





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है,, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब बंदा बीमार होता है या यात्रा में निकलता है, तो उसके लिए उसी तरह की इबादतों का सवाब लिखा जाता है, जो वह घर में रहते तथा स्वस्थ रहते समय किया करता था।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यहाँ अल्लाह के एक अनुग्रह का उल्लेख कर रहे हैं। बता रहे हैं कि जब कोई मुसलमान स्वस्थ रहते हुए और घर में रहने की अवस्था में नियमित रूप से कोई काम करता रहा हो और फिर बीमारी के कारण वह उस काम को कर न पाए या सफ़र में निकलने की वजह से उसे छोड़ना पड़े या किसी भी मजबूरी के कारण उसे न कर सके, तो उसके लिए उतना ही सवाब लिखा जाएगा, जितना स्वस्थ होने या घर रहने पर उस काम को करने से मिलता।
तमीम दारी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "धर्म, शुभचिंतन का नाम है।" हमने कहा : किसका? तो फ़रमाया : "अल्लाह, उसकी किताब, उसके रसूल, मुसलमानों के मार्गदर्शकों और आम लोगों का।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि दीन का आधार निष्ठा और सत्य पर है। हर काम उसी तरह होना चाहिए, जिस तरह अल्लाह ने वाजिब किया है। कोई कोताही या धोखा नहीं होना चाहिए। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसी ने पूछा कि शुभचिंतन किसका होना चाहिए? तो आपने उत्तर दिया : 1- पवित्र एवं महान अल्लाह का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हम विशुद्ध रूप से उसी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए काम करें, किसी को उसका साझी न बनाएँ, उसके रब तथा पूज्य होने और उसके नामों तथा गुणों पर विश्वास रखें, उसके आदेशों को सम्मान दें और उसके प्रति विश्वास रखने का आह्वान करें। 2- अल्लाह की किताब पवित्र क़ुरआन का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हम इस बात पर विश्वास रखें कि क़ुरआन अल्लाह की वाणी तथा उसका उतारा हुआ अंतिम ग्रंथ है और इसने पिछली तमाम शरीयतों को निरस्त कर दिया है। साथ ही हम इस किताब को सम्मान दें, उसकी उचित रूप से तिलावत करें, उसकी मुहकम (स्पष्ट अर्थ वाली) आयतों पर अमल करें और मुतशाबेह (अस्पष्ट अर्थ वाली) आयतों को स्वीकार करें, उसे आर्थिक छेड़-छाड़ करने वालों के हाथों से बचाएँ, उसकी नसीहतों से शिक्षा ग्रहण करें, उसके ज्ञान को फैलाएँ और उसकी ओर लोगों को बुलाएँ। 3- अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का शुभचिंतन : यानी हम इस बात का विश्वास रखें कि आप अंतिम रसूल हैं, आपकी लाई हुई शिक्षाओं को सच मानें, आपके आदेशों का पालन करें, आपकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहें, आपके बताए हुए तरीक़ों से ही अल्लाह की इबादत करें, आपको सम्मान दें, आपके आह्वान को फैलाएँ, आपकी शरीयत को आम करें और आपपर कोई आरोप लगाया जाए, तो उसका खंडन करें। 4- मुस्लिम शासकों का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हक़ पर उनका सहयोग किया जाए, उनके विरुद्ध विद्रोह न किया जाए और जब तक वे अल्लाह की आज्ञा अनुसार काम कर रहे हों, तो उनकी बात सुनी और मानी जाए। 5- आम मुसलमानों का शुभचिंतन : इसका मतलब है उनके साथ अच्छा बर्ताव करना और उनपर उपकार करना, उनको अच्छे काम का आह्वान करना, उनको कष्ट से बचाना, उनकी भलाई चाहना और नेकी तथा परहेज़गारी में उनके सहयोग से काम करना।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने इस घर में कहते हुए सुना है : "ऐ अल्लाह! जो व्यक्ति मेरी उम्मत की कोई ज़िम्मेवारी हाथ में ले, फिर वह उन्हें कठिनाई में डाले, तो तू उसे कठिनाई में डाल। और जो मेरी उम्मत की कोई ज़िम्मेवारी हाथ में ले, फिर उनके साथ नर्मी का मामला करे, तो तू उसके साथ नर्मी का मामला कर।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हर उस व्यक्ति के लिए बददुआ की है, जो मुसलमानों की कोई ज़िम्मेवारी हाथ में ले, वह ज़िम्मेवारी छोटी हो कि बड़ी, वह ज़िम्मेवारी आम हो या खास, फिर लोगों के साथ नर्मी भरा व्यवहार करने की बजाय उनको कठिनाई में डाले। इस प्रकार के व्यक्ति के हक़ में आपने बददुआ यह की है कि उसके कर्म की कोटि का प्रतिफल देते हुए अल्लाह उसे भी कठिनाई में डाले। जबकि ज़िम्मेवारी मिलने के बाद लोगों के साथ नर्मी भरा व्यवहार करने वाले और उनके साथ आसानी करने वाले के हक़ में यह दुआ की है कि अल्लाह उसके साथ नर्मी भरा व्यवहार करे और उसके काम आसान कर दे।
माक़िल बिन यसार मुज़नी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जिस बंदे को अल्लाह जनता की रखवाली का काम सोंपे और वह जिस दिन मरे तो उन्हें धोखा देते हुए मर जाए, तो उसपर अल्लाह जन्नत हराम कर देता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि हर व्यक्ति को अल्लाह ने लोगों का संरक्षक बनाया है। संरक्षण चाहे आम हो, जैसे शासक का संरक्षण या खास, जैसे घर में एक पुरुष का संरक्षण या घर में एक स्त्री का संरक्षण। ऐसे में जिसने अपने अधीन लोगों के हक़ में कोताही की, धोखा किया और उनके सांसारिक एवं धार्मिक अधिकारों को नष्ट कर दिया, वह इस सख़्त दंड का हक़दार बन गया।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो मुसलिम शासक के आज्ञापालन से इनकार करे और (मुसलमानों की) जमात से निकल जाए, फिर उसकी मृत्यु हो जाए तो ऐसी मृत्यु जाहिलियत वाली मृत्यु है। जो ऐसे झंडे के नीचे लड़ाई लड़े जिसका उद्देश्य स्पष्ट न हो, अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा के लिए क्रोधित होता हो, अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा के लिए युद्ध करने का आह्वान करता हो, या अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा को समर्थन देता हो, फिर इसी अवस्था में मारा जाए, तो यह जाहिलियत वाली मृत्यु है। जो मेरी उम्मत के विरुद्ध लड़ाई के लिए निकले तथा उम्मत के नेक व बुरे लोग सभी को मारे, न मोमिन को छोड़े और न अह्द (संधि) वाले के अह्द (संधि) का ख़याल करे, ऐसा व्यक्ति मुझसे नहीं और न मैं उससे हूँ।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जो व्यक्ति शासकों के अनुसरण के दायरे से बाहर निकल गया और शासक के हाथ पर एकमत होकर बैअत करने वाली मुसलमानों की जमात को छोड़कर अलग हो गया तथा इसी अलगाव की अवस्था में मर गया, वह जाहिलियत की मौत मरा, जो न किसी अमीर का अनुसरण करते थे और न किसी एक जमात से जुड़े रहते थे। अलग-अलग टोलियों में बटकर एक-दूसरे से युद्ध किया करते थे। आपने आगे बताया है कि जिसने किसी ऐसे झंडे के नीचे युद्ध किया, जिसके बारे में यह स्पष्ट न हो कि उसे सत्य के लिए उठाया गया है या असत्य के लिए, वह दीन या सत्य की बजाय अपने समुदाय या अपने क़बीले के प्रति पक्षपातपूर्ण रवय्या के कारण क्रोध में आता हो और इसी पक्षपात को चरितार्थ करने के लिए युद्ध करता हो, ऐसा व्यक्ति जब इसी हालत में मारा जाए, तो उसका मारा जाना जाहिलियत के मारे जाने की तरह होगा। इसी तरह जो व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत से बग़ावत (विद्रोह) कर बैठे, उसके अच्छे और बुरे हर आदमी की गर्दन उड़ाने लगे, वह अपने इन ग़लत कामों की कोई परवाह न करता हो और उनके अंजाम से डरता न हो, ग़ैर-मुस्लिमों तथा शासकों को दिए गए वचनों का पालन करने की बजाय खुले आम उनका उल्लंघन करता हो, तो यह कबीरा (बड़ा) गुनाह है और ऐसा करने वाला इस बड़ी सख़्त चेतावनी का हक़दार है।
अरफ़जा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना है : “जो तुम्हारे पास इस हाल में आए कि तुम लोग किसी को ख़लीफ़ा मानकर उसका अनुसरण कर रहे हो तथा वह तुम्हारी एकता को भंग करना चाहे या तुम्हारी जमात में बिखराव पैदा करना चाहे, तो ऐसे व्यक्ति को कत्ल कर दो।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब मुसलमान एकमत होकर किसी को शासक मान चुके हों और एक जमात के रूप में रह रहे हों और फिर कोई आकर शासन के मामले में उससे उलझने लगे और मुसलमानों की जमात में फूट डालना चाहे, तो उसकी बुराई से बचने और मुसलमानों को रक्तपात से सुरक्षित रखने के लिए उसे रोकना और उससे युद्ध करना वाजबि होगा।
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिहाद का एक बहुत बड़ा रूप किसी अत्याचारी शासक के सामने न्याय की बात करना है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि अल्लाह की राह में जिहाद का एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक रूप किसी अत्याचारी शासक के सामने सच्ची एवं न्याय की बात करना है। क्योंकि यह अच्छे कार्य का आदेश देने और बुरे कार्य से रोकने के दायरे में आता है। यह कार्य चाहे कथन द्वारा किया जाए, कार्य द्वारा किया जाए, लिखित रूप से किया जाए या किसी अन्य तरीक़े से, जिससे उद्देश्य पूरा हो जाए और बुराई दूर हो जाए।
अबू सुफ़यान बिन सख़्र बिन हर्ब से रिवायत है कि हिरक़्ल ने कहाः वह- अर्थात्, नबी - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तुम्हें किन बातों का आदेश देते हैं? अबू सुफ़यान ने कहा कि मैं बोलाः वह कहते हैं कि एक अल्लाह की इबादत करो, किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ तथा उन बातों को छोड़ दो जो तुम्हारे बाप-दादा कहते हैं। तथा हमें नमाज़, सत्य, पाकबाज़ी तथा नातेदारों के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देते हैं।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।यहाँ अबू सुफ़यान सख़्र बिन हर्ब की हिरक़्ल के साथ होने वाली मशहूर वार्तालाप का कुछ अंश दिया गया है। अबू सुफ़यान उन दिनों मुश्रिक थे। क्योंकि वह मुसलमान बहुत बाद में हुए थे। यह वार्तालाप हुदैबिया की संधि एवं मक्का विजय के बीच के समयखंड में शाम देश में हुई थी। उनके साथ क़ुरैश के कुछ अन्य लोग भी थे। हिरक़्ल उन दिनों ईसाइयों का बादशाह था। उसने तौरात, इन्जील, एवं पूर्ववर्ती आसमानी किताबें पढ़ रखी थीं। वह एक चतुर बादशाह था। जब उसने सुना कि हिजाज़ से अबू सुफ़यान कुछ लोगों के साथ आए हैं, तो उन्हें बुला भेजा और उनसे अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की हालत, कुल, साथियों, साथियों की ओर से उन्हें प्राप्त होने वाले सम्मान और आपकी वचनबद्धता के बारे में पूछने लगा। जब वह कोई बात पूछता और यह लोग उत्तर देते, तो वह जान जाता कि यह वही नबी है, जिसकी भविष्यवाणी पिछली किताबों ने की है। लेकिन राज्य का लोभ उसके पाँव की बेड़ी बन गया और वह मुसलमान नहीं हुआ। उसने अबू सुफ़यान से जो बातें पूछी थीं, उनमें से एक यह थी कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- किन बातों का आदेश देते हैं? अबू सुफ़यान ने उत्तर दिया था : वह आदेश देते हैं कि लोग केवल एक अल्लाह की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। अल्लाह के अतिरिक्त न किसी फ़रिश्ते की उपासना करें, न रसूल की। किसी पेड़ को पूजें न पत्थर को। सूर्य को न चाँद को। न किसी और वस्तु को। इबादत केवल अल्लाह की हो!! दरअसल यही सारे रसूलों का संदेश रहा है। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- भी वही संदेश लाए थे, जो आपसे पहले अन्य रसूलगण ला चुके थे। अबू सुफ़यान ने आगे कहा कि आप कहते हैं : "उन सारी बातों को छोड़ दो, जो तुम्हारे पूर्वज मानते आए हैं।" यह बात सत्य से परे थी। क्योंकि उनके पूर्वज बुतों की पूजा तथा इस प्रकार के जो काम करते आए थे, आपने उन्हें छोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन वे जिन उच्च चरित्रों एवं उत्तम आदर्शों का पालन करते आए थे, उन्हें छोड़ने का आदेश नहीं दिया था। उनका कथन : "वह हमें नमाज़ का आदेश देते हैं।" नमाज़ बंदे और उसके रब के बीच एक संबंध और मूलभूत दो गवाहियों के बाद इस्लाम का सबसे ज़रूरी कार्य है। इसी से मोमिन एवं काफ़िर की पहचान होती है और यही हम मुसलमानों को मुश्रिकों एवं काफ़िरों से पृथक करने वाली चीज़ है। स्वयं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "हमें अविश्वासियों से पृथक करने वाली चीज़ नमाज़ है। जिसने नमाज़ छोड़ दी, उसने अविश्वास दिखाया।" उन्होंने इसके बाद कहा : "तथा सच कहने का आदेश देते हैं।" यानी अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने मानने वालों को सच कहने का आदेश देते थे। अल्लाह तआला का कथन है : "ऐ ईमान वालो! अल्लाह का भय रखो और सच्चे लोगों के साथ रहो।" सच्चाई इनसान का एक उत्कृष्ट गुण है। उसके दो प्रकार हैं : एक अल्लाह के साथ सच्चाई तथा दूसरा उसके बंदों के साथ सच्चाई। दोनों ही उत्कृष्ट आचरण में शुमार होते हैं। उसके बाद उन्होंने कहा : "वह पाकदामनी का आदेश देते हैं।" पाकदामनी के भी दो प्रकार हैं। शर्मगाह की शहवत की पाकदामनी और पेट की शहवत की पाकदामनी। शर्मगाह की शहवत की पाकदामनी यह है कि इनसान व्यभिचार और उसकी ओर ले जाने वाली सभी चीज़ों से दूर रहे, जबकि पेट की शहवत की पाकदामनी यह है कि इनसान किसी के सामने हाथ फैलाने और किसी से कुछ माँगने से बचे। क्योंकि किसी से कुछ माँगना अपमान का कारण हुआ करता है और माँगने वाले का हाथ नीचे, जबकि देने वाले का हाथ ऊपर होता है। लिहाज़ा अनावश्यक किसी से कुछ माँगना जायज़ नहीं है। उसके बाद उन्होंने कहा : "नातेदारों के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देते हैं।" यानी अल्लाह ने जिन नातेदारों के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया है, उनके साथ, निकटता के आधार पर वरीयता का ख़याल रखते हुए, अच्छा व्यवहार किया जाए। याद रहे कि रिश्तेदारों की सूचि में सबसे ऊँचा स्थान माता-पिता का है। माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना नेकी भी है और रिश्ता निभाना भी। फिर, रिश्देदारों में जो जितना क़रीब है, वह अच्छे व्यवहार का उतना ही हक़दार है। मसलन भाई चचा से अधिक हक़दार है और चचा पिता के चचा से अधिक। याद रहे कि रिश्तेदारी निभाने का कर्तव्य पालन हर उस चीज़ से हो सकता है, जो जनसाधारण में प्रचलित हो।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "आने वाले समय में वरीयता दिए जाने के मामले और ऐसी बातें सामने आएँगी, जो तुम्हें बुरी लगेंगी।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! तो आप हमें क्या आदेश देते हैं? फ़रमाया : "तुम अपनी ज़िम्मेवारियाँ अदा करते रहना और अपना हक़ अल्लाह से माँगना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि आने वाले दिनों में मुसलमानों के शासक ऐसे लोग बन जाएँगे, जो मुसलमानों के धन आदि को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ खर्च करेंगे और मुसलमानों को उनके अधिकार से वंचित रखेंगे। इसी तरह उनकी ओर से दीन से संबंधित कई ऐसी चीज़ें सामने आएँगी, जो तुम्हें पसंद नहीं होंगी। तब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों ने आपसे पूछा : ऐसी परिस्थिति में उनको क्या करना चाहिए? आपने बताया कि उनका सार्वजनिक धन को हड़प लेना तुमको इस बात पर न उभारे कि तुम उनकी बात सुनने तथा मानने के अपने कर्तव्य का पालन करने से दूर हो जाओ। तुम सब्र से काम लेना, उनकी बात सुनना और मानना, उनसे उलझने की कोशिश मत करना, अपना हक़ अल्लाह से माँगना और इस बात की दुआ करना कि अल्लाह उनको सुधार दे और उनकी बुराई और अत्याचार से तुमको बचाए।