





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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शक्ल बिन हुमैद (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कोई दुआ सिखा दीजिए। आपने फ़रमायाः कहोः اللهم إني أعوذ بك من شر سمعي، ومن شر بصري، ومن شر لساني، ومن شر قلبي، ومن شر مَنِيِّي" अर्थात, ऐ अल्लाह! मैं अपने कान, आँख, ज़ुबान, दिल और वीर्य की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में है कि शक्ल बिन हुमैद -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयों के बारे में पूछा। उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से न दुनिया माँगी, न धन माँगा और खाने की चीज़ माँगी, बल्कि एक दुआ सिखाने का निवेदन किया। वह चाहते थे कि आप उन्हें कोई ऐसी दुआ सिखा दें, जिससे वह अपने धर्म एवं संसार का लाभ अर्जित कर सकें। दरअसल यही हाल था अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों का। वे सदा अल्लाह के अनुग्रह तथा उसकी प्रसन्नता की खोज में रहते थे। उनके निवेदन पर आपने उनका मार्गदर्शन इस महत्वपूर्ण दुआ की ओर किया। आपने उनसे कहा कि "कहो : ऐ अल्लाह!" यहाँ अल्लाह को उसके नाम 'अल्लाह' से पुकारा गया है, जो उसके सारे सुंदर नामों का सार एवं संग्रहित रूप है। "मैं तीर शरण में आता हूँ अपने कान की बुराई से", यहाँ कान की बुराई से मुराद वह अवैध बातें हैं, जो इन्सान को सुननी पड़ती हैं, जैसे झूठी गवाही तथा कुफ़्र की बात, किसी पर लगाया जाने वाला झूठा आक्षेप, धर्म की निंदा और इस तरह की अन्य हराम बातें जो इन्सान के कान में पड़ती हैं। "तथा अपनी आँख की बुराई से", आँख की बुराई से मुराद इन्सान का अपनी आँख को अश्लील फिल्मों और गंदे दृश्यों को देखने में इस्तेमाल करना है। "तथा अपनी ज़ुबान की बुराई से", इससे मुराद मुँह से निकलने वाली हर अवैध बात, जैसे झूठी गवाही, गाली-गलौज, धिक्कार और धर्म तथा उसका पालन करने वालों की निंदा एवं व्यर्थ बातें कहना या काम की बात न बोलना आदि है। "तथा अपने दिल में बुराई से", इससे मुराद यह है कि इन्सान अपने दिल को अल्लाह की इबादत के अतिरिक्त किसी और चीज़ से आबाद रखे, हृदय की इबादतों जैसे आशा, भय, डर एवं सम्मान आदि को अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए खर्च करे या फिर हृदय की इबादतों को अल्लाह के लिए खर्च करने से गुरेज़ करे आदि। "तथा अपने वीर्य की बुराई से", यानी अपनी शर्मगाह की बुराई से। शर्मगाह की बुराई यह है कि वह हराम काम में लिप्त हो जाए और व्यभिचार की भूमिका की हैसियत रखने वाले कार्यों, जैसे देखना, छूना, चलना और इरादा करना आदि में इन्सान को डाल दे। इस शुभ दुआ में शारीरिक अंगों की सुरक्षा माँगी गई है, जो दरअसल बंदों पर अल्लाह की एक बहुत बड़ी नेमत की हैसियत रखती हैं। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनको इन नेमतों की बुराई से अल्लाह की शरण माँगने का आदेश दिया और इन नेमतों से शरण माँगने और यह कहने का आदेश नहीं दिया कि "ऐ अल्लाह, मैं अपने कान से तरी शरण माँगता हूँ", क्योंकि शरीर के यह सारे अंग अल्लाह की नेमत हैं और इनके ज़रिए बंदा उच्च एवं महान अल्लाह की इबादत भी करता है। अतः ये स्वयं बुरी चीज़ें नहीं हैं कि इनसे पनाह शरण माँगी जाए, बल्कि इनसे उत्पन्न होने वाली बुराई से शरण माँगने की आवश्यकता है। ज्ञात हो इन अंगों की सुरक्षा का तरीक़ा यह है कि इन्हें जिन कामों के लिए पैदा किया गया है इनसे वही काम लिया जाए, इनसे अल्लाह की अवज्ञा न की जाए और इनके ज़रिए कोई बुराई न फैलाई जाए। क्योंकि इन्सान से क़यामत के दिन उसके इन अंगों के बारे में पूछा जाएगा। जैसा कि उच्च अल्लाह का फ़रमान है : "और ऐसी बात के पीछे न पड़ो, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान न हो, निश्चय कान तथा आँख और दिल, इन सबके बारे में (क़यामत के दिन) प्रश्न किया जाएगा" [सूरा अल-इसरा : 36]
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः वह व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, जिस के दिल में रत्ती बराबर भी घमंड होगा। यह सुनकर एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! एक व्यक्ति अच्छा कपड़ा तथा अच्छा जूता पहनना पसंद करता है (तो क्या इसे भी घमंड समझा जायेगा)? फरमायाः निश्चय ही अल्लाह अत्यंत खूबसूरत है तथा खूबसूरती को पसंद करता है। घमंड कहा जाता है सत्य का इंकार करने और लोगों को तुच्छ समझने को।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "वह व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, जिस के दिल में रत्ती बराबर भी घमंड होगा।" यह, उन हदीसों में से एक है, जिनमें गुनाह करने वाले को चेतावनी दी गई है और जिनकी शरई प्रमाणों को सामने रखते हुए व्याख्या करने की आवश्यकता है। दरअसल अपने दिल में अभिमान रखने वाला व्यक्ति अगर सत्य से अभिमान दिखाता है और उसे नापसंद करता है, तो इस प्रकार का व्यक्ति काफ़िर है और हमेशा जहन्नम में रहेगा और कभी जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा। क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "ये इसलिए कि उन्होंने बुरा माना उसे, जो अल्लाह ने उतारा और उसने उनके कर्म व्यर्थ कर दिए।" लेकिन यदि वह सृष्टि को अभिमान दिखाता है और अल्लाह की इबादत से अभिमान नहीं करता, तो ऐसे व्यक्ति के बारे में इस हदीस में चेतावनी दी गई है और बताया गया है कि वह पहले जन्नत में दाख़िल होने वालों के साथ जन्नत नहीं जाएगा। जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यह हदीस सुनाई, तो एक व्यक्ति ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! इन्सान की इच्छा होती है कि उसके कपड़े अच्छे हों और उसके जूते अच्छे हों, तो क्या इसे भी अभिमान माना जाएगा? आपने उत्तर दिया : "निश्चय ही अल्लाह अत्यंत खूबसूरत है तथा खूबसूरती को पसंद करता है।" वह स्वयं सुंदर है, उसके सारे गुण सुंदर हैं, उसके सारे कार्य सुंदर हैं और उससे जुड़ी हुई हर चीज़ सुंदर है। उससे संबंधित कोई बात कुरूप नहीं है। आपके शब्द : "वह खूबसूरती को पसंद करता है" का अर्थ है, वह इस बात को पसंद करता है कि बंदे सुंदर कपड़े पहनें, सुंदर जूते पहनें, शारीरिक रूप से सुंदर दिखें और उनके सारे काम सुंदर हों। क्योंकि सुंदरता इन्सान की ओर लोगों को आकर्षित करती है और उसे सबकी नज़र में प्रिय बनाती है, जबकि जब इन्सान के बाल, उसके कपड़े और उसका वस्त्र कुरूप होता है, तो लोग उससे घृणा करते हैं।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह ने अपने नबी को आवाज़ को सुरीली बनाने की जिस प्रकार अनुमति दी है, किसी और वस्तु की नहीं दी। आप क़ुरआन पढ़ते समय आवाज़ को सुरीली बनाते और ऊँची आवाज़ से पढ़ते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नमाज़ के अंदर तथा नमाज़ के बाहर अच्छी आवाज़ में क़ुरआन पढ़ने की प्रेरणा दी गई है। इन्सान को चाहिए कि जब क़ुरआन पढ़े, तो ध्वनि के साथ، अच्छी आवाज़ में, दर्द से भरी हुई लय के साथ, अन्य वाणियों की इच्छा से मुक्त होकर, उसके द्वारा अंतरात्मा की बेनियाज़ी तलब करते हुए और भौतिक बेनियाज़ी की आशा रखते हुए उसे पढ़े। ज्ञात हो कि इस हदीस में क़ुरआन को सुरीली आवाज़ में पढ़ने से मुराद उसे सुंदर आवाज़ में पढ़ना है, इस तरह पढ़ना नहीं कि संगीत वाले गानों की धुन पर आधारित जान पड़ता हो।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिससे किसी ज्ञान से संबंधित कुछ पूछा गया और उसने उसे छिपा लिया, तो उसे क़यामत के दिन आग की लगाम पहनाई जाएगी।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में ज्ञान छुपाने से सख़्त सावधान किया गया है, और यह बताया गया है कि जिस व्यक्ति से धर्म से संबंधित कोई जानकारी माँगी गई, जिसकी पूछने वाले को ज़रूरत हो और पूछे गए व्यक्ति के लिए उसे बयान करना ज़रूरी भी हो, लेकिन इसके बावजूद उसे जानकारी न दे और प्रश्न का उत्तर न दे या फिर लिखकर देने से मना कर दे, तो अल्लाह क़यामत के दिन इसके दंड के तौर पर उसके मुँह में आग की लगाम लगा देगा। दरअसल यह बदला है इस बात का कि उसने दुनिया में अपने मुँह में खामोशी की लगाम लगा ली थी। होता भी यही है कि अल्लाह इन्सान को उसी प्रकार का दंड देता है, जिस प्रकार का उसका कर्म होता है। यहाँ यह याद रहे कि इस हदीस में जो चेतावनी दी गई है उसके दायरे में वह व्यक्ति आता है, जिसे पता हो कि पूछने वाला मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए पूछ रहा है। लेकिन इसके विपरीत यदि वह जानता हो कि पूछने वाला मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि उसके ज्ञान की थाह लेने के लिए पूछ रहा है, तो ऐसे में उसे एख़्तियार है कि चाहे तो जवाब दे और चाहे तो न दे। वह इस हदीस में दी गई चेतावनी के दायरे में नहीं आएगा।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने यह कहकर क़सम खाई कि लात तथा उज़्ज़ा की क़सम, वह 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहे और जिसने अपने साथी से कहा कि आओ हम जुआ खेलें, वह सद्क़ा करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अल्लाह को छोड़कर किसी और की क़सम खाने से सावधान कर रहे हैं। क्योंकि मोमिन क़सम केवल अल्लाह की खाता है। आप बता रहे हैं कि जिसने अल्लाह को छोड़कर किसी और, जैसे लात एवं उज़्ज़ा (अज्ञानता काल में पूजे जाने वाले दो बुत) की क़सम खाई, उसे क़सम खाने के बाद अपने इस कृत्य से खुद को अलग करने और क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करने के लिए ला इलाहा इल्लल्लाह कहना चाहिए। उसके बाद आपने बताया कि जिसने अपने साथी से कहा कि आओ जुआ खेलें, -जुआ नाम है दो या दो से अधिक लोगों का इस शर्त के साथ मुक़ाबले में शामिल होने का कि बीच में कुछ धन रखा जाए, जिसे मुक़ाबला जीतने वाला ले जाएगा। जुआ में इन्सान या तो जीतता है या फिर हारता है।- उसके लिए कुछ न कुछ सदक़ा करना मुसतहब है, ताकि जुआ की ओर बुलाने के कारण होने वाले गुनाह का प्रायश्चित हो जाए।
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “वह ज़माना क़रीब है, जब मुसलमान का बेहतरीन माल बकरियाँ होंगी, जिनको लेकर वह पहाड़ों की चोटियों और बारिश के स्थानों की तरफ अपने दीन को बचाने के लिए निकल जाएगा।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।इस हदीस में फ़ितने के दिनों में लोगों से अलग-थलग रहने की फ़ज़ीलत बयान की गई है। लेकिन यदि आदमी ऐसा हो कि उसके अंदर फ़ितने को ख़त्म करने की क्षमता हो, तो उसे आवश्यक रूप से उसे ख़त्म करने का प्रयास करना चाहिए। परिस्थिति एवं संभावना के अनुरूप यह कभी फ़र्ज़-ए-ऐन होता है और कभी फ़र्ज़-ए-किफ़ाया। जहाँ तक फ़ितनों के दिनों को छोड़ साधारण दिनों की बात है, तो उनमें अलग-थलग रहना अच्छा है या मिलजुलकर रहना, इस बात में उलेमा का मतभेद है। लेकिन सही बात यह है कि यदि गुनाह में पड़ने की प्रबल संभावना न हो, तो मिलजुलकर रहना ही उत्तम है। "अपने धर्म को बचाने के लिए निकल जाएगा" यानी इस डर से भाग खड़ा होगा कि कहीं उसका धर्म फ़ितने का शिकार न हो जाए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन्सान को शिर्क के क्षेत्र से इस्लाम के क्षेत्र की ओर एवं गुनाह के क्षेत्र से धर्म के अनुपालन के क्षेत्र की ओर हिजरत करने का आदेश दिया गया है। बिल्कुल इसी तरह जब लोग और समय बदल जाए, तो अलग-थलग रहना ही उत्तम है।
अबु दरदा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- से मरफ़ूअन वर्णित है : "जब कोई बंदा किसी वस्तु पर धिक्कार करता है, तो धिक्कार आकाश की ओर चल देता है, लेकिन उसके लिए आकाश के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। अतः, वह धरती की ओर उतरने लगता है, लेकिन धरती के द्वार भी उसके लिए बंद कर दिए जाते हैं। फिर वह दाएँ-बाएँ जाने का प्रयास करता है, लेकिन जब कहीं कोई जगह नहीं मिलती, तो उसकी ओर लौटता है, जिसपर धिक्कार किया गया है। यदि वह उसके योग्य है, तो ठीक। अन्यथा, धिक्कार करने वाले की ओर लौट जाता है।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।जब बंदा किसी चीज़ पर अपनी ज़बान से लानत करता है, तो उसकी यह लानत आकाश की ओर चढ़ती है। लेकिन आकाश के द्वार उसके लिए बंद होते हैं। अतः वह धरती की ओर लौटने लगती है। मगर धरती के द्वार भी उसके लिए बंद हो जाते हैं और वह उसमें प्रवेश नहीं कर पाती। फिर वह दाएँ-बाएँ जाती है। यदि उसे कोई मार्ग या स्थान नहीं मिलता, तो उस चीज़ की ओर लौट जाती है, जिसपर लानत की गई है। अब यदि वह चीज़ लानत की अधिकारी है, तो उसके पास रह जाती है और अगर नहीं है, तो लानत करने वाले की ओर लौट जाती है और उसी से चिपक जाती है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं ,जो रास्तों में घूमते रहते हैं और ज़िक्र करने वालों को तलाशते रहते हैं। जैसे ही कहीं ज़िक्र करने वालों को पाते हैं, एक-दूसरे को आवाज़ देकर बुलाते हुए कहते हैं कि आओ, यहाँ तुम्हारे मतलब की चीज़ है। फिर वे उन्हें अपने परों से आसमान तक घेर लेते हैं। उस समय उनसे उनका रब पूछता है, जबकि वह स्वयं सब कुछ जानता है : मेरे बंदे क्या कह रहे हैं? फ़रिश्ते जवाब देते हैं : वे तेरी पवित्रता बयान कर रहे हैं तथा तेरी प्रशंसा और बड़ाई का वर्णन कर रहे हैं। तब अल्लाह तआला फरमाता है : क्या उन्होंने मुझे देखा है? फ़रिश्ते कहते हैं : नहीं, अल्लाह की क़सम! उन्होंने तुझे देखा नहीं है। अल्लाह फ़रमाता है : यदि वे देख लेते तो क्या होता? फ़रिश्ते कहते हैं : यदि देख लेते तो इससे भी अधिक तेरी इबादत करते और इससे भी ज़्यादा तेरी बड़ाई तथा पवित्रता बयान करते। फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है : मेरे ये बंदे क्या माँग रहे हैं? फ़रिश्ते कहते हैं : वे तुझसे जन्नत माँग रहे हैं। अल्लाह कहता है : क्या उन लोगों ने जन्नत देखी है? फ़रिश्ते कहते हैं : नहीं, अल्लाह की क़सम! नहीं देखी है। अल्लाह फ़रमाता है : यदि देख लेते तो क्या होता? फ़रमाया : फ़रिश्ते कहते हैं : यदि देख लेते तो इससे भी अधिक उसकी ख़्वाहिश करते और इससे भी ज़्यादा उसे हासिल करने की कोशिश करते और उसके प्रति उनकी रूचि और अधिक बढ़ जाती। अल्लाह फ़रमाता है : वे किस चीज़ से शरण माँग रहे है? फ़रिश्ते कहते हैं : जहन्नम से शरण माँग रहे हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है : क्या उन्होंने जहन्नम देखा है? फ़रिश्ते कहते हैं : नहीं, अल्लाह की क़सम! उन्होंने जहन्नम को नहीं देखा है। अल्लाह तआला फ़रमाता है : यदि वे जहन्नम को देख लेते तो क्या होता? फ़रिश्ते कहते हैं : यदि वे जहन्नम को देख लेते तो इससे भी अधिक उससे भागते और भय करते। अल्लाह तआला फ़रमाता है : मैं तुम्हें साक्षी बनाता हूँ कि मैंने इन्हें क्षमा कर दिया है। फ़रमाया : एक फ़रिश्ता कहता है : उनमें अमुक भी है, जो उनमें से नहीं है, बल्कि किसी ज़रूरत के तहत आया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है : ये ऐसे साथ बैठने वाले लोग हैं कि उनके साथ बैठने वाले लोग भी वंचित नहीं रहते। एक दूसरी रिवायत में है : अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “अल्लाह के कुछ चलते-फ़िरते फ़रिश्ते हैं, जो ज़िक्र की मजलिसें तलाश्ते रहते हैं। जैसे ही कोई ज़िक्र की मजलिस मिलती है, लोगों के साथ बैठ जाते हैं और अपने परों से उन सबको ढाँप लेते हैं, यहाँ तक कि उनके और आसमान के बीच की जगह भर जाती है। जब मजलिस ख़त्म हो जाती है और लोग बिखर जाते हैं, तो वे आसमान पर चले जाते हैं। तब अल्लाह तआला उनसे पूछता है (हालाँकि वह उनसे ज़्यादा जानने वाला है) कि तुम लोग कहाँ से आ रहे हो? फ़रिश्ते कहते हैं कि हम ज़मीन पर मौजूद तेरे कुछ बंदों के पास से आ रहे हैं जो तेरी पवित्रता, बड़ाई और प्रशंसा बयान कर रहे हैं और तुझसे माँग रहे हैं। अल्लाह कहता है : वे क्या माँग रहे हैं? फ़रिश्ते कहते हैं : वे तुझसे तेरी जन्नत माँग रहे हैं। अल्लाह कहता है : क्या उन्होंने मेरी जन्नत देखी है? फ़रिश्ते कहते हैं : नहीं ऐ रब। अल्लाह कहता है : यदि वे मेरी जन्नत देख लेते तो क्या होता!! फ़रिश्ते कहते हैं : वे तेरी शरण माँग रहे हैं। अल्लाह कहता है : वे किस चीज़ से मेरी शरण माँग रहे हैं? फ़रिश्ते कहते हैं : तेरी जहन्नम की आग से, ऐ रब। अल्लाह कहता है : क्या उन्होंने मेरे जहन्नम की आग देखी है? फ़रिश्ते कहते हैं : नहीं। अल्लाह फ़रमाता है : यदि वे मेरे जहन्नम की आग देख लेते तो क्या होता!! फ़रिश्ते कहते हैं : वे तुझसे क्षमा माँग रहे हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है : मैंने उन्हें क्षमा कर दिया और वे जो माँग रहे हैं, मैंने उन्हें वह दे दिया और जिस चीज़ से शरण माँग रहे हैं उस चीज़ से उन्हें शरण प्रदान किया। फ़रमाया : तब फ़रिश्ते कहते हैं : ऐ रब, उनमें अमुक भी था, जो एक गुनाहगार बंदा है। यूँ ही वहाँ से गुज़र रहा था, तो उनके साथ बैठ गया। अल्लाह तआला फ़रमाता है : मैंने उसे भी क्षमा कर दिया ,क्योंकि यह वह लोग हैं, जिनके साथ बैठने वाले भी वंचित नहीं रहते।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में ज़िक्र की मजलिसों (बैठकों) के महत्व के प्रतीकों में से एक प्रतीक का उल्लेख है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: "अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं ,जो रास्तों में घूमते रहते हैं और ज़िक्र करने वालों को तलाशते रहते हैं" यानी अल्लाह ने इन्सान की सुरक्षा पर नियुक्त फ़रिश्तों के अतिरिक्त फ़रिश्तों के एक समूह को यह ज़िम्मेदारी दे रखी है कि धरती में घूमते रहें, मुसलमानों की आबादी वाले रास्तों, उनकी मस्जिदों और घरों का चक्कर लगाते रहें, ताकि ज़िक्र की मजलिसों को ढूँढ निकालें, वहाँ उपस्थित रहें और ज़िक्र कर रहे लोगों को सुनें। हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर कहते हैं : बेहतर यह लगता है कि इसे तसबीह आदि की मजलिसों के साथ खास रखा जाए। "जैसे ही कहीं ज़िक्र करने वालों को पाते हैं" सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "जैसे ही उनको कोई मजलिस मिलती है, जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो रहा हो, तो एक-दूसरे को आवाज़ देते हैं" यानी एक-दूसरे को बुलाते हैं और कहते हैं कि "आओ, यहाँ तुम्हारे मतलब की चीज़ है।" जबकि एक रिवायत में है कि यहाँ वह चीज़ है, जिसे तुम ढूँढ रहे हो। यानी ज़िक्र की उन मजलिसों की ओर आओ, जिन्हें तुम ढूँढ रहे हो और जिन तक तुम पहुँचना चाहते हो, ताकि तुम उन्हें देख सको और उनमें हो रहे ज़िक्र को सुन सको। फ़रिश्ते जब ज़िक्र की मजलिसों में होते हैं, तो उनकी हालत का उल्लेख करते हुए अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने, कहा है : "वे उनको घेर लेते हैं।" यानी वे उनको उसी तरह चारों ओर से घेर लेते हैं, जिस तरह कंगन कलाई को घेरे रहता है। "वे उनको अपने परों से घेर लेते हैं" यानी उनके चारों ओर अपने परों के सहारे चक्कर लगाते रहते हैं। "आकाश तक" यानी कुछ इसी तरह घेरे हुए आकाश तक पहुँच जाते हैं। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने वह वार्तालाप बयान की, जो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह और उसके सम्मानित फ़रिश्तों के बीच होती है। फ़रमाया : "उस समय उनसे उनका रब पूछता है, जबकि वह स्वयं सब कुछ जानता है" यानी वह ज़िक्र करने वालों की हालत से उनसे अधिक अवगत होता है, लेकिन पूछता इसलिए है, ताकि निकटवर्ती फ़रिश्तों को उनकी प्रतिष्ठा से रू-ब-रू कर सके और फ़रिश्तों को उनपर अभिमान हो। " मेरे बंदे क्या कह रहे हैं? फ़रिश्ते जवाब देते हैं : वे तेरी पवित्रता बयान कर रहे हैं तथा तेरी प्रशंसा और बड़ाई बयान क र रहे हैं।" यानी फ़रिश्ते कहते हैं कि ये ज़िक्र करने वाले सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर कह रहे हैं। यहाँ आए हुए शब्द "يمجدونك" से मुराद है, वे ला इलाहा इल्लाह कह रहे हैं। क्योंकि उसमें तौहीद-ए-उलूहियत के बखान के माध्यम से अल्लाह की बड़ाई एवं महानता का बयान है। यह सुन सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह कहता है : "क्या उन्होंने मुझे देखा है? फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : नहीं, अल्लाह की क़सम! उन्होंने तुझे देखा नहीं है। अल्लाह फ़रमाता है : यदि वे देख लेते तो क्या होता? फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : यदि देख लेते तो इससे भी अधिक तेरी इबादत करते और इससे भी ज़्यादा तेरी बड़ाई तथा पवित्रता बयान करते।" क्योंकि इन्सान अल्लाह की इबादत उसी परिमाण में करता है, जिस परिमाण में वह उससे अवगत होता है। इसपर सर्वशक्तिमान अल्लाह कहता है : "मेरे ये बंदे मुझसे क्या माँग रहे हैं?" यानी मुझसे वे क्या चहाते हैं? फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : "वे तुझसे जन्नत माँग रहे हैं।" यानी वे तेरी जन्नत की चाहत में तेरा ज़िक्र और तेरी इबादत कर रहे हैं। "अल्लाह कहता है : क्या उन लोगों ने जन्नत देखी है? फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : नहीं, अल्लाह की क़सम! नहीं देखी है। अल्लाह फ़रमाता है : यदि देख लेते तो क्या होता?" तो फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : "यदि देख लेते तो इससे भी अधिक उसकी ख़्वाहिश करते।" यानी उसे प्राप्त करने का और अधिक प्रयत्न करते, क्योंकि सुनी हुई चीज़ देखी हुई चीज़ की तरह नहीं होती। फिर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह कहता है : "वे किस चीज़ से शरण माँग रहे है?" फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : "जहन्नम से।" यानी वे अपने पालनहार का ज़िक्र और उसकी इबादत जहन्नम के भय से कर रहे हैं और अल्लाह से उससे सुरक्षित रखने की दुआ कर रहे हैं। "अल्लाह तआला फ़रमाता है : यदि वे जहन्नम को देख लेते तो क्या होता? फ़रिश्ते उत्तर देते हैं : यदि वे जहन्नम को देख लेते तो इससे भी अधिक उससे भागते।" यानी वे अपने आपको सत्कर्मों में और अधिक खपाते, जो कि जहन्नम से मुक्ति का सबब है। इसपर सर्वशक्तिमान अल्लाह कहता है : "मैं तुम्हें साक्षी बनाता हूँ कि मैंने इन्हें क्षमा कर दिया।" यानी उनके सारे गुनाह माफ़ कर दिए। यह सुन एक फ़रिश्ता कहता है : "उनमें अमुक व्यक्ति भी है, जो उनमें से नहीं है, बल्कि किसी ज़रूरत के तहत आया है?" यानी इन ज़िक्र करने वालों के बीच अमुक व्यक्ति भी है, जो ज़िक्र करने वालों में शामिल नहीं है। वह किसी काम से आया था और उनके साथ बैठ गया, तो क्या उसे भी क्षमा कर दिया जाएगा? अल्लाह तआला उत्तर देता है : ये ऐसे साथ बैठने वाले लोग हैं कि उनके साथ बैठने वाले लोग भी वंचित नहीं रहते।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “अल्लाह कहता है : जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले। यदि वह उस गुनाह को कर डालता है, तो बस उतना ही लिखो जितना उसने किया हो। और यदि मेरे (भय के) कारण उस गुनाह को छोड़ देता है, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो। इसी प्रकार यदि वह कोई नेकी करने का इरादा करे, लेकिन उसे कर न डाले, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो। और यदि वह उस नेकी को कर ले, तो उसे उसके लिए दस गुना से लेकर सात सौ गुना तक लिख दो।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में उन फ़रिश्तों को संबोधित किया गया है जो इन्सान का कर्म लिखने के कार्य पर नियुक्त हैं। यह हदीस इन्सान पर अल्लाह के अनुग्रह और उसकी क्षमा को प्रदर्शित करती है। आपने फ़रमाया : "जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले।" अमल से दिल तथा शरीर के अंगों द्वारा किया जाने वाला अमल भी मुराद होता है और यहाँ यही मुराद है। क्योंकि इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि दिल के अमल की भी पकड़ होती है और इन्सान को उसका भी बदला दिया जाता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा जो उसमें अत्याचार से अधर्म का विचार करेगा, हम उसे दुःखदायी यातना चखाएँगे।" तथा सहीह हदीस में है : "जब दो मुसलमान अपनी-अपनी तलवार लेकर आपस में भिड़ जाते हैं, तो वध करने वाला और वध किया गया व्यक्ति, दोनों जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" सहाबा ने पूछा कि वध करने वाले की बात तो समझ में आती है, लेकिन वध किए हुए व्यक्ति को जहन्नम क्यों जाना पड़ेगा? तो आपने कहा : "इसलिए कि वह अपने भाई की हत्या की इच्छा रखता था।" क़ुरआन एवं हदीस के ये स्पष्ट उल्लेख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शब्द "जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले" की व्यापकता को सीमित करने के लिए काफ़ी हैं। फिर यह, गुनाह के इरादे के बारे में कहे हुए आपके शब्द "उसे उसपर लिखा नहीं जाता है" के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि दिल का इरादा एवं प्रतिज्ञा भी कर्म है। आपने फ़रमाया : "यदि वह उस गुनाह को कर डालता है, तो बस उतना ही लिखो जितना उसने किया है।" यानी एक ही गुनाह। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जो (क़यामत के दिन) एक सत्कर्म लेकर (अल्लाह) से मिलेगा, उसे उसके दस गुना प्रतिफल मिलेगा और जो कुकर्म लाएगा, तो उसको उसी के बराबर कुफल दिया जाएगा तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।" एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "जिसने दुष्कर्म किया, तो उसे उसी के समान प्रतिकार दिया जाएगा तथा जो सुकर्म करेगा; नर अथवा नारी में से और वह ईमान वाला (एकेश्वरवादी) हो, तो वही प्रवेश करेंगे स्वर्ग में। जीविका दिए जाएंगे उसमें अगणित।" आपने कहा : "और यदि मेरे (भय के) कारण उस गुनाह को छोड़ देता है, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो।" गुनाह को छोड़ने के साथ अल्लाह के भय तथा उसकी हया के कारण छोड़ने की शर्त रखी गई है। यदि कोई विवश होने के कारण, सृष्टि के भय से या किसी अन्य कारण से छोड़ता है, तो उसके लिए एक नेकी नहीं लिखी जाएगी, बल्कि हो सकता है कि उसके खाते में गुनाह ही लिखा जाए। आपने फ़रमाया : "और यदि वह कोई नेकी करने का इरादा करे, लेकिन उसे न करे, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो..." यह दरअसल दयावान एवं उपकारी अल्लाह का अनुग्रह है। अतः सारी प्रशंसा एवं उपकार उसी का है। भला इससे बढ़कर उपकार क्या हो सकता है कि नेकी का इरादा करने पर एक पूरी नेकी मिले और नेक काम करने पर दस से सात सौ गुना तक नेकी मिले! इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस कथन की निसबत उच्च एवं महान अल्लाह की ओर यह कहते हुए की : "अल्लाह कहता है : जब मेरा बंदा इरादा करता है"। इसमें आपने अल्लाह का यह गुण बयान किया है। यह कथन उस विधान का अंश है, जिसमें अल्लाह का अपने बंदों से वादा और उसका उनपर उपकार है। यह क़ुरआन के अतिरिक्त है और सृष्टि नहीं है। अतः अल्लाह की वाणी सृष्टि नहीं है।