





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "एक व्यक्ति एक सुनसान मैदान में चल रहा था कि उसने बादल से एक आवाज़ सुनी कि अमुक व्यक्ति के बाग की सिंचाई कर दो। चुनांचे बादल वहाँ से हट गया और एक काले पत्थर वाली धरती में बरस गया और एक नाली ने उसका सारा पानी अपने अंदर समेट लिया। उस आदमी ने पानी का पीछा करना आरंभ किया, तो देखा कि एक व्यक्ति अपने बाग़ीचा के पास खड़ा कुदाल से पानी इधर-उधर कर रहा है। उसने कहा : ऐ अल्लाह के बंदे, तेरा नाम क्या है? कहाः अमुक! यह वही नाम था, जो उसने बादल में सुना था। उसने कहा : ऐ अल्लाह के बंदे, तुम मुझसे मेरा नाम क्यों पूछ रहे हो? उसने कहा : मैंने उसी बादल से, जिसका यह पानी है, एक आवाज़ सुनी है कि अमुक व्यक्ति के बाग़ीचे की सिंचाई कर दो, जो कि दरअसल तुम्हारा ही नाम था। आख़िर तुम इसमें करते क्या हो? उसने उत्तर दिया : जब तुमने यह बात छेड़ ही दी है, तो मैं बता देता हूँ। बात दरअसल यह है कि मैं देखता हूँ कि इसकी उपज कितनी है, फिर उसके तीन भाग का एक भाग दान कर देता हूँ तथा मैं और मेरा परिवार एक भाग का उपभोग करते हैं और एक भाग इसी भूमि पर खर्च कर देता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने अपनी पत्नी को मासिक धर्म की हालत में तलाक़ दे दी, तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने इसकी चर्चा की। इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को क्रोध में आ गए और फ़रमाया : "वह उसे लौटा ले, फिर पवित्र होने तक रोके रखे, फिर उसे मासिक धर्म आए और पवित्र हो जाए। अब यदि उसे तलाक़ देना चाहे, तो पवित्र हालत में संभोग से पहले तलाक़ दे। यही इद्दत है, जैसा कि सर्वशक्तिमान एवं अल्लाह ने आदेश दिया है।" दूसरे शब्दों के अनुसार : "यहाँ तक कि दोबारा मासिक धर्म आरंभ हो, उस मासिक के सिवा, जिसमें उसने तलाक़ दी है।" एक और शब्द में है : "तो उसे तलाक़ मान ली गई और अब्दुल्लाह ने उसे लौटा लिया, जैसा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें आदेश दिया था।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- ने अपनी पत्नी को मासिक धर्म की दशा में तलाक़ दे दिया और उनके पिता ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को इसकी सूचना दी, तो आप बहुत नाराज़ हुए, क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को हराम तरीक़े से तलाक़ दिया था, जो कि सुन्नत से मेल नहीं खाता। फिर आपने उन्हें आदेश दिया कि अपनी पत्नी को लौटाकर अपने पास रखे, यहाँ तक कि उस मासिक धर्म से पवित्र हो जाए, फिर उसके पश्चात दूसरा मासिक धर्म आए और उससे भी पवित्र हो जाए। इसके बाद यदि उसे तलाक़ देना चाहे, तो सहवास करने से पूर्व ही तलाक़ दे। यही वह इद्दत है, जिसमें अल्लाह ने तलाक़ देने का आदेश दिया है, यदि कोई तलाक़ देना चाहे। उलेमा का इस बात में मतभेद है कि मासिक धर्म की अवधि में तलाक पड़ेगी अथवा नहीं, बावजूद इसके कि मासिक धर्म में तलाक़ देना हराम है और सुन्नत के अनुसार नहीं है। इस मसले में फ़तवा अबू दाऊद की रिवायत के अनुसार दिया जाता है, जिस में है : "आपने उसे अमान्य घोषित कर दिया और कुछ नहीं माना" जबकि इस हदीस के शब्द तलाक़ पड़ने के संबंध में स्पष्ट नहीं हैं और न ही यह स्पष्ट है कि रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ही उसे माना था। इसके विपरीत एक अन्य स्पष्ट हदीस में है : "जो व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करे, जो हमारी शरीयत के अनुसार न हो, वह अस्वीकार्य है।" सहीह बुख़ारी तथा मुस्लिम।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने 'वला' (ऐसा अधिकार जिसके कारण दास को मुक्त करने वाला अपने मुक्त किए दास के मरने के बाद उसकी संपत्ति में से निर्दिष्ट हिस्सों वालों के बाद शेष भाग का वारिस बनता है) को बेचने तथा उसे उपहारस्वरूप देने से मना फ़रमाया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।वला' नसब ही की तरह एक आत्मीय संबंध है और दोनों को क्रय-विक्रय एवं दान के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि 'वला' को बेचा एवं दान नहीं किया जा सकता। दरअसल यह मुक्ति प्रदान करने वाले और मुक्ति प्राप्त करने वाले के बीच एक संबंध है, जिसके आधार पर पहला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मीरास का उत्तराधिकारी बनता है। इसे बेचने तथा दान करने से मना इसलिए किया गया है, क्योंकि यह नसब ही की तरह हस्तांतरित करने से हस्तांतरित होता नहीं है। उदाहरणस्वरूप यदि कोई व्यक्ति अपने भाई, अपने बेटे या अपने भतीजे से अपने संबंध को बेचना चाहे, तो ऐसा किया नहीं जा सकता। नसब सो बेचा नहीं जा सकता और यही हाल वला का भी है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णति है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक देहाती आया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी पत्नी ने काला बच्चा जना है! नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "क्या तुम्हारे पास ऊँट है?" कहा : हाँ। फ़रमाया : "उसका रंग कैसा है?" कहा : लाल। फ़रमाया : "उसमें कोई खाकी रंग का ऊँट है?" कहा : हाँ। फ़रमाया : "वह कहाँ से आया?" कहाः संभवत : ऐसा अनुवंशिक कारणों से हुआ हो। फ़रमाया : "हो सकता है कि तेरे बेटे का रंग भी अनुवंशिक कारणों से काला हुआ हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।फ़ज़ारा क़बीले के एक व्यक्ति के यहाँ एक बच्चा पैदा हुआ, जिसका रंग उसके माता-पिता के रंग से अलग था। अतः, उसके दिल में कुछ शंका पैदा हुई। वह नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास अपनी पत्नी पर लांछन लगाने के उद्देश्य से आया और बताया कि उसके एक कालाकलूटा पच्चा पैदा हुआ है। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसकी मंशा समझ गए। इसलिए, उसकी संतुष्टि एवं उसके भ्रम को दूर करने के लिए एक उदाहरण दिया, जो उसको अच्छी तरह समझ में आ सकता था। उनसे कहा : क्या तुम्हारे पास ऊँट हैं? उसने कहा : हाँ। फ़रमाया : उनका रंग कैसा है? कहा : लाल। फ़रमाया : क्या उनमें से किसी ऊँट का रंग आम ऊँटों से अलग खाकी भी है? कहा : हाँ। फ़रमाया : फिर यह अलग रंग कहाँ से आ गया? उसने कहा : संभवतः ऐसा अनुवांशिक कारणों सो हुआ होगा। आपने खहा : शायद तुम्हारा बेटा भी अनुवांशिक कारणों से कालाकलूटा पैदा हुआ होगा। हो सकता है कि तुम्हारे बाप-दादों में से कोई काला रहा हो और उसी के कारण तुम्हारा बेटा काला हुआ हो। इस उपयुक्त उदाहरण से वह संतुष्ट हो गया और उसका भ्रम भी दूर हो गया।
उक़बा बिन हारिस़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि उन्होंने उम्म-ए-यहया बिंत अबू इहाब से शादी की, तो सौदा की दासी आई और कहने लगी कि मैंने तुम दोनों को स्तनपान कराया है। यह बात मैंने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को बताई, तो आपने मुझसे मुँह फेर लिया। मैंनें थोड़ा-सा हटकर दोबारा आपके सामने बात रखी, तो फ़रमाया : "तुम्हारा विवाह कैसे सही हो सकता है, जबकि उसका दावा है कि उसने तुम दोनों को स्तनपान कराया है?"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।उक़बा बिन हारिस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने उम्म-ए-यहया बिंत अबू इहाब से शादी की, तो एक कालीकलूटी दासी आई और कहने लगी कि उसने उनको और उनकी पत्नी दोनों को दूध पिलाया है। इस तरह, दोनों दूध भाई बहन हो गए। उक़बा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने उस दासी के दावे का ज़िक्र अल्लाह के रसूल के सामने किया और कहा कि वह अपने दावे में झूठी है, तो आपने उस दासी की गवाही के बावजूद उक़बा की अपनी पत्नी के साथ रहने की चाहत का खंडन करते हुए कहा : तुम्हारी यह इच्छा कैसे पूरी हो सकती है, जबकि उस दासी ने इस तरह का दावा कर दिया है और जो कुछ जानती है, उसकी गवाही दे दी है?
साद बिन अबी वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हज्जतुल-वदा के अवसर पर मुझे देखने आए, जब मैं बहुत ज़्यादा बीमार था। मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, आप तो देख ही रहे हैं कि मेरी बीमारी कितनी बढ़ चुकी है। मैं एक धनी व्यक्ति हुँ और मेरा उत्तराधिकारी केवल एक बेटी है। ऐसे में क्या मैं अपने दो तिहाई धन दान कर दुँ? आपने फ़रमाया : नहीं। मैं ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, तो क्या आधे की अनुमति है? फ़रमाया : नहीं। मैंने कहा : तो फिर एक तिहाई की? फ़रमाया : हाँ, एक तिहाई कर सकते हो, लेकिन एक तिहाई भी बहुत है। देखो, यदि तुम अपने उत्तराधिकारियों को धनी छोड़ जाते हो, तो यह इस बात से अच्छा है कि तुम उन्हें निर्धन छोड़ जाओ और वे लोगों के सामने हाथ फैलाते फिरें। याद रखो, तुम जो कुछ भी अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खर्च करोगे, तुम्हें उसकी नेकी मिलेगी। यहाँ तक कि जो निवाला तुम अपनी पत्नी के मुहँ में डालोगे, उसका भी। उनका कहना है कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, क्या मैं पीछे रह जाऊँगा और मेरे साथी मदीना चले जाएँगे? फ़रमायाः यदि तुम पीछे रहकर भी अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारे दर्जे ऊँचे होंगे। यह भी संभव है कि तुम अभी जीवित रहो और बहुत-से लोगों को तुमसे लाभ हो और बहुत-से लोगों को हानि। ऐ अल्लाह , मेरे साथियों की हिजरत को बाक़ी रखना और उन्हें उलटे पावँ वापस न करना। लेकिन बेचारा साद बिन ख़ौला! दअसल अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इस बात पर शोक व्यक्त कर रहे थे कि उनकी मृत्यु मक्का में हो गई।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।साद बिन अबू वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अनहु- हज्जतुल वदा के अवसर पर इतना ज़्यादा बीमार हो गए कि उन्हें लगा कि कहीं मौत न आ जाए। चूँकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की आदत थी कि आप अपने साथियों का हालचाल जानने तथा दुःख बाँटने जाया करते थे, इसलिए उनका भी हाल जानने पहुँचे। ऐसे में, साद -रज़ियल्लाहु अनहु- ने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने कई ऐसे कारण रखे, जिनके आधार पर उनके ख़याल से उनके अधिकतर धन को दान कर देने की अनुमति मिल सकती थी। उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि मुझे उसके कारण मौत का डर सताने लगा है। मैं एक धनी व्यक्ति हूँ। मेरे कमज़ोर उत्तराधिकारी भी नहीं हैं कि मुझे उनकी निर्धनता एवं नष्ट हो जाने का डर हो। उत्तराधिकारी के नाम पर बस एक बेटी है। ऐसे में, क्या मैं आख़िरत के लिए अपना दो तिहाई धन दान कर सकता हूँ? नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : नहीं। उन्होंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल, तो क्या आधा कर सकता हूँ? फ़रमाया : नहीं। पूछा : तो फिर एक तिहाई? फ़रमाया : हाँ, दो तिहाई दान किया जा सकता है, लेकिन यह भी बहुत है। इसलिए उससे कम यानी एक चौथाई या पाँचवाँ भाग सदक़ा करना ही उत्तम है। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें अधिकतर धन सदक़ा करने के बजाय कम सदक़ा करने की हिकमत दो तरह से समझाई : 1- अगर वह मर गए और अपने उत्तराधिकारियों को मालदार अपने धन से लाभ उठाने की अवस्था में छोड़ गए, तो यह इससे कहीं बेहतर है कि अपना धन दूसरों के हवाले करके दुनिया से जाएँ और उनके बच्चे दूसरों के एहसान पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर हों। 2- अगर वह जीवित रह गए और उनका धन बचा रहा, तो उसे शरई तरीक़ों पर ख़र्च करके नेकी कमा सकते हैं। यहाँ तक कि यदि अपनी पत्नी पर खर्च करेंगे, जो कि उनका कर्तव्य भी है, तो उसका भी उनको सवाब मिलेगा। फिर साद बिन अबू वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अनहु- के मन में इस बात का भय पैदा हुआ कि कहीं वह मक्का ही में न मर जाएँ, जहाँ से वह हिजरत करके चले गए थे और जिसे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए छोड़ गए थे तथा इससे उनके हिजरत के सवाब में कोई कमी न आ जाए। अतः, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें बताया कि यदि उन्हें न चाहते हुए भी मक्का में रहना पड़ता है, जहाँ से वह हिजरत करके चले गए थे, फिर यहाँ अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए कोई काम करते हैं, तो इससे उनका दर्जा और ऊँचा होगा। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें एक सुसमाचार सुनाया, जो इस बात का प्रमाण था कि वह स्वस्थ हो जाएँगे और अल्लाह उनके ज़रिए ईमान वालों को फ़ायदा पहुँचाएगा और काफ़िरों का हानि। बाद में हुआ भी यही। वह स्वस्थ हो गए और फ़ारसियों से लड़े जाने वाले युद्ध के सर्वोच्च कमांडर बने। अल्लाह ने उनसे इस्लाम तथा मुसलमानों को बड़ा फ़ायदा पहुँचाया कि उन्होंने कई विजय प्राप्त किए और शिर्क तथा मुश्रिकों को ज़बरदस्त हानि पहुँचाई। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने तमाम साथियों के लिए दुआ की कि अल्लाह उनको उनका उचित स्थान प्रदान करे, उनकी हिजरत को ग्रहण करे और उन्हें उनके धर्म से वापस न लौटाए या फिर उनको उन स्थानों की ओर वापस न करे, जहाँ से वे हिजरत करके आए हैं। चुनांचे अल्लाह ने आपकी इस दुआ को ग्रहण कर लिया। सारी प्रशंसा और उपकार अल्लाह है, जिसने सहाबा के माध्यम से इस्लमा को शक्तिशाली बनाया। फिर आपने साद बिन ख़ौला का ज़िक्र किया, जो मक्का से मदीना की ओर हिजरत करने वालों में शामिल थे, लेकिन अल्लाह का निर्णय यह हुआ कि वह मक्का में आकर मर जाएँ। आपने उनके मक्का में आकर मरने पर दुःख तथा खेद प्रकट किया। आम तौर पर सहाबा इस बात को नापसंद करते थे कि कोई उसी स्थान को जाकर मरे, जहाँ से उसने हिजरत की थी।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "निर्धारित हिस्से उनके हक़दारों तक पहुँचा दो और निर्धारित हिस्सों के बाद जो शेष बच जाए, वह मरने वाले के निकटतम पुरुष संबंधी के लिए है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मीरास (उत्तराधिकार) बाँटने वालों को आदेश दिया है कि वे उसे न्याय के साथ शरीयत के बताए हुए तरीक़े के अनुसार तक़सीम करें। अतः सबसे पहले उन लोगों को उनका भाग दें, जिनके भाग अल्लाह की किताब में निर्धारित कर दिए गए हैं। ये निर्धारित भाग हैं : दो तिहाई, एक तिहाई, छठा भाग, आधा भाग, एक चौथाई भाग और आठवाँ भाग। फिर इसके बाद जो बच जाए, वह मृतक के निकटतम पुरुष व्यक्ति को दे दिया जाए। इस तरह के लोगों को (अरबी भाषा में) 'असबा' कहा जाता है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः मैं पसंद करता हूँ कि मेरे कार्य इस दशा में पेश हों कि मैं रोज़े से रहूँ।" एक रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को जन्नत के द्वार खोले जाते हैं और प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उस व्यक्ति के जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में कहा जाता है : इन दोनों ज़रा मोहलत दो, ताकि आपस में समझौता कर लें।" एक और रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः, प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उसके जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में वह कहता है : इन दोनों को छोड़ दो, यहाँ तक कि आपस मे समझौता कर लें।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उनके पास इस तरह प्रसन्न होकर आए कि आपके चेहेर की धारियाँ चमक रही थीं तथा फ़रमायाः क्या तुम्हें पता है कि मुजज़्ज़िज़ ने अभी-अभी ज़ैद बिन हारिसा और उसामा बिन ज़ैद को देखा और कहा कि यह क़दम एक-दूसरे से संबंध रखते हैं। तथा एक रिवायत में हैः मजज़्ज़िज़, सामुद्रिक विज्ञान (क़ियाफ़ा शनास) का ज्ञानी था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।ज़ैद बिन हारिसा (रज़ियल्लाहु अंहु) गोरे थे और उनके बेटे उसामा (रज़ियल्लाहु अंहु) साँवले रंग के। (इसी रंग में अंतर के कारण) लोग उन दोनों के बारे में संदेह जताते और उसामा की निसबत उनके पिता की ओर सही होने के बारे में एतराज़ जताते, जो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कष्ट देता था। एक दिन दोनों एक चादर से सर ढाँपकर सो रहे थे और उनके पाँव खुले हुए थे कि वहाँ से मुजज़्ज़िज़ मुदलिजी नामी क़ियाफ़ा शनास (सामुद्रिक) गुज़रा और उनके क़दमों के बीच समानताओं को देखकर बोलाः यह क़दम एक-दूसरे से संबंध रखते हैं। क़याफ़ा शनास ने यह बात अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने कही थी, इसलिए आप इससे अत्यधिक प्रसन्न हुए। आप आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के पास गए, तो इस ख़ुशी से आपका चेहरा दमक रहा था कि उसामा (रज़ियल्लाहु अंहु) की निसबत उनके पिता की ओर सही साबित हो रही थी और उन लोगों की बात ग़लत सिद्ध हो रही थी, जो बिना किसी आधार के लोगों की इज़्ज़त-आबरू पर हमला करते हैं।