





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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उबादा बिन सामित -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, जो बद्र युद्ध में शरीक थे और अक़बा की रात अगुवा (नक़ीब) नियुक्त किए गए लोगों में से एक थे, कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया, जबकि आपके आस-पास आपके साथियों में से कई लोग मौजूद थे : "तुम लोग मुझसे इस बात पर बैअत करो कि तुम किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाओगे, चोरी नहीं करोगे, व्यभिचार नहीं करोगे, अपनी संतान का वध नहीं करोगे, कोई ऐसा आरोप (कलंक) नहीं लगाओगे जिसे तुम अपने हाथों एवं पैरों से गढ़ लिए हो और किसी भले काम में अवज्ञा नहीं करेंगे। जो अपने दिए हुए इन वचनों को पूरा करेगा, उसे अल्लाह के यहाँ प्रतिफल मिलेगा और जो इनमें से किसी चीज़ में संलिप्त होगा और उसे दुनिया में दंड मिल गया, तो यह उसके लिए कफ़्फ़ारा है। और जो इनमें से किसी चीज़ में संलिप्त हुआ और अल्लाह ने पर्दा डाल दिया, तो वह अल्लाह के हवाले है। चाहे तो क्षमा कर दे और चाहे तो दंड दे।" चुनांचे हमने इन बातों पर आपसे बैअत की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैउबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु, जो महान बद्र युद्ध में शामिल हुए थे और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मदीना हिजरत करने से पहले मक्का में मौजूदगी के दौरान अक़बा की रात मिना में आपके सहयोग की प्रतिज्ञा लेने वाले प्रतिनिधि मंडल के सरदार थे, बताते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा के बीच बैठे हुए थे कि उनसे निम्नलिखित बातों पर बैअत करने को कहा : 1- अल्लाह की इबादत किसी को साझी नहीं बनाएँगे। 2- चोरी नहीं करेंगे। 3- व्यभिचार में संलिप्त नहीं होंगे। 4- अपने बच्चों की हत्या नहीं करेंगे। ग़रीबी के डर से बच्चों की और शर्म के डर से बच्चियों की। 5- ऐसा झूठ सामने नहीं रखेंगे, जिसे उन्होंने हाथों और पैरों के दरमियान गढ़ लिया हो। क्योंकि अधिकतर गुनाह उन्हीं के द्वारा होते हैं, यद्यपि दूसरे अंग भी गुनाह में शामिल हो जाएँ। 6- किसी नेकी के काम में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अवज्ञा नहीं करेंगे। बैअत करने वालों में से जो इस बैअत का पालन करेगा, उसका प्रतिफल देना अल्लाह का काम है। और जो ऊपर बयान किए गए गुनाहों में से शिर्क को छोड़कर किसी अन्य गुनाह में संलिप्त होगा, और दुनिया में उसे उसका शरई दंड मिल गया, तो यह दंड उसके लिए प्रायश्चित बन जाएगा और फलस्वरूप वह पाक-साफ़ हो जाएगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति इनमें से किसी गुनाह में संलिप्त होगा और उसके बाद अल्लाह ने उसके गुनाह पर पर्दा डाल दिया, तो फिर मामला अल्लाह के हाथ में रहेगा। चाहे तो माफ़ कर दे और चाहे तो दंड दे। चुनांचे उपस्थित सभी लोगों ने आपके हाथ पर इन बातों की प्रतिज्ञा ली।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "इस्लाम की शुरूआत एक अजनबी धर्म के रूप में हुई और शीघ्र ही वह पहले के समान अजनबी बन जाएगा। ऐसे में, शुभ सूचना है अजनबियों के लिए।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि इस्लाम का आरंभ इक्का-दुक्का लोगों के साथ अजनबीपन भरे माहौल में हुआ था और फिर एक समय आएगा जब वह दोबारा अजनबी बन जाएगा तथा उसका पालन करने वालों की संख्या घट जाएगी। इसलिए बहुत ख़ूब हैं इस प्रकार के अजनबी लोग। उन्हें बड़ी ख़ुशी और आँखों की ठंडक मिलने वाली है।
सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुम लोग छोटे-छोटे गुनाहों से बचा करो। क्योंकि छोटे-छोटे गुनाहों का उदाहरण इस तरह समझो कि कुछ लोग किसी वादी में रुके, फिर एक आदमी एक लकड़ी ले आया और दूसरा व्यक्ति एक लकड़ी, यहाँ तक कि उन्होंने अपनी रोटियाँ पका लीं। छोटे-छोटे गुनाहों के आधार पर जब इन्सान की पकड़ होगी, तो ये उसका विनाश कर देंगी।"
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने छोटे गुनाहों के मामले में लापरवाही बरतने और उनमें अधिक संलिप्त होने से मना किया है। क्योंकि ये छोटे-छोटे गुनाह मिलकर इन्सान के विनाश का सबब बन जाते हैं। आपने समझाने के लिए इसका उदाहरण यह दिया कि जैसे कुछ लोग किसी वादी में उतरे और हर व्यक्ति ने एक-एक छोटी-छोटी लकड़ी लाकर रख दी, जिससे इतनी लकड़ियाँ एकत्र हो गईं कि खाना बन जाए। फिर आपने बताया कि मामूली समझे जाने वाले गुनाह भी, जब उनसे तौबा न की जाए और अल्लाह की ओर से माफ़ी का परवाना न मिले, पकड़ होने पर विनाश का सबब बन जाते हैं।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "बेशक मुझे सदाचार को पूर्ण रूप देने के लिए भेजा गया है।"
इसे बुख़ारी ने अल-अदब अल-मुफ़रद में, तथा अह़मद और बैहक़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ने आपको उत्तम एवं उत्कृष्ट चरित्र को परिपूर्ण करने के लिए भेजा है। आप पिछले सभी पैगंबरों के पूरक और अरबों के अच्छे चरित्र को परिपूर्ण करने वाले के रूप में भेजे गए थे। क्योंकि अरब अच्छाई से प्रेम और बुराई से घृणा करते थे। वे पौरुष, दरिया दिली और स्वाभिमान वाले लोग थे। ऐसे में, आपको उनकी नैतिक कमियों, जैसे कि वंश का घमंड, अहंकार और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को तुच्छ जाना आदि, को दूर करने के लिए भेजा गया था।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आदम की संतान मुझे कष्ट देती है। वह ज़माने को गाली देती है। जबकि मैं ही ज़माने (का मालिक) हूँ। मामला मेरे हाथ में है, मैं ही रात और दिन को पलटता हूँ।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि उच्च एवं महान अल्लाह एक हदीस-ए-क़ुदसी में कहता है : जब कोई व्यक्ति विपत्तियों और अप्रिय घटनाओं के घटित होने पर समय को कोसता है, तो वह मुझे दुख पहुँचाता है और मेरा अपमान करता है। क्योंकि अल्लाह ही इस ब्रह्मांड का रचयिता और इसमें घटित होने वाली सभी घटनाओं का निर्माता है। समय भी उसी के वश में है और इसमें घटित होने वाली सभी घटनाएँ अल्लाह के आदेश से ही होती हैं। इसलिए, समय को कोसना अल्लाह को कोसने के समान है।
अबू रुक़ैया तमीम बिन औस दारी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "धर्म, शुभचिंतन का नाम है।" हमने कहा : किसका? तो फ़रमाया : "अल्लाह, उसकी किताब, उसके रसूल, मुसलमानों के मार्गदर्शकों और आम लोगों का।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि दीन का आधार निष्ठा और सत्य पर है। हर काम बिल्कुल उसी तरह होना चाहिए, जिस तरह अल्लाह ने वाजिब किया है। कोई कोताही या धोखा नहीं होना चाहिए। चुनांचे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि यह निष्टा एवं सच्चाई किसके प्रति होनी चाहिए, तो आपने कहा : 1- उच्च एवं महान अल्लाह के प्रति। इसका अर्थ यह है कि केवल उसी की इबादत की जाए, किसी को उसका साझी न बनाया जाए, उसके पालनहार तथा पूज्य होने तथा उसके नामों एवं गुणों पर विश्वास रखा जाए, उसके आदेश का सम्मान किया जाए और उसपर ईमान लाने का आह्वान किया जाए। 2- अल्लाह की किताब पवित्र क़ुरआन के प्रति : इसका मतलब यह है कि क़ुरआन को अल्लाह की वाणी माना जाए, उसे अल्लाह की अंतिम तथा पिछली तमाम शरीयतों को निरस्त करने वाली किताब माना जाए, उसे उचित सम्मान दिया जाए, उसकी तिलावत की जाए, उसकी सुदृढ़ आयतों पर अमल किया जाए, उसकी अस्पष्ट आयतों को स्वीकार किया जाए, उसकी आयतों का ग़लत अर्थ बताने वालों की ग़लत-बयानियों को सामने लाया जाए, उसके उपदेशों से शिक्षा ग्रहण की जाए, उसमें निहित ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार किया जाए और उसका आह्वान किया जाए। 3- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के प्रति : इसका अर्थ यह है कि आपके अंतिम रसूल होने पर विश्वास रखा जाए, आपकी दी हुई शिक्षाओं की पुष्टि की जाए, आपके आदेशों का पालन किया जाए, आपकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहा जाए, आपके बताए हुए तरीक़े ही के अनुसार अल्लाह की इबादत की जाए, आपके अधिकार को महत्व दिया जाए, आपको सम्मान दिया जाए, आपके आह्वान का प्रचार-प्रसार किया जाए, आपकी लाई हुई शरीयत को फैलाया जाए और आपपर लगाए जाने वाले आरोपों का खंडन किया जाए। 4- मुस्लिम शासकों के प्रति : इसका अर्थ यह है कि सही काम पर उनका सहयोग किया जाए, शासकीय मामलात में उनसे विवाद न किया जाए और अल्लाह की आज्ञाकारिता में उनकी बात सुनी जाए और उनका पालन किया जाए। 5- आम मुसलमानों के प्रति : इसका अर्थ यह है कि उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए, उनको अच्छे कामों की ओर बुलाया जाए, उनको कष्ट देने से बचा जाए, उनका भला हो इस बात से प्रेम रखा जाए और नेकी तथा धर्म के कामों में उनका सहयोग किया जाए।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : फ़रमायाः "आदमी के हर जोड़ पर, हर रोज़ जिसमें सूरज निकलता है, सदक़ा है; तुम दो व्यक्तियों के बीच न्याय करो सदक़ा है, किसी को उसके जानवर पर सवार होने में मदद करो या उसपर उसका सामान लाद दो सदक़ा है, अच्छी बात सदक़ा है, नमाज़ के लिए जाते समय उठने वाला हर क़दम सदक़ा है और रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटाना सदक़ा है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि शरीयत का पालन करने पर बाध्य हर मुसलमान को प्रत्येक दिन उसकी हड्डी के हर जोड़ के बदले में एक एक नफ़ली सदक़ा इस बात के शुक्र के तौर पर करना है कि उसने उसे स्वस्थ आकार दिया और उसकी हड्डियों के जोड़ बनाए, जिनके कारण शरीर के अंगों को फैलाना और समेटना संभव हो सका। यह सदक़ा सभी प्रकार के नकी के कामों से अदा हो सकता है। ज़रूरी नहीं है कि धन ही खर्च किया जाए। जैसे : दो झगड़ रहे व्यक्तियों के बीच न्याय के साथ निर्णय करना और सुलह करा देना सदक़ा है। किसी ऐसे व्यक्ति को, जो सवारी पर चढ़ न पा रहा हो, सवारी पर चढ़ा देना या उसका सामान लाद देना सदक़ा है। अच्छी बात, जैसे ज़िक्र, दुआ और सलाम आदि सदक़ा हैं। नमाज़ के लिए जाते समय उठने वाला हर क़दम सदक़ा है। रास्ते से किसी कष्ट देने वाली वस्तु को हटा देना सदक़ा है।
उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कठिनाई और आसानी में, चुस्ती और सुस्ती में और हमारे ऊपर तरजीह दिए जाने की अवस्था में भी सुनेंगे और अनुसरण करेंगे। और इस बात पर बैअत की कि हम शासकों से शासन के मामले में नहीं झगड़ेंगे और जहाँ कहीं भी होंगे, हक़ बात कहेंगे और इस विषय में किसी निंदा करने वाले की निंदा की परवाह नहीं करेंगे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से इस बात की प्रतिज्ञा ली कि वे आसान तथा कठिन हालत और धनवान् तथा निर्धन होने की अवस्था में, शासकों के आदेश उनको पसंद हों या न हों, यहाँ तक कि शासक सार्वजनिक धन एवं पदों आदि के मामले में उनपर किसी और को तरजीह ही क्यों न देते हों, उनकी बात मानकर चलेंगे और उनके विरुद्ध बग़ावत नहीं करेंगे। क्योंकि उनसे लड़ने के नेतीजे में जो फ़ितना व फ़साद मचेगा, वह उनके अत्याचार के नतीजे में होने वाले फ़ितना व फ़साद से अधिक बड़ा है। आपने उनसे इस बात की भी प्रतिज्ञा ली कि जहाँ भी रहेंगे अल्लाह के लिए सत्य ही कहेंगे और किसी की निंदा की परवाह नहीं करेंगे।
मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "तुमपर ऐसे शासक नियुक्त हो जाएँगे, जिनके कुछ काम तुम्हें अच्छे लगेंगे और कुछ बुरे। ऐसे में जो (उनके बुरे कामों को) बुरा जानेंगे, वह बरी हो जाएँगे और जो खंडन करेंगे, वह सुरक्षित रहेंगे। परन्तु जो उनको ठीक जानेंगे और शासकों की हाँ में हाँ मिलाएँगे (वह विनाश के शिकार होंगे)।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हम उनसे युद्ध न करें? फ़रमाया : "नहीं! जब तक वे नमाज़ पढ़ते रहें।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि हमारे शासक ऐसे लोग बन जाएँगे, जिनके कुछ काम शरीयत के अनुसार होने के कारण हमको सही लगेंगे और कुछ शरीयत विरोधी होने के कारण हमकों ग़लत लगेंगे। ऐसे में जो उनके ग़लत कामों को अपने दिल से बुरा जानेगा और इस स्थिति में नहीं होगा कि उनका खंडन कर सके, तो वह गुनाह एवं मुनाफ़िकत से बरी माने जाएगा। इसी तरह जिसके पास हाथ से रोकने या ज़बान से खंडन करने की शक्ति होगी और वह इस शक्ति का उपयोग करेगा, वह गुनाह तथा उसमें शरीक होने से सुरक्षित रहेगा। इसके विपरीत जो उनके इन बुरे कामों को अच्छा जानेगा और उनके पद्चिह्नों पर चलेगा, वह उनकी ही तरह विनाश का शिकार हो जाएगा। फिर सहाबा ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा किया क्या हम इस तरह के शासकों से युद्ध न करें, तो आपने उनको इससे मना किया और फ़रमाया कि नहीं, ऐसा उस समय तक न करना, जब तक वे नमाज़ क़ायम करते रहें।