





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैंः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक सफर में थे। इशा की नमाज़ पढ़ी, तो एक रकअत में सूरा वत्-तीनि वज़्-ज़ैतून की तिलावत की। मैंने आपसे उत्तम आवाज़ अथवा उत्तम क़िराअत किसी की नहीं सुनी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इशा की नमाज़ की पहली रकात में सूरा 'वत्-तीन वज़़्-ज़ैतून' पढ़ी; क्योंकि आप सफ़र में थे और सफ़र की परेशानी एवं तकान ज़्यादा लंबी क़िरात की अनुमति नहीं देती। लेकिन सफ़र में होने के बावजूद नमाज़ के अंदर अच्छी आवाज़ में क़ुरआन पढ़ने से नहीं रुके, जो कुरान सुनते समय, विनीत होने का कारण बनता है और जिस कारण दिल के न भटकने की कैफ़ियत पैदा होती है।
अब्दुल्लाह बिन मालिक बिन बुहैना रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ पढ़ते, तो (सजदे की अवस्था में) अपने दोनों बाज़ुओं को इतना हटाकर रखते कि आपकी बगलों का उजलापन प्रकट हो जाता।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब सजदा करते, तो सजदे के दौरान दोनों हाथों को पहलुओं से इतना ज़्यादा अलग रखते कि दोनों बगलों की चमड़ी की सफ़ेदी नज़र आ जाती। यह दरअसल दोनों बाज़ुओं को दोनों पहलुओं से अलग रखने में अतिशयोक्ति है।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बीमारी अधिक बढ़ गई, तो आपपर बेचैनी छाने लगी। यह देख, फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहाः हाय मेरे पिता की बेचैनी! तो आपने फ़रमायाः "आज के बाद तेरे पिता को कोई बेचैनी नहीं होगी।" फिर जब आपका स्वर्गवास हो गया, तो उन्होंने कहाः हाय मेरे पिता! मेरे पिता ने रब की पुकार स्वीकार कर ली, जब उसने आपको पुकारा! हाय मेरे पिता! जन्नतुल फिरदौस आपका ठिकाना है! हम जिबरील को आपकी मृत्यु की सूचना देंगे! जब आपको दफ़न कर दिया गया, तो फ़ातिमा (रजि़यल्लाहु अन्हा) ने कहाः तुम लोगों को यह कैसे अच्छा लगा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर मिट्टी डालो?
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।यह हदीस, मृत्यु के समय हमारे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के धैर्य को चित्रित करती है। मृत्यु के समय जब बीमारी अधिक बढ़ गई, तो आपकी परेशानी इतनी ज़्यादा थी कि बार-बार बेहोश होने लगे। इसके अंदर एक बड़ी हिकमत भी छिपी हुई थी। हिकमत यह थी कि आपको सब्र के बदले में अल्लाह के यहाँ ऊँचे दर्जे प्राप्त हों। जब आप बेहोश हो जाते, तो फ़ातिमा -रज़ियल्लाह अनहा- जो स्त्री होने के नाते सब्र की शक्ति कुछ कम रखती थीं, आपकी परेशानी से आहत होकर कहतीं : "हाय मेरे पिता की बेचैनी!" यह सुन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "आज के बाद तेरे पिता को किसी बेचैनी का सामना नहीं करना पड़ेगा।" क्योंकि आप उसके बाद सबसे ऊँचे मित्रों वाले स्थान में पहुँच गए, जैसा कि आपने मृत्यु के समय घर की छत की ओर देखते हुए कई बार कहा था : "ऐ अल्लाह! सबसे ऊँचे मित्रों वाले स्थान में पहुँचा दे। ऐ अल्लाह! सबसे ऊँचे मित्रों वाले स्थान में पहुँचा दे।" जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मृत्यु हो गई, तो फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु अनहा- आपकी कुछ विशेषताओं को बयान करते हुए थोड़ा बहुत रोने लगीं, जो कि अल्लाह के निर्णय से नाराज़गी का द्योतक नहीं था। फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने कहा : "आपने अपने प्रभु का आमंत्रण ग्रहण कर लिया।" क्योंकि अल्लाह ही के हाथ में हर वस्तु का नियंत्रण और सारी सृष्टियों का जीवन-मरण है। आपने अल्लाह के पुकारने वाले की बात सुन ली।अर्थात , आपकी मृत्यु के बाद अन्य मोमिनों के समान आपकी आत्मा को ऊपर ले जाया गया, यहाँ तक कि सातवें आकाश के ऊपर अल्लाह के सामने उपस्थित किया गया। फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने आगे कहा : "हाय मेरे पिता! जन्नत अल-फ़िरदौस में आपका ठिकाना है!" क्योंकि आपको जन्नत का उच्चतम स्थान प्राप्त होगा। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "अल्लाह से मेरे लिए 'वसीला' माँगा करो। क्योंकि वसीला जन्नत का एक स्थान है, जो अल्लाह के केवल एक बंदे के लिए उचित है। मुझे आशा है कि वह बंदा मैं ही हूँ।" यह बात संदेह से परे है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को जन्नत अल-फ़िरदौस प्राप्त होगी, जो कि जन्नत की उच्चतम श्रेणी है और जिसके ऊपर की छत स्वयं सर्वशक्तिमान अल्लाह का अर्श होगा। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उसका सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त होगा। उसके बाद उन्होंने कहा : "हाय मेरे पिता! हम जिबरील को आपकी मृत्यु की सूचना देंगे!" क्योंकि आपके जीवनकाल में जिबरील आपके पास आते और वह्य के पुनर्पठन में सहयोग करते थे। वह्य अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के जीवनकाल से ही जुड़ी हुई थी। फिर जब आपको उठाकर ले जाया गया और दफ़न किया गया, तो उन्होंने कहा : "क्या तुम लोगों को यह अच्छा लगा कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर मिट्टी डाल दो?" यह प्रश्न उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की जुदाई के नितांत शोक से शोकाकुल होकर और इस जानकारी के आधार पर किया था कि अल्लाह ने सहाबा के दिलों को अपने रसूल के प्रेम से लबालब भर रखा है। लेकिन सच्चाई यह है कि सारा निर्णय अल्लाह के हाथ में है और सारे लोगों को उसी की ओर लौटकर जाना है। अल्लाह ने अपनी किताब में अपने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा है : "निश्चय ही आपको भी मरना है और इन लोगों को भी मरना है।"
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का वर्णन है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बात इतनी स्पष्ट और दो-टूक होती कि हर सुनने वाला समझ जाता।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- की इस हदीस में है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल- की बात स्पष्ट होती थी। यानी वह इतनी साफ़ होती थी कि कोई अक्षर दूसरे अक्षर में और कोई शब्द दूसरे शब्द में घुसता नहीं था। हर सुनने वाला उसे आसानी से समझ सकता था। न उसमें उलझाव होता था और न अनावश्यक विस्तार। आप इतना ठहर-ठहर के बात करते थे कि यदि कोई आपके शब्दों को गिनना चाहता, तो गिन सकता था। दरअसल बात यह है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को सारगर्भित अंदाज़ में बात करने की अद्भुत क्षमता दी गई थी। सारगर्भित अंदाज़ में बात करने का मतलब यह है कि कम शब्दों में अधिक बातें कह दी जाएँ। इसी तरह इनसान को इस प्रकार बात नहीं करनी चाहिए कि उसके शब्द एक-दूसरे में घुसे हुए हों और सुनने वाले को स्पष्ट रूप से समझ में न आए। क्योंकि बात करने का उद्देश्य सामने वाले तक अपनी बात पहुँचाना होता है। अतः बात जितनी स्पष्ट रूप से समझ में आ जाए, उतना ही अच्छा है। फिर, जब इनसान स्पष्ट रूप से बात करे और यदि किसी ने न समझा हो, तो उसके लिए तीन बार दोहराकर बोले, तो दिल में यह एहसास रखे कि वह ऐसा अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत के अनुसरण में कर रहा है। ताकि अपने भाई को समझाने का उद्देश्य पूरा होने के साथ-साथ सवाब भी मिल जाए। यही हाल तमाम सुन्नतों का है। उनपर अमल करते समय यह बात दिल में रहे कि आप अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत का अनुसरण कर रहे हैं, ताकि अनुसरण के साथ-साथ सवाब भी मिलता रहे।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यदि मुसलमानों पर -या : मेरी उम्मत पर- कठिन न होता, तो मैं उन्हें आदेश देता कि प्रत्येक नमाज़ के समय मिसवाक कर लिया करें।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि अगर आपको अपनी उम्मत के मशक़्क़त में पड़ने का भय न होता, तो उनपर हर नमाज़ के समय मिस्वाक को अनिवार्य कर देते।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सवार होकर एवं पैदल चलकर क़ुबा जाते और वहाँ दो रकात नमाज़ पढ़ते थे। तथा एक रिवायत में हैः नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) प्रत्येक शनिवार को सवार होकर एवं पैदल चलकर क़ुबा मस्जिद जाते तथा अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) भी ऐसा करते थे।
इसे दोनों रिवायतों के साथ बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।क़ुबा नामी बस्ती, जहाँ इस्लाम की पहली मस्जिद का निर्माण हुआ था, मदीना के निकट ही में स्थित एक बस्ती है। यही कारण है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पैदल तथा सवारी पर उसे देखने जाया करते थे। वर्णनकर्ता के शब्द "हर शनिवार को" से पता चलता है कि आपने देखने जाने के लिए एक दिन निर्धारित कर रखा था। हर सप्ताह शनिवार के ही दिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के क़ुबा जाने के पीछे हिकमत यह थी कि आपका अंसार से संबंध स्थापित रहे और उनका हाल-चाल जान सकें, विशेष रूप से उन लोगों का, जो जुमा के दिन आपके साथ जुमा की नमाज़ पढ़ नहीं सके हैं। विशेष रूप से शनिवार को जाने के पीछ यही कारण था।
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : मैं तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुंबी होते और एक ही बर्तन से स्नान कर लेते थे। मैं माहवारी में होती और आपके आदेश से लंगोटा बाँध लेती, फिर आप मुझसे मुबाशिरत करते। इसी तरह, आप ऐतिकाफ़ में होते और अपना सर मेरी ओर निकाल देते एवं मैं उसे धो देती, जबकि मैं माहवारी में होती थी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैमुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ की अपनी कुछ विशेष परिस्थितियों का उल्लेख कर रही हैं, एक यह कि वह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ जनाबत (संभोग अथवा स्वप्नदोष के कारण अपवित्र होने के बाद) का स्नान किया करतीं तो दोनों एक ही बर्तन से पानी लेकर स्नान किया करते थे। दूसरी यह कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब उनके साथ उनकी माहवारी की अवस्था में अपना शरीर मिलाने का इरादा करते, तो उनको अपने शरीर पर नाभी से घुटनों तक कपड़ा लपेट लेने का आदेश देते और उसके बाद उनके शरीर से अपना शरीर मिलाते। इस दौरान आप संभोग छोड़ सब कुछ करते थे। तीसरी यह कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मस्जिद में एतिकाफ़ कर रहे होते और इस दौरान अपना सर आइशा रज़ियल्लाहु अनहा के घर की ओर निकाल देते तथा वह माहवारी की अवस्था में अपने घर से आपका सर धोतीं।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अब्दुर रहमान बिन अबू बक्र सिद्दीक़- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के कमरे में दाख़िल हुए। उस समय मैंने आपको अपने सीने से सहारा दे रखा था। अब्दुर रहमान, एक हरी मिसवाक से दाँत साफ़ कर रहे थे। आप देर तक उसकी ओर देखते रहे तो मैंने मिसवाक ले ली, उसे चबाया, स्तेमाल करने के योग्य बनाया और नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को दिया तो आपने उससे इस तरह दाँत साफ़ किया कि मैंने आपको उससे अच्छी तरह मिसवाक करते कभी नहीं देखा था। जैसे ही दाँत की सफ़ाई का कार्य पूरा हुआ, अपना हाथ उठाया (अथवा उँगली उठाई), फिर (तीन बार) कहाः ऐ अल्लाह! मुझे सबसे ऊँचे स्थान वाले मित्रों में पहुँचा दे। फिर दुनिया से चल बसे। आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहा करती थीं कि आपकी मृत्यु हुई तो आपका सिर मेरे सीने और ठुड्डी के बीच था।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने एक घटना सुनाई है, जो नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के मिसवाक से प्रेम को स्पष्ट करती है। घटना यह है कि आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- के भाई अब्दुर्रहमान बिन अबू बक्र नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक ताज़ा मिसवाक से दाँत रगड़ते हुए उस समय आए, जब आप मृत्युशय्या पर थे। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अब्दुुुुर्रहमान के हाथ में मिसवाक देखा, तो बीमारी तथा मृत्यु के कष्ट के बावजूद उसका प्रेम हावी हो गया। उसकी ओर ऐसे देखने लगे, जैसे उसकी चाहत रखते हों। आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- इस बात को समझ गईं। उन्होंने अपने भाई से मिसवाक लेकर उसके सिरे को अपने दाँतों से काटकर साफ़ एवं नर्म बनाया। फिर नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को दे दिया और आपने मिसवाक किया। आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- कहती हैं कि उन्होंने आपको इससे अच्छे अंदाज़ में मिसवाक करते हुए कभी नहीं देखा था। जब आप मिसवाक कर चुके, तो अल्लाह के एक होने का एलान करते हुए और अपने रब की ओर प्रस्थान को चुनते हुए अपनी उँगली उठाई और चल बसे। आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- को इस बात पर गर्व था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनके सीने पर सर रखकर अंतिम साँस ली और सच्चाई यह है कि उन्हें इस बात का अधिकार भी है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह और अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहुमा) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "मेरा और तुम्हार उदाहरण उस व्यक्ति की तरह है, जिसने आग जलाई, तो टिड्डे तथा पतिंगे उसमें गिरने लगे और वह उन्हें उससे रोकने लगे। (बिलकुल उसी तरह) मैं तुम्हारी कमर पकड़कर तुम्हें जहन्नम की आग से रोक रहा हूँ और तुम मेरे हाथों से फिसले जा रहे हो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस में बताया है कि आपकी उम्मत के साथ आपकी हालत यूँ समझो जैसे एक व्यक्ति किसी जंगल में रहता हो और उसने वहाँ आग जलाई, तो टिड्डे और पतिंगे उसमें गिरने लगे। होता भी यही है कि जब इनसान कहीं आग जलाता है तो पतिंगे, टिड्डे और छोटे-छोटे कीड़े प्रकाश की ओर भाग-भागकर आते हैं। मैं तुम्हें उस आग में गिरने से रोकने का पूरा प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन तुम मेरे हाथ से फिसले जा रहे हो। यानी लोग अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मुख़ालफ़त और आपकी सुन्नत को छोड़ कर आपके द्वारा किए जाने वाले उन्हें आग से बचाने के प्रयासों को विफल बना रहे हैं।