया। अब बाद में आपके साथ शामिल होने वाला गिरोह खड़ा हुआ और शेष एक रकात पढ़कर पहरेदारी के लिए चला गया और पहले गिरोह ने भी शेष एक रकात पढ़ ली। यह भय की नमाज़ का एक तरीक़ा है। इसका उद्देश्य अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) के मुताबिक कुछ इस प्रकार हैः सारे लोग नमाज़ में रहे, लेकिन एक-दूसरे की पहरेदारी करते रहे।
ज़ुबैर बिन अव्वाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि उम्म-ए-कुलसूम बिंत उक़बा उनके निकाह में थीं। वह गर्भावस्था में थीं कि ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अंहु) से बोलीं : मुझे एक तलाक़ देकर मेरा दिल ख़ुश कर दो। सो, ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें एक तलाक़ दे दिया। फिर नमाज़ के लिए निकल पड़े। जब वापस आए, तो देखा कि बच्चे का जन्म हो चुका है। यह देख उन्होंने कहा : यह क्या है? इसने मुझे धोखा दिया है, अल्लाह इसे धोखा दे। फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, तो आपने फ़रमाया : “इद्दत पूरी हो चुकी है। अब तुम उसे नए सिरे से निकाह का संदेश भेजो।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब अंतिम रकात में रुकू से सर उठाते, तो कहते : “ऐ अल्लाह! अय्याश बिन अबू रबीआ, सलमा बिन हिशाम, वलीद बिन वलीद और दुर्बल मोमिनों को मुक्ति दिला दे। ऐ अल्लाह! मुज़र पर अपनी पकड़ सख्त कर। ऐ अल्लाह! उन्हें यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के युग में होने वाले सूखे जैसे सूखे से ग्रस्त कर।” तथा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह भी फ़रमाया : “अल्लाह क़बीला ग़िफ़ार को क्षमा करे और क़बीला असलम को सुरक्षित रखे।” इब्न अबू ज़िनाद अपने पिता से रिवायत करते हैं कि यह सब सुबह की नमाज़ में होता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बनी इसराईल के एक व्यक्ति की घटना सुनाई, जिसने बनी इसराईल के एक अन्य व्यक्ति से एक हज़ार दीनार क़र्ज के रूप में माँगे थे। उसने कहा : कुछ गवाह ले आओ, जिन्हें मैं गवाह बना सकूँ। इसपर उस व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की गवाही काफ़ी है। फिर उसने कहा : कोई ज़मानतदार ले आओ। इसपर उसने कहा : जमानतदार के रूप में अल्लाह ही काफ़ी है। अब उसने कहा : चलो ठीक है। सो उसने एक निर्धारित समय के लिए उसे एक हज़ार दीनार दे दिए। दीनार लेकर वह समुद्री यात्रा पर निकल गया और अपना काम पूर कर लिया। फिर क़र्ज़ अदा करने के समय पर आना चाहा, लेकिन कश्ती ढूँढने के बावजूद न मिली। ऐसे में उसे एक लकड़ी मिली। उसने लकड़ी के अंदर छेद किया और उसमें एक हज़ार दीनार तथा उधार वाले के नाम एक चिट्ठी रखकर उसके खाली स्थान को बराबर कर दिया और समुद्र के पास खड़ा होकर बोला : ऐ अल्लाह! तू जानता है कि मैंने अमुक व्यक्ति से एक हज़ार दीनार क़र्ज़ लिया था। उस समय उसने गवाह माँगा, तो मैंने कहा था कि अल्लाह की गवाही काफ़ी है। वह तेरे नाम पर राज़ी हो गया। फिर उसने ज़मानतदार माँगा, तो मैंने कहा कि अल्लाह की ज़मानत काफ़ी है। वह उस समय भी तेरे नाम पर तैयार हो गया। अब मैंने बड़ी दौड़-भाग की कि कोई कश्ती मिल जाए और मैं उसके दीनार भेज सकूँ, लेकिन मुझे कोई कश्ती न मिल सकी। अतः अब मैं इन्हें तेरे हवाले करता हूँ। यह कहकर उसने लकड़ी को समुद्र में डाल दिया और लकड़ी उसके अंदर चली गई। फिर वह चल पड़ा, किन्तु इसी फ़िराक में था कि कोई कश्ती मिल जाए और वह अपना देश वापस जा सके। उधर क़र्ज़ देने वाला यह देखने के लिए निकला कि शायद कोई कश्ती उसके धन के साथ आई हो। इतने में अचानक उसकी नज़र उसी लकड़ी पर पड़ी, जिसमें उसके दीनार थे। उसने उसे जलावन के तौर पर उठा लिया। जब उसे फाड़ा, तो उसके अंदर से दीनार और चिट्ठी निकली। दूसरी ओर क़र्ज़ लेने वाला भी आ गया और एक हज़ार दीनार प्रस्तुत करते हुए कहा : अल्लाह की क़सम! मैं आपका माल अदा करने के लिए कश्ती ढूँढता रहा, लेकिन इससे पहले कोई कश्ती न मिल सकी। क़र्ज़ देने वाले ने कहा : क्या तुमने मुझे कुछ भेजा था? उसने कहा : मैंने तो तुम्हें अभी-अभी बताया कि मुझे इससे पहले कोई कश्ती न मिल सकी। उधार देने वाले ने कहा : अल्लाह ने तुम्हारा वह धन पहुँचा दिया है, जो तुमने लकड़ी के अंदर रखकर भेजा था। अतः, अब तुम अपने हज़ार दीनार के साथ वापस हो जाओ। तुमने वचन निभाने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया है। ”
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस में बयान किया है कि बनी इसराईल के एक व्यक्ति ने अपने ही समुदाय के एक व्यक्ति से हज़ार दीनार क़र्ज़ माँगा। उसने कहाः कोई गवाह लाओ, जो गवाही दे कि तुमने मुझसे हज़ार दीनार लिए हैं। क़र्ज़ माँगने वाले ने कहाः मेरे तथा तुम्हारे बीच गवाह बनने के लिए अल्लाह काफ़ी है। उसने कहाः फिर कोई ज़मानतदार लाओ, जो तुम्हारी ज़मानत दे सके। उसने कहाः ज़मानतदार के रूप में भी तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। उसने कहाः चलो, ठीक है। चुनांचे एक निर्धारित समय के लिए हज़ार दीनार दे दिए। फिर क़र्ज़ लेने वाला व्यक्ति दीनार लेकर, व्यवसाय के उद्देश्य से, समुद्री यात्रा में निकल पड़ा। जब ऋण अदा करने का समय आया, तो ऋण अदा करने को जाने के लिए सवारी ढूँढने लगा, लेकिन उसे कोई सवारी न मिल सकी। अतः उसने एक लकड़ी ली, उसमें छेद करके एक हज़ार दीनार और क़र्ज देने वाले के नाम पर एक चिट्ठी रख दी, जिसमें लिखा थाः यह चिट्ठी अमुक व्यक्ति की ओर से अमुक व्यक्ति के नाम है। मैंने आपके दीनार एक प्रतिनिधि के हवाले कर दिए हैं, जिसने मेरा प्रतिनिधित्व करने का ज़िम्मेवारी ले ली है। फिर छेद को बंद करके ठीक-ठाक कर दिया और उसे समुद्र के पास आकर यह कहते हुए समुद्र के हवाले कर दियाः ऐ अल्लाह, तुझे पता है कि मैंने अमुक से एक हज़ार दीनार क़र्ज़ लिया था। उस समय उसने मुझसे ज़मानतदार माँगा था, तो मैंने कहा था कि ज़मानतदार के तौर पर अल्लाह ही काफ़ी है, तो वह तेरी ज़मानत पर संतुष्ट हो गया था। उसने मुझसे गवाह माँगा था, तो मैंने कहा था कि गवाही के लिए अल्लाह ही काफ़ी है तथा वह संतुष्ट हो गया था। अब मैंने बड़ा प्रयास किया कि कोई कश्ती मिल जाए और मैं जाकर उसका क़र्ज़ उतार सकूँ, परन्तु कोई कश्ती न मिल सकी। अतः मैं उसकी अमानत तेरे हवाले करता हूँ। फिर उसे समुद्र में डाल दिया और लकड़ी पानी के अंदर चली गई। उसके बाद वह वापस हो गया, परन्तु निरन्तर कश्ती की तलाश में रहा, ताकि जाकर दूसरी बार एक हज़ार अदा कर सके, क्योंकि उसे लग रहा था कि पहले अदा करने का जो उपाय उसने अपनाया था, वह काफी नही था। जहाँ तक क़र्ज़ देने वाले की बात है, तो वह समय पर यह देखने के लिए निकला कि शायद कोई कश्ती आई हो, जिसमें उसका दिया हुआ माल हो। यानी उसने किसी के हाथ से भेजवाया हो या खुद लेकर आया हो। लेकिन उसे कोई कश्ती दिखाई न दी। किन्तु उसे वह लकड़ी नज़र आई, जिसमें उसके दीनार थे। उसने उसे उठा लिया, ताकि घर में जलावन के काम आ सके। उसे पता नहीं था कि इसमें उसके दीनार हैं। परन्तु जब उसे आरी से काटा, तो उसके दीनार और उसके नाम से लिखी चिट्ठी मिल गई। इसी बीच क़र्ज़ लेने वाला व्यक्ति भी आ गया और क़र्ज़ देने वाले को एक हज़ार दीनार थमाते हुए बोलाः अल्लाह की क़सम, मैंने पूरा प्रयत्न किया कि कोई कश्ती मिल जाए, परन्तु जिस कश्ती से मैं आया, उससे पहले कोई कश्ती न मिल सकी। उसकी बात सुनकर क़र्ज़ देने वाले ने कहाः क्या तुमने मेरी ओर कुछ भेजा था? उसने उत्तर दियाः मैं तो बता रहा हूँ कि जिस कश्ती से मैं आया हूँ, उससे पहले कोई कश्ती न मिल सकी। इस पर क़र्ज़ देने वाले ने कहाः अल्लाह ने तेरे एक हज़ार दीनार पहुँचा दिए हैं, जो तूने लकड़ी के अंदर रखकर भेजे थे। अतः अपने यह हज़ार दीनार वापस ले जाओ। तुमने अपना वचन पूरा कर दिया है।