





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा गया कि कौन-सी चीज़ लोगों को सबसे ज़्यादा जन्नत में दाख़िल करेगी? तो आपने उत्तर दिया : "अल्लाह का भय और अच्छा आचरण।" साथ ही पूछा गया कि कौन-सी चीज़ सबसे ज़्यादा जहन्नम में दाख़िल करेगी? तो उत्तर दिया : "मुँह और शर्मगाह।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इनसान को जन्नत में सबसे ज़्यादा दाख़िल करने वाली चीज़ अल्लाह का भय और अच्छा व्यवहार है। अल्लाह के भय का इज़हार इस प्रकार होता है कि इनसान तमाम तरह की हराम चीज़ों से दूरी बना ले और अच्छे व्यवहार का संबंध अल्लाह की सृष्टि से होता है और उसका निम्नतम स्तर यह है कि इनसान किसी को कष्ट न दे, जबकि उसका उच्चतम स्तर यह है कि इनसान बुरा करने वाले के साथ अच्छा करे। इसके विपरीत इनसान को जहन्नम में सबसे ज़्यादा दाख़िल करने वाली चीज़ें हैं इनसान का मुँह और उसकी शर्मगाह। क्योंकि इन्हीं दो चीज़ों के कारण इनसान आम तौर पर अल्लाह के आदेशों की अवज्ञा करता है और लोगों के साथ दुर्व्यवहार करता है।
आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने लगते, तो अपने दोनों हाथों में फूँकते और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़कर दोनों हाथों को शरीर पर फेरते। जबकि एक रिवायत में है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- प्रत्येक रात जब बिस्तर पर जाते, तो दोनों हाथों को इकट्ठा करके उममें फूँकते और उनमें 'क़ुल हुवल्लाहु अह़द', 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल-फ़लक़' तथा 'क़ुल अऊज़ु बि रब्बिन-नास' पढ़ते और जहाँ तक हो हो पाता पूरे शरीर में उनको फेर देते। आरंभ सिर तथा चेहरे और शरीर के अगले भाग से करते थे। ऐसा तीन बार करते थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की दुनिया में भी पत्नी थीं और आख़िरत में भी होंगी, हमें आपकी एक सुन्नत बताती हैं कि आप हर रात सोते समय अपने दोनों हाथों को मिला लेते और उनमें हल्के से इस तरह फूँक मारते कि थूक न निकले और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़ते थे। आदमी इस सुन्नत पर अमल करते समय चाहे तो पहले फूँक मारे और उसके बाद इन सूरों को पढ़े या फिर पहले इन सूरों को पढ़े और उसके बाद फूँक मारे। क्योंकि यह हदीस तरतीब एवं दोनों कार्यों में से किसी को पहले और किसी को बाद में करने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती। उसके बाद आप दोनों हाथों को जहाँ तक हो पाता अपने शरीर पर फेरते। आरंभ सर एवं चेहरे तथा शरीर के अगले भाग से करते। तीनों सूरों को पढ़ने, फूँक मारने और हाथ फेरने का यह काम तीन बार करते थे।
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब बिस्तर पर आते, तो फ़रमाया करते : "सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने हमें खिलाया, पिलाया, पर्याप्ति प्रदान की तथा शरण दी। कितने ऐसे लोग हैं, जिनको न कोई पर्याप्ति प्रदान करने वाला है, न शरण देने वाला।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब बिस्तर में जाते, तो यह दुआ पढ़ते थे : "الحمد لله الذي أطعمنا وسقانا وكفانا وآوانا فكم ممن لا كافي له ولا مؤوي" (सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने हमें खिलाया, पिलाया, पर्याप्ति प्रदान की तथा शरण दी। कितने ऐसे लोग हैं, जिनको न कोई पर्याप्ति प्रदान करने वाला है, न शरण देने वाला।) आपने इसमें सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की प्रशंसा की है, जिसने यदि तुम्हारे लिए इस भोजन एवं इस पेय का प्रबंध न किया होता, तो तुम्हें न खाने को मिलता और न पीने को। अतः उस अल्लाह की प्रशंसा होनी चाहिए जिसने तुम्हें खाने एवं पीने को दिया। आपके शब्द "पर्याप्ति प्रदान की" का अर्थ है, यानी हमारे लिए सारे कामों को आसान कर दिया और हमें रोज़ी-रोटी के मामले में पर्याप्ति प्रदान की। जबकि "शरण दी" का अर्थ है, हमारे लिए ठिकाना बनाया, जहाँ हम शरण ले सकें। न जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिन्हें न कोई प्रयाप्ति प्रदान करने वाला है, न उनके पास कोई ठिकाना है और न उन्हें कोई ठिकाना प्रदान करने वाला है। अतः बिस्तर में जाते समय इस दुआ को पढ़ना चाहिए।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तीन प्रकार की दुआएँ क़बूल होती हैं। उनके क़बूल होने में कोई संदेह नहीं है। मज़लूम की दुआ, यात्री की दुआ और पिता की बददुआ जो संतान के हक़ में की जाए।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।तीन प्रकार के लोगों द्वारा की जाने वाली तीन दुआएँ हैं, जिन्हें अल्लाह ग्रहण करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पहली, अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति की दुआ। यहाँ तक कि किसी काफ़िर व्यक्ति पर भी यदि अत्याचार किया जाए और वह अल्लाह से दुआ करे, तो अल्लाह उसकी दुआ ग्रहण करता है। दूसरी, यात्री यदि यात्रा के दौरान अल्लाह से दुआ करे, तो उसकी दुआ ग्रहण होती है और तीसरी दुआ है माता-पिता की दुआ। दुआ चाहे माता करे या पिता। इसी तरह दुआ करें या बददुआ।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तीन प्रकार के लोगों से अल्लाह क़यामत के दिन न बात करेगा, न उन्हें पवित्र करेगा और न उनकी ओर देखेगा तथा उनके लिए दुखदायी यातना है। बूढ़ा व्यभिचारी, झूठा बादशाह और घमंडी निर्धन।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।तीन प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनसे अल्लाह क़यामत के दिन बात नहीं करेगा, उनकी ओर नहीं देखेगा और उन्हें गुनाहों से पवित्र भी नहीं करेगा तथा उनके लिए कष्टदायक यातना है : पहला ऐसा बूढ़ा एवं वयोवृ्द्ध व्यक्ति जो व्यभिचार में लिप्त हो, दूसरा ऐसा शासक जो झुठ बोले और तीसरा ऐसा निर्धन जो अभिमान करे और दूसरे लोगों को हेय जाने।
अली रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "कहो : ऐ अल्लाह! मेरा मार्गदर्शन कर और मुझे सही रास्ते पर चला। "الْهُدَى" शब्द ज़बान पर लाते समय अपने रास्ता पा लेने को याद कर लिया करो और "السَّدَاد" शब्द ज़बान पर लाते समय तीर को सीधे निशाने पर लगाने को याद कर लिया करो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अली इब्ने अबी तालिब रज़ियल्लाहू अन्हु को आदेश दिया कि अल्लाह से दुआ करें और मांगें यह कह कर: ऐ अल्लाह! मुझे हिदायत दे, मेरा मार्गदर्शन कर और मुझे रास्ता दिखा, तथा मुझे सीधा रख, सुयोग प्रदान कर और तमाम कामों में सीधे मार्ग पर चला। इस दुआ में आए हुए शब्द "अल-हुदा" का अर्थ है, सत्य को संक्षिप्त एवं विस्तृत रूप से जानना और अंदर तथा बाहर से उसका अनुसरण करने का सुयोग पाना। जबकि "सिदाद" शब्द का अर्थ है, कथन, कार्य एवं अक़ीदे में सीधे मार्ग पर चलना। चूँकि ग़ैर-महसूस बातें महसूस उदाहरणों से स्पष्ट होती हैं, इसलिए यह दुआ करते समय तुम्हारे दिल में यह बात होनी चाहिए कि तुम यात्रा में निकले हुए उस व्यक्ति के मार्गदर्शन की तरह मार्गदर्शन माँग रहे हो, जो भटकाव से बचने और गंतव्य तक जल्दी सुरक्षित पहुँचने के लिए ज़रा भी दाएँ-बाएँ नहीं होता। (और सही मार्ग पर होने से मुराद: तीर की तरह सही रास्ते पर होना है) चुनांचे तुम तीर चलाते समय इस बात का ध्यान रखते हो कि वह तेज़ी से सही निशाने पर जा लगे। जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ को निशाना बनाकर तीर चलाता है, तो तीर को टारगेट पर बिलकुल सीधा रखता है। बिलकुल ऐसे ही, तुम भी अल्लाह से कह रहे हो कि वह तुम को तीर की तरह सीधा रखे। इस तरह, तुम्हारी दुआ में मार्गदर्शन के साथ-साथ सीधे रास्ते पर चलने की तलब दोनों बातें आ गईं। तो इस अर्थ को अपने दिल में उपस्थित करें ताकि आप अल्लाह से सही दिशा माँगें। ताकि उस चीज़ में आपकी नीयत वैसी ही हो जाए जिस तरह आप तीरंदाज़ी में इस्तेमाल करते हैं।"
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह के निकट सबसे घटिया और तुच्छ व्यक्ति वह है, जो शहंशाह कहलवाए।वास्तविक बादशाह तो बस अल्लाह है। तथा एक रिवायत में हैः क़यामत के दिन अल्लाह के क्रोध का सबसे अधिक पात्र और सबसे नीच वह व्यक्ति होगा, जो दुनिया में शहंशाह कहलवाता था। वास्तविक बादशा बस अल्लाह ही है। सुफ़यान सौरी ने "ملك الأملاك" का अर्थ "शहंशाह" बताया है और अहमद बिन हंबल कहते हैं कि मैंने अबू अम्र से "أَخْنَع" का अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया कि सबसे घटिया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस में बताया है कि अल्लाह के निकट सबसे तुच्छ और घटिया व्यक्ति वह है, जो अपना ऐसा नाम रखे कि उससे ऐसी महानता एवं श्रेष्ठता झलकती हो, जो अल्लाह के सिवा किसी के लिए उचित नहीं है, जैसे शहंशाह का शब्द है, इसमें एक तरह से अल्लाह की बराबरी और हमसरी (समानता) का दावा है। इसलिए इस नाम का इनसान अल्लाह के निकट सबसे अप्रिय और घटिया है। हदीस के इस टुकड़े का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि वह अल्ललाह के निकट सबसे नापसंदीदा लोगों में से एक है। फिर आपने यह स्पष्ट कर दिया कि इस धरती और उसके सारे राजाओं एवं प्रजाओं का वास्तविक स्वामी अल्लाह है। इस हदीस में उन लोगों के लिए भी शिक्षा एवं नसीहत है, जो लोगों को उपाधियाँ, उनका अर्थ जाने बिना ही बाँटते रहते हैं, कि कहीं वे भी उस चीज़ में न पड़ जाएँ, जिससे इस हदीस में सावधान किया गया है। अल्लाह हम सब को इससे बचाए।
अबदुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः क्या तुम जानते हो कि झूठ तथा मिथ्यारोपन क्या है? यह लोगों के बीच लगाई-बुझाई की बातें करते फिरना है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी उम्मत को लोगों के बीच चुगली करते फिरने और बिगाड़ पैदा करने के लिए एक की बात दूसरे तक पहुँचाने से सावधान करना चाहते थे। अतः, अपनी बात को प्रश्न से शुरू किया, ताकि दिल में अच्छी तरह बैठ जाए और लोग अधिक ध्यानपूर्वक सुनें। यही कारण है कि सहाबा से पूछा कि «العَضْهُ» अर्थात् झूठ और दोषारोपन क्या है? वैसे, कुछ लोगों ने उसका अर्थ जादू भी बताया है। फिर प्रश्न का उत्तर खुद ही देते हुए कहा कि «العَضْهُ» से अभिप्राय है लोगों के बीच लगाई-बुझाई करना, क्योंकि अनुभव यह कहता है कि इससे बिगाड़, लोगों को हानि पहुँचाने, प्रेम रखने वालों के दिलों को बाँटने, रिश्तेदारों के बीच दूरी पैदा करने तथा दिलों को मैला करने का वही काम होता है, जो जादू से होता है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः दीनार के बंदे का विनाश हो। दिरहम के बंदे का विनाश हो। रेशमी कपड़े के बंदे का विनाश हो। रुएँदार कपड़े के बंदे का विनाश हो। अगर दिया गया तो प्रसन्न और न दिया गया तो अप्रसन्न। वह हलाक हो और नाकाम हो। अगर किसी परेशानी में पड़े तो कोई उसे सहारा देने वाला न हो। तथा ऐसे बंदे के लिए खुशखबरी है, जो अल्लाह की राह में अपने घोड़े की लगाम पकड़े हुआ हो। उसके सिर के बाल बिखरे, पाँव धूल से अटे हों। यदि उसे पहरेदारी पर लगा दिया जाए तो पहरेदारी करता रहे और यदि सेना के पीछे रखा जाए तो पीछे ही रहे। यदि किसी के यहाँ प्रवेश करने की अनुमति माँगे तो अनुमति न मिले और यदि किसी की सिफ़ारिश करे तो उसकी सिफ़ारिश ग्रहण न की जाए।
इसे बुखारी ने इन्हीं जैसे शब्दों के साथ रिवायत किया है ।इस हदीस में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी दौड़-भाग का केंद्र बिंदु, ज्ञान का शिखर तथा प्रथम एवं अंतिम लक्ष्य, दुनिया है। तथा यह कि जिसकी हालत यह हो, उसका अंजाम विनाश और असफलता के सिवा कुछ नहीं है। इस प्रकार के लोगों की निशानी यह है कि वे दुनिया के अत्यंत लोभी होते हैं। यदि मिल गई, तो ठीक। न मिली, तो परेशान। जबकि कुछ लोगों की नज़र अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति एवं आख़िरत पर रहती है। वे पद एवं ख्याति के पीछे नहीं भागते। उनका एकमात्र उद्देश्य अल्लाह एवं उसके रसूल का अनुसरण करना होता है। इस प्रकार के लोगों की पहचान यह है कि वे दिखावे पर ध्यान नहीं देते, जो जगह मिल जाए उससे प्रसन्न रहते हैं, लोगों के निकट महत्वहीन होते हैं तथा पद-प्रतिष्ठा वालों से दूर रहते हैं। यदि वे उनके पास जाने की अनुमति माँगें, तो न मिले और यदि उनके यहाँ सिफ़ारिश करें, तो उनकी सिफ़ारिश ग्रहण न हो। लेकिन उनका ठिकाना जन्नत है, जो प्रशंसनीय प्रतिकार है।