





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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सफ़िय्या बिंत हुयय- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐतिकाफ़ की हालत में थे कि मैं रात के समय आपसे मिलने गई। आपसे बात करने के बाद जब वापस होने के लिए खड़ी हुई, तो आप भी मुझे छोड़ने के लिए खड़े हुए। (उन दिनों सफ़िय्या का निवास उसामा बिन ज़ैद के घर में था।) इसी बीच वहाँ से दो अंसारी व्यक्ति गुज़रे। जब उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा तो तेज़ चलने लगे। उन्हें ऐसा करते देख अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें रुकने को कहा और फ़रमायाः यह सफ़िय्या बिंत हुयय हैं। दोनों ने कहाः सुबहानल्लाह! ऐ अल्लाह के रसूल (क्या हम आपके बारे में कोई संदेह कर सकते हैं?) तो आपने फ़रमायाः शैतान आदम की संतान की रगों में लहू की तरह दौड़ता है। इसलिए मुझे डर हुआ कि शैतान तुम्हारे दिलों में कोई गलत ख़याल न डाल दे। एक और रिवायत में है कि वह रमज़ान के अंतिम दस दिनों में ऐतिकाफ़ के दौरान मस्जिद में मिलने आईं और आपके साथ कुछ समय बात करने के बाद जाने के लिए खड़ी हुईं, तो आप भी उन्हें छोड़ने के लिए खड़े हो गए, यहाँ तक कि जब उम्मे सलमा के दरवाज़े तक पहुँची... उसके बाद शेष उसी अर्थ की रिवायत बयान की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रमज़ान के आखिरी दस दिनों में एतेकाफ़ में थे। इसी बीच आपकी पत्नी सफ़िय्या -रज़ियल्लाहु अनहा- आपसे मिलने आईं और कुछ देर बात करने के बाद घर वापस जाने के लिए खड़ी हुईं, तो आप खड़े हुए और कुछ दूर तक उनके साथ चलने लगे। इतने में वहाँ से दो अंसारी व्यक्ति गुज़रे और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ आपकी पत्नी को देखकर लजाते हुए तेज़ चलने लगे। यह देख, आपने उन दोनों से कहा कि ज़रा ठहरो। देखो, यह मेरी पत्नी सफ़िय्या है। दोनों ने कहा : सुबहान अल्लाह, क्या आपके बारे में गलत सोचा जा सकता है? तो आपने उन्हें बताया कि शैतान इनसान को गुमराह करने के लिए तत्पर रहता है और उसके पास इसकी बड़ी क्षमता भी है। क्योंकि वह आदम की संतान की रगों में लहू की तरह दौड़ता है। यही कारण है कि आपको डर महसूस हुआ कि कहीं शैतान उनके दिलों में कोई ग़लत ख़याल न डाल दे।
अब्दुल्लाह बिन माक़िल कहते हैं कि मैंने कअब बिन उजरा के पास बैठकर उनसे फ़िदया के बारे पूछा तो बताया कि यह आयत विशेष रुप से मेरे बारे में उतरी थी, लेकिन तुम सभी के लिए आम है। हुआ यूँ कि मुझे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास लाया गया तो जूएँ मेरे चेहरे पर झड़-झड़कर गिर रही थीं। यह देख आपने कहाः मैं नहीं समझता था कि तुम्हारी तकलीफ़ इस हद तक पहुँच चुकी है, जो अभी मैं देख रहा हूँ। (अथवा मैं नहीं समझता था कि तुम्हारी परेशानी इस हद तक पहुँच चुकी है, जो मैं देख रहा हूँ) क्या तुम्हें एक बकरी मिल सकती है? उसने कहाः नहीं। तो फ़रमायाः तीन रोज़े रखो या छह निर्धनों को खाना खिलाओ (प्रत्येक निर्धन को आधा साअ खाने की वस्तु देना)। एक दूसरी रिवायत में हैः अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें आदेश दिया कि छह लोगों को तीन सा खाना खिलाएँ अथवा एक बकरी ज़बह करें अथवा तीन रोज़े रखें।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हुदैबिया में काब बिन उजरा -रज़ियल्लाहु अनहु- को देखा, जो एहराम की अवस्था में थे और बीमारी के कारण जूँ उनके चेहरे पर झड़-झड़कर गिर रही थीं। यह देख अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उनके हाल पर तरस आ गया और फ़रमाया : मैं नहीं समझता था कि तुम्हारी परेशानी उस हद तक बढ़ चुकी है, जो मैं अब देख रहा हूँ। फिर पूछा : क्या तुम बकरी फ़िदया में दे सकते हो? कहा : नही। तो बरकत वाले एवं महान अल्लाह ने यह आयत उतारी : {فَمَنْ كَانَ مِنْكُم مَرِيضَاً أوْ به أذَىً مِنْ رَأسِه فَفِدْية مِنْ صِيَامٍ أوْ صَدَقَةٍ أوْ نُسُكٍ} الآية (यदि तुममें से कोई व्यक्ति रोगी हो या उसके सर में कोई पीड़ा हो (और सर का मुंडन करा ले) तो उसके बदले में रोज़ा रखना या दान देना अथवा क़ुरबानी करना है।) उस समय नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें तीन रोज़े रखने या छः निर्धनों को खाना खिलाने के बीच एख़्तियार दिया। याद रहे कि प्रत्येक निर्धन को आधा साअ गेहूँ आदि देना है। यह सर के मुंंडन का कफ़्फ़ारा होगा, जो जूँ आदि के कारण मजबूरी में उसे कराना पड़ा था। जबकि एक अन्य रिवायत में है कि आपने उन्हें तीन विकल्पों में से किसी एक को चुनने का अधिकार दिया था।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें ज़ुहर अथवा अस्र की नमाज़ पढ़ाई। (इब्ने सीरीन कहते हैं कि अबू हुरैरा ने नमाज़ का नाम लेकर बताया था, लेकिन मुझे याद नहीं रहा) वह कहते हैं कि आपने हमें दो रकअत पढ़ाकर सलाम फेर दिया। उसके बाद मस्जिद के अंदर पड़ी हुई एक लकड़ी के पास जा कर, नाराज़ व्यक्ति के अंदाज़ में उससे टेक लगा लिया, अपने दाएँ हाथ को बाएँ हाथ पर रखा और दोनों हाथों की उँगलियों को एक-दूसरी में घुसा दिया। उधर, जल्दबाज़ लोग मस्जिद से निकल गए और कहना शुरू किया कि नमाज़ कम हो गई है। (उस समय वहाँ अबू बक्र और उमर भी मौजूद थे), लेकिन उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बात करने में भय महसूस किया। लोगों के अंदर एक लंबे हाथ वाला व्यक्ति भी था, जिसे "ज़ुल यदैन"- दो हाथों वाला- कहा जाता था। उसने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आपसे भूल हुई है या नमाज़ कम कर दी गई है? आपने उत्तर दियाः न मुझसे भूल हुई है और न नमाज़ कम की गई है। फिर फ़रमायाः क़्या ज़ुल यदैन की बात सही है? लोगों ने कहाः हाँ। अतः, आप आगे बढ़े, छूटी हुई नमाज़ पढ़ी, फिर सलाम फेरा, फिर तकबीर कही और अपने सजदे की तरह या उससे लंबा सजदा किया, फिर सिर उठाया और तकबीर कही, फिर तकबीर कही और अपने सजदे की तरह या उससे लंबा सजदा किया, फिर सिर उठाया और तकबीर कही। कभी-कभी लोग पूछ लेते कि क्या उसके बाद आपने सलाम फेरा? तो कहतेः मुझे बताया गया है कि इमरान बिन हुसैन ने कहाः फिर सलाम फेरा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।रसूलगण, मानव जाति के सबसे विवेकी, स्थिर दिल व दिमाग के मालिक, सहनशील और सबसे अधिक अल्लाह का हक़ अदा करने वाले लोग होते हैं। लेकिन, इन सब बातों के बावजूद वे होते तो इनसान ही हैं। अंतिम रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन गुणों में अन्य रसूलों की तुलना में अधिक परिपूर्ण थे, लेकिन इसके बावजूद इनसान होने के नाते कई बार नमाज़ की कुछ चीज़ें भूले भी हैं। ऐसा इसलिए, ताकि अल्लाह बंदों के लिए सह्व के अहकाम (भूलने से संबंधित विधि-विधान) जारी कर सके। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि एक बार अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथियों को ज़ोहर अथवा अस्र की नमाज़ पढ़ाई। यहाँ अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने निश्चित रूप से बता दिया था कि नमाज़ कौन-सी थी, लेकिन इब्न-ए-सीरीन भूल गए। नमाज़ के दौरान हुआ यह कि आपने पहली दो रकातें पढ़ने के बाद सलाम फेर दिया। चूँकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक संपूर्ण व्यक्तित्व के मालिक इनसान थे और आधे-अधूरे अमल से आपका हृदय संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए आपको कुछ कमी महसूस हुई। मगर यह पता न चल सका कि वह है क्या? आप मस्जिद के अंदर रखी हुई एक लकड़ी के पास गए, उसपर व्याकुल मन से टेक लगाया और अपने एक हाथ की उंगलियों को दूसरे हाथ की उंगलियों में घुसा दिया। इस बीच जल्दबाज़ किस्म के नमाज़ीगण मस्जिद के विभिन्न द्वारों से बाहर निकल गए। वे आपस में चुपके-चुपके बात कर रहे थे कि ज़रूर कुछ नया आदेश आया होगा। दरअसल वे नमाज़ आधी हो जाने की बात कर रहे थे। एक तरह से वे अल्लाह के नबी को इससे परे समझ रहे थे कि आप भी कुछ भूल सकते हैं। उनके दिलों में आपका इस क़दर रुआब था कि कोई इस महत्वपूर्ण विषय में भी आपसे बात करने की जुर्रत न कर सका। हालाँकि वहाँ अबू बक्र और उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- भी मौजूद थे और उन्होंने आपके अंदर असंतुष्टि और बेइतमीनानी के भाव भी देखे थे। इतने में एक सहाबी ने, जिसे ज़ुल-यदैन कहा जाता था, इस ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप भूल रहे हैं या नमाज़ कम हो गई है? उन्होंने यक़ीन के साथ कोई एक बात नहीं कही, क्योंकि उस समय दोनों बातों की संभावना थी। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम- ने अपने गुमान के आधार पर उत्तर दिया कि न तो मैं कुछ भूला हूँ और न नमाज़ कम हुई है। अब ज़ुल-यदैन आश्वस्त हो गए कि नमाज़ कम नहीं हुई है। चूँकि उन्हें इस बात का भी यक़ीन था कि आपने दो रकात ही पढ़ी है, इसलिए यह नतीजा निकाल लिया कि आप भूले ज़रूर हैं। अतः उन्होंने कहा : वास्तविकता यह है कि आप भूले हैं। चूँकि ज़ुल-यदैन का यह दावा आपके इस ख़याल के विपरीत था कि आपने नमाज़ पूरी पढ़ी है, इसलिए आप उसकी पुष्टि कर लेना चाहते थे। अतः, अपने आस-पास मौजूद साथियों से पूछा कि क्या ज़ुल-यदैन की यह बात सही है कि मैंने दो ही रकात पढ़ी है? जब सबने हाँ में उत्तर दिया, तो आप आगे बढ़े और छूटी हुई नमाज़ पढ़ी। फिर तशह्हुद के बाद सलाम फेरा, फिर बैठे-बैठे ही तकबीर कही और नमाज़ के सजदे जैसा या उससे ज़रा लंबा एक सजदा किया, फिर सजदे से सर उठाया और तकबीर कही, फिर तकबीर कही और आम सजदों की तरह या उनसे ज़रा लंबा सजदा किया, फिर सर उठाया औऱ तकबीर कही, फिर तशह्हुद पढ़े बिना सलाम फेर दिया।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "शहीद पाँच हैं; ताऊन (प्लेग) से मरने वाला, पेट की बीमारी से मरने वाला, डूबकर मरने वाला, किसी गिरने वाली वस्तु के नीचे दबकर मरने वाला और अल्लाह के रास्ते में शहीद होने वाला।" एक और रिवायत में हैः "तुम लोग किसे शहीद मानते हो?" लोगों ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, जो अल्लाह के रास्ते में मारा जाए, वह शहीद है। तो आपने फ़रमायाः "तब तो मेरी उम्मत में शहीद बहुत कम होंगे।" सहाबा ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, फिर कौन लोग शहीद हैं? तो फ़रमायाः "जो अल्लाह के रास्ते में मारा गया वह शहीद है, जो अल्लाह की राह में निकलकर मर गया वह शहीद है, जो ताऊन (प्लेग) में मरा वह शहीद है, जो पेट की बीमारी में मरा वह शहीद है और जो डूबकर मरा वह शहीद है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।सालेह़ बिन ख़व्वात बिन जुबैर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने एक ऐसे व्यक्ति से रिवायत किया है, जिसने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ ज़ातुर-रिक़ा युद्ध में भय की नमाज़ पढ़ी थी कि एक गिरोह ने आपके साथ सफ़ बाँध लिया और एक गिरोह शत्रु के सामने खड़ा रहा। चुनांचे जो लोग आपके साथ थे, उन्हें आपने एक रकात पढ़ाई। फिर आप खड़े रहे और उन्होंने अपनी नमाज़ पूरी कर ली तथा दुश्मन के आगे मोरचाबंद हो गए। फिर दुसरा गिरोह आया, तो आप उन्हें शेष एक रकात पढ़ाकर बैठे रहे और उन्होंने अपनी नमाज़ पूरी कर ली। फिर आपने उनके साथ सलाम फेरा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने साथियों के साथ एक युद्ध में निकले। अधिकतर लोग पैदल थे, इसलिए पैदल चलते-चलते पाँव घिस गए। हालत यह थी कि लोगों ने बचने के लिए क़दमों पर पुराने कपड़े लपेट लिए थे। इस युद्ध में दुश्मन से मुलाक़ात तो हुई, लेकिन युद्ध नहीं हुआ। अल्बत्ता, मुसलमान दुश्मनों को भयभीत करने में सफल रहे। इस हदीस में जिस घटना का उल्लेख है, उसमें मुसलमानों के सामने जो दुश्मन थे, वे क़िबले की ओर नहीं थे। क्योंकि उनके घर मदीने से पूरब की ओर थे। अतः, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुस्लिम सैनिकों को दो भागों में बाँट दिया। एक भाग आपके साथ नमाज़ के लिए पंक्तिबद्ध हो गया और दूसरा भाग दुश्मनों के सामने खड़ा रहा, जो नमाज़ियों के पीछे थे। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथ खड़े लोगों को एक रकात पढ़ाई और उनके साथ दूसरी रकात के लिए खड़े हो गए। फिर आप खड़े रह गए। जबकि पीछे के लोगों ने एक और रकात पढ़ अपनी नमाज़ पूरी कर ली और सलाम फेरकर दुश्मन के सामने जा खड़े हुए। अब दूसरा गिरोह आया, तो आपने उनको शेष एक रकात पढ़ाई और उसके बाद बैठे रहे। जब पीछे के लोगों ने खड़े होकर एक रकात पूरी कर ली, तो आपने उनके साथ सलाम फेरा। इस तरह, पहले गिरोह को आपके साथ तकबीर-ए-तहरीमा में शामिल होने का अवसर मिला, तो दूसरे गिरोह को सलाम फेरने का। दोनों गिरोहों को इमाम के साथ नमाज़ पढ़ने की फ़ज़ीलत भी मिल गई और मुसलमानों को दुश्मन के आक्रमण से बचा भी लिया गया।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि हमने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ हज किया। चुनांचे हमने क़ुरबानी के दिन ही तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा कर लिया। इसी बीच सफ़ीया (रज़ियल्लाहु अंहा) को माहवारी आ गई। फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनसे वह करना चाहा, जो आदमी अपनी पत्नी से करता है, तो मैंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, वह माहवारी में है। यह सुन आपने फ़रमायाः "क्या यह हमें रोक लेगी?" लोगों ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, उन्होंने क़ुरबानी के दिन तवफ़-ए-इफ़ाज़ा कर लिया था। तो फरमायाः "फिर अब निकल पड़ो।" तथा एक रिवायत में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "यह बाँझ हो तथा इसका गला दुखे, क्या इसने क़ुरबानी के दिन तवाफ़ कर लिया है?" कहा गया कि हाँ! तो फ़रमायाः "फिर चलो चलें।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- कहती हैं कि सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ हज्जतुल वदा के अवसर पर हज किया। जब वे हज के काम कर चुके, तो तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा कर लिया। लोगों के साथ अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी सफ़िय्या -रज़ियल्लाहु अनहा- भी थीं। जब रवानगी की रात आई, तो सफ़िय्या -रज़ियल्लाहु अनहा- को माहवारी आ गई। इसी बीच अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उनके पास वह करने के लिए आए, जो आदमी अपनी पत्नी के साथ करता है, तो आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने बताया कि उनको माहवारी आ गई है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने समझा कि उनको माहवारी पहले ही आ गई थी और वह तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा नहीं कर सकी है। फिर, चूँकि तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा हज का एक रुक्न है और उसके बिना हज पूरा नहीं हो सकता। अतः, उनके पवित्र होने तथा तवाफ़ करने से पहले लोग मक्का से निकल नहीं पाएँगे, इसलिए आपने वह प्रसिद्ध वाक्य कह दिया, जो ज़बान पर आ जाता है और उसके असली मायने मुराद नहीं होते। यानी यह कि वह बाँझ हो तथा उसका गला दुखे। फिर आगे फ़रमाया कि क्या वह माहवारी से पवित्र होने और तवाफ़ करने तक हमें रोक लेगी? लेकिन जब लोगों ने बताया कि वह माहवारी आरंभ होने से पहले ही तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा कर चुकी हैं तो फ़रमाया : तब तो वह चल दे। क्योंकि अब उनका केवल तवाफ़-ए-वदा बाक़ी है, जिसे छोड़ने का उनके पास उचित कारण है।
जाबिर बिन समुरा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि कूफ़ा वालों ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के यहाँ साद बिन अबू वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शिकायत की, तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उनको हटाकर अम्मार बिन यासिर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) को उनका हाकिम बना दिया। उन लोगों ने साद (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शिकायत करते हुए यहाँ तक कहा था कि उन्हें अच्छी तरह नमाज़ पढ़ना भी नहीं आता। इसपर उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उन्हें बुलवाया और कहाः ऐ अबू इसहाक़! यह लोग कहते हैं कि आप अच्छी तरह नमज़ नहीं पढ़ते? उन्होंने कहाः जहाँ तक मेरी बात है, अल्लाह की क़सम ! मैं उन्हें अल्लल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जैसी नमाज़ पढ़ाता था और इसमें तनिक भी कोताही नहीं करता था। इशा की नमाज़ पढ़ाता, तो पहली दो रकातें लंबी करता था और बाद की दो रकातें हल्की। उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहाः ऐ अबू इसहाक़! आपके बारे में हमारा यही गुमान है। फिर उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उनके साथ एक आदमी (या कुछ लोगों) को कूफ़ा भेजा, तोकि कूफ़ा वालों से उनके बारे में पूछा जा सके। चुनांचे उन्होंने एक भी मस्जिद नहीं छोड़ी, जहाँ उनके बारे में न पूछा हो। सब लोग उनकी प्रशंसा करते रहे। अंततः, वह बनू अबस की एक मस्जिद में गए, जहाँ उसामा बिन क़तादा नामी आदमी खड़ा हुआ, जिसकी कुन्नियत अबू सादा थी। उसने कहाः जब तुमने हमें क़सम दिलाई है, तो सुनो! साद जिहाद में सेना के साथ खुद नहीं जाते थे और ग़नीमत का धन बराबर तक़सीम नहीं करते थे और निर्णय देते समय न्याय से काम भी नहीं लेते थे। यह सुनकर साद (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहाः अल्लाह की क़सम! मैं तुझे तीन बददुआएँ देता हूँ; ऐ अल्लाह यदि तेरा यह बंदा झूठा है और दिखावे तथा ख्याति प्राप्त करने के लिए खड़ा हुआ है, तो इसे लंबी आयु प्रदान कर, इसकी दरिद्रता बढ़ा दे और इसे आज़माइशों का शिकार बना दे। इसके बाद स्थिति यह हुई कि जब उससे उसका हाल पूछा जाता, तो कहताः मैं आज़माइशों से घिरा हुआ एक लंबी आयु वाला बूढ़ा हूँ। मुझे साद की बददुआ लग गई है। जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन करने वाले वर्णनकर्ता अब्दुल मिलक बिन उमैर कहते हैंः मैंने उसे बाद में देखा था। बुढ़ापे के कारण उसकी भृकुटियाँ लटककर आँखों के ऊपर आ चुकी थीं। इसके बावजूद वह राह चलती लड़कियों को छेड़ता और आँख मारता फिरता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरबानी के दिन नमाज़ के पश्चात ख़ुतबा देते हुए फ़रमायाः "जिसने हमारी तरह नमाज़ पढ़ी तथा हमारी तरह क़ुरबानी की, उसकी क़ुरबानी सही है और जिसने नमाज़ से पहले क़ुरबानी की, उसकी क़ुरबानी सही नहीं है।" यह सुन (बरा बिन आज़िब के मामा) अबू बुरदा बिन नियार ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने अपनी बकरी तो नमाज़ से पहले ही ज़बह कर दी है! दरअसल मुझे लगा कि आज खाने-पीने का दिन है और मेरी ख़्वाहिश हुई कि मेरी बकरी सबसे पहले ज़बह हो। इसलिए मैंने अपनी बकरी ज़बह कर दी और नमाज़ के लिए जाने से पहले ही खा लिया! तो आपने कहाः "तेरी यह बकरी केवल मांस की बकरी है।" उन्होंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे पास एक बकरी का बच्चा है, जो मुझे दो बकरियों से अधिक प्यारा है। क्या वह मेरी ओर से काफ़ी होगा? आपने फ़रमायाः "हाँ, लेकिन तुम्हारे पशचात किसी दूसरे के लिए काफ़ी नहीं होगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने क़ुरबानी के दिन नमाज़ के पश्चात ख़ुतबा देते हुए ज़बह के विधान और उस दिन उसके समय का विवरण प्रस्तुत करते हुए फ़रमाया कि जिसने हमारी इस नमाज़ की तरह नमाज़ पढ़ी तथा हमारे बताए हुए तरीक़े के अनुसार क़ुरबानी की, उसने शरई तरीक़े का पालन किया। लेकिन, जहाँ तक उस व्यक्ति की बात है, जिसने ईद की नमाज़ से पहले ही ज़बह कर दिया, तो उसने ज़बह का समय प्रवेश करने से पहले ही ज़बह कर दिया। अतः, उसकी क़ुरबानी शरई एवं स्वीकार्य नहीं होगी, बल्कि उसका केवल मांस खाना होगा। जब अबू बुरदा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का ख़ुतबा सुना, तो बोले : ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने अपनी बकरी नमाज़ से पहले ही ज़बह कर दी थी। दरअसल मैं जानता था कि आज का दिन खाने-पीने का दिन है। इसलिए मैंने सोचा कि घर में सबसे पहले मेरी ही बकरी ज़बह हो। सो, मैंने अपनी बकरी ज़बह कर दी और और नमाज़ के लिए आने से पहले ही खा लिया। यह सुन आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : तुम्हारी क़ुरबानी शरई दृष्टिकोण से सही नही है। वह तो बस मांस की बकरी है। अबू बुरदा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे पास घर का पाला हुआ बकरी का एक बच्चा है, जो मेरे निकट बहुत मूल्यवान है और मुझे दो बकरियों से ज़्यादा प्रिय है। यदि मैं उसे अल्लाह की राह में ज़बह कर दूँ, तो क्या वह काफ़ी होगा? आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः हाँ, किन्तु यह हुक्म केवल तुम्हारे साथ ख़ास होगा। तुम्हारे सिवा किसी और व्यक्ति को एक वर्ष से कम आयु के बकरी के बच्चे को ज़बह करने की अनुमति नहीं होगी।