





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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हसन से रिवायत है, वह कहते हैं : हमसे जुनदुब बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु ने इसी मस्जिद में बयान किया है और जब से उन्होंने बयान किया है, हम भूले नहीं हैं और हमें इस बात की भी आशंका नहीं है कि जुनदुब ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के संबंध में झूठ बोला है। उनका कहना है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुमसे पहले एक व्यक्ति को ज़ख्म लगा, तो वह व्यथित हो गया और एक चाक़ू से अपना हाथ काट डाला। रक्त बंद न हुआ, यहाँ तक कि वह मर गया। अतः, अल्लाह तआला ने फ़रमाया : मेरे बंदे ने अपनी जान ख़त्म करने में जल्दबाज़ी से काम लिया, अतः मैंने उसपर जन्नत हराम कर दी।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि पूर्ववर्ती जातियों में एक व्यक्ति के शरीर में एक ज़ख़्म लग गया, जो सब्र से काम न ले सका और अधीर होकर एक चाक़ू लिया और मरने के इरादे से उससे अपना हाथ काट डाला। कटे हुए स्थान से रक्त इतना बहने लगा कि अंततः वह मर गया। चुनांचे इस परिदृश्य में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा : मेरे बंदे ने अपनी जान ख़त्म करने में जल्दबाज़ी से काम लिया, अतः मैंने उसपर जन्नत हराम कर दी।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सामने समर्पित कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी मदद से दुश्मनों से झगड़ा किया। ऐ अल्लाह! मैं तेरे प्रभुत्व की शरण में आता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, इस बात से कि तू मुझे गुमराह करे। तू जीवंत है, जिसे कभी मौत नहीं आती, जबकि जिन्न और इन्सान मरते हैं।”
बुख़ारी एवं मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है, तथा उपरोक्त शब्द मुस्लिम द्वारा वर्णित हैं और बुख़ारी ने इसे संक्षेप में रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो दुआएँ किया करते थे, उनमें से एक यह है : "اللهم لك أسلمت" यानी ऐ अल्लाह! मैं तेरा आज्ञाकारी बन गया, "وبك آمنت" तुझपर ईमान लाया, तेरी पुष्टि की और तेरे प्रति अपनी स्वीकारोक्ति व्यक्त की, "وعليك توكلت" तुझपर भरोसा किया और अपने सारे मामलात तेरे हवाले कर दिए, "وإليك أنبت" तेरी ओर लौट आया, "وبك خاصمت" तथा तेरी मदद से तेरे दुश्मनों से वाद-विवाद किया। "اللهم إني أعوذ بعزتك" ऐ अल्लाह! मैं तेरे सम्मान, शक्ति और प्रभुत्व के शरण में आता हूँ, "لا إله إلا أنت" कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, "أن تضلني" इस बात से कि तू मुझे सत्य एवं अपनी प्रसन्नता के मार्ग से हटा दे। "أنت الحي الذي لا يموت" तू ही सदा जीवित रहने वाली हस्ती है, जिसे कभी मौत नहीं आ सकती और जो कभी फ़ना नहीं हो सकती। "والجن والإنس يموتون" जबकि जिन्नों एवं इन्सानों को मर जाना है।
इम्रान बिन हुसैन -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहा : 'अस्सलामु अलैकुम' (आपपर शांति अवतरित हो)। आपने उसके सलाम का उत्तर दिया और वह बैठ गया। फिर आपने कहा : "इसके लिए दस नेकियाँ लिखी गईं।" फिर दूसरा व्यक्ति आया और बोला : 'अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह' (आप पर शांति एवं अल्लाह की दया अवतरित हो)। तो आपने कहा : "इसके लिए बीस नेकियाँ लिखी गईं।" फिर तीसरा व्यक्ति आया और बोला : 'अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह' (आप पर शांति, अल्लाह की दया और उसकी बरकतें अवतरित हों।) तो आपने कहा : "इसके लिए तीस नेकियाँ लिखी गईं।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, अह़मद और दारिमी ने रिवायत किया हैएक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुम" आपने उसका उत्तर दे दिया और वह बैठ गया, तो आपने कहा : इसके लिए दस नेकियाँ लिख दी गईं। फिर दूसरा व्यक्ति आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह" आपने उसका उत्तर दे दिया और वह बैठ गया, तो आपने कहा : इसके लिए बीस नेकियाँ लिख दी गईं। फिर एक अन्य व्यक्ति आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुल व रहमतुल्लाहि व बरकातुह" आपने उसका भी उत्तर दिया और वह बैठ गया, तो फ़रमाया : इसके लिए तीस नेकियाँ लिख दी गईं। यानी एक-एक शब्द पर दस-दस नेकियाँ।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमाया करते थे : "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मार्गदर्शन, धर्मनिष्ठा, पवित्राचार और बेनियाज़ी (निस्पृहता) माँगता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो दुआएँ किया करते थे, उनमें से एक दुआ यह है : "اللهم إني أسألك الهدى" यानी ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सीधा रास्ता यानी सत्य की पहचान और उसपर अमल करने का सुयोग, "والتقى" आदेशों तथा निषेधों के अनुपालन का जज़्बा, "والعفاف" अवैध एवं अनुचित बातों तथा कार्यों से बचने की शक्ति, "والغنى" और सृष्टियों से निस्पृहता की दुआ करता हूँ कि तेरे द्वार के अतिरिक्त किसी और के द्वार पर जाने की आवश्यकता न हो।
मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा : आपके लिए सफ़िया का ऐसा और ऐसा होना काफ़ी है। -एक वर्णनकर्ता का कहना है कि उनका इशारा उनके नाटा होने की ओर था- यह सुन आपने कहा : "तुमने एक ऐसी बात कह दी है कि यदि उसे समुद्र के पानी से मिला दिया जाए, तो उसे नष्ट कर डाले।" वह कहती हैं : मैंने आपके सामने एक व्यक्ति की नक़ल उतारी, तो आपने कहा : "मुझे यह बात पसंद नहीं है कि मैं किसी इन्सान की नक़ल उतारूँ और उसके बदले में मुझे इतना और इतना मिल जाए।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैमुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा कि आपके लिए सफ़िया -यानी मुसलमानों की माता सफिय्या-रज़ियल्लाहु अनहा- का बस एक ही शारीरिक ऐब काफ़ी है कि वह नाटी हैं। उनकी यह बात सुन आपने कहा : तुमने एक ऐसी बात कही है कि अगर उसे समुद्र के पानी में भी मिला दिया जाए, तो उस पर हावी हो जाए, उसे बदल दे, और उसे खराब करदे। वह बताती हैं कि मैंने एक बार एक व्यक्ति की कमी दिखाने के लिए उसकी नक़ल उतारी, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मुझे यह बात पसंद नहीं है कि मैं किसी की कमी को उजागर करने के लिए उसका कोई ऐब बयान करूँ, उसकी नक़ल उतारूँ या उसकी तरह बात करके दिखाऊँ, चाहे उसके बदले में मुझे दुनिया की बहुत सारी चीज़ें दे दी जाएं।
जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने कहा : "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ", उसके लिए जन्नत में एक खजूर का पेड़ लगा दिया जाता है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने कहा : (सुबहान अल्लाह, अर्थात, मैं अल्लाह की पाकी बयान करता हूँ) और अल्लाह की पवित्रता का गुणगान किया, (अल-अज़ीम, अर्थात : जो महान है) स्वयं तथा अपने गुणों एवं कार्यों में महान है, (वबि-हम्दिही) इस हाल में कि यह पाकीज़गी उसकी प्रशंसा के साथ जुड़ी हुई है; जब भी व्यक्ति यह कहता है तब जन्नत की ज़मीन में उसके लिए खजूर का एक पेड़ लगा दिया जाता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “आपस में ईर्ष्या मत करो, क्रय-विक्रय में एक दूसरे से छल मत करो, एक-दूसरे से घृणा मत करो, एक-दूसरे से मुख मत फेरो तथा किसी के व्यापार पर व्यापार मत करो। अल्लाह के बंदों, आपस में भ्रातृत्व भाव (भाई-चारे) से रहो। मुसलमान, मुसलमान का भाई है। वह न तो उस पर अत्याचार करता है, न उसे अपमानित करता है, न उसे तुच्छ समझता है। तक़वा यहाँ है (यह कहते समय आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सीने की ओर तीन बार इशारा किया)। किसी व्यक्ति के बुरा होने के लिए यह पर्याप्त है कि वह अपने मुस्लिम भाई को तुच्छ समझे। प्रत्येक मुसलमान का रक्त, संपत्ति एवं मान-सम्मान दूसरे मुसलमान पर हराम है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैनबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुसलमान को अपने मुस्लिम भाई के साथ भलाई करने की वसीयत की है और उनके प्रति उसके कुछ कर्तव्यों एवं शिष्टाचारों को बयान किया है। जैसे : पहली वसीयत : एक दूसरे से ईर्ष्या न करो, अर्थात तुम एक-दूसरे की नेमत के छिन जाने की कामना न करो। दूसरी वसीयत : एक दूसरे के साथ नजश (दलाली) मत करो, अर्थात् तुम में से कोई ऐसा व्यक्ति वस्तु का मूल्य न बढ़ाए जो उसे खरीदना नहीं चाहता हो; बल्कि उसका उद्देश्य केवल विक्रेता को लाभ पहुंचाना अथवा क्रेता को हानि पहुंचाना हो। तीसरी वसीयत : आपस में द्वेष न रखो, क्योंकि यह हानि पहुँचाने की इच्छा का प्रतीक तथा प्रेम के विरुद्ध है। हाँ, यह द्वेष अल्लाह के लिए हो, तो यह वाजिब एवं आवश्यक है। चौथी वसीयत : परस्पर मुख फेरकर एक-दूसरे से विलग न रहो कि प्रत्येक व्यक्ति अपने बंधु को पीठ दिखाकर उसे तज दे और उसका बहिष्कार कर दे। पाँचवीं वसीयत : परस्पर एक दूसरे के विक्रय पर विक्रय न करो कि कोई व्यक्ति जो वस्तु खरीद चुका है, उससे कहने लगे कि मेरे पास इससे सस्ती या इसी क़ीमत में इससे उत्तम वस्तु है। फिर पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक समग्र उपदेश दिया और कहा : उल्लिखित निषेधों को छोड़कर भाइयों की भांति रहो, और स्नेह, नरमी, करूणा, माधुर्य, एवं भलाई के कार्यों में सहयोग के साथ, हृदय की शुद्धता तथा हर स्थिति में शुभचिंतन करने का प्रयास करो। इस बंधुत्व का तक़ाज़ा यह है कि : कोई अपने मुसलमान भाई पर अत्याचार न करे और उसका हक़ न मारे। कोई अपने मुसलमान भाई को बेसहारा न छोड़े, जब उसकी मदद कर सकता हो और उसपर हो रहे अत्याचार को रोक सकता हो। इसी तरह उसे तुच्छ न जाने, छोटा न समझे या घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से न देखे, जो हृदय में अहंकार का परिणाम है। इसके बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन बार यह स्पष्ट किया कि तक़वा (धर्मपरायणता) अंतर्मन में स्थित होता है। जिसके हृदय में तक़वा होता है, वह उत्कृष्ट आचरण, अल्लाह के प्रति भय और सतर्कता का पालन करता है तथा वह किसी मुस्लिम का अपमान नहीं करता। एक मुसलमान भाई को तुच्छ जानना हृदय के अहंकार का परिणाम है और यह बुरे तथा निकृष्ट आचरण की निशानी है। फिर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़ोर देकर बताया कि प्रत्येक मुस्लिम के लिए दूसरे मुस्लिम का रक्त बहाना हराम है। जैसे कोई उसको जान से मार दे, ज़ख़्मी कर दे या उसके साथ मारपीट करे। यही बात उसके धन पर भी लागू होती है। जैसे कोई अवैध रूप से उसका धन हड़प ले। इसी प्रकार से उसके मान-सम्मान पर प्रहार करना भी हराम है। जैसे कोई स्वयं उसकी अथवा उसके वंश की या उसके परिवार की निंदा करे।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने किसी मोमिन से दुनिया की परेशानियों में से कोई परेशानी दूर की, अल्लाह उससे क़यामत के दिन की परेशानियों में से किसी परेशानी को दूर करेगा। जिसने तंगी में पड़े हुए किसी व्यक्ति के साथ आसानी बरती, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसके साथ आसानी करेगा। जिसने किसी मुसलमान की कमी एवं अवगुण को छुपाया, अल्लाह दुनिया और आख़िरत में उसके अवगुण एवं कमियों को छुपाएगा। अल्लाह अपने बंदे की मदद में रहता है, जब तक बंदा अपने भाई की मदद में रहता है। जो ज्ञान अर्जित करने के लिए किसी मार्ग पर चलता है, अल्लाह इसके बदले में उसके लिए जन्नत का मार्ग आसान कर देता है। जब कुछ लोग अल्लाह के किसी घर में एकत्र होकर अल्लाह की किताब की तिलावत हैं और उसे आपस में समझने एवं समझाने का कार्य करते हैं, तो उनपर शांति अवतरित होती है, उन्हें अल्लाह की कृपा ढाँप लेती है, फ़रिश्ते घेरे रहते हैं और अल्लाह उनकी चर्चा उनके बीच करता है, जो उसके पास हैं (अर्फ़थात: रिश्तों के सामने)। जिसका कर्म उसे पीछे छोड़ दे, उसका कुल उसे आगे नहीं ले जा सकता।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बताया है कि अल्लाह के यहाँ मुसलमान को उसी के अनुरूप प्रतिफल मिलता है, जो वह मुसलमानों के साथ करता है। जिसने इस संसार की कठिनाइयों और संकटों में से किसी भी कठिनाइ और संकट को किसी मुस्लिम से दूर किया, बदले में अल्लाह उसे क़यामत के दिन की कठिनाइयों में से किसी कठिनाइ से मुक्ति प्रदान करेगा। जो व्यक्ति तंगी में पड़े हुए किसी व्यक्ति को सहूलत प्रदान करता है और उसकी कठिनाई को दूर करता है, अल्लाह उसके लिए इस दुनिया और आख़िरत दोनों जगह में सहूलत पैदा करेगा। जो व्यक्ति किसी मुसलमान की गलतियों और त्रुटियों को छुपाता है, अल्लाह उसकी कमियों एवं त्रुटियों पर इस दुनिया और आख़िरत में पर्दा डालेगा। अल्लाह अपने बंदे की मदद करता रहता है, जब तक बंदा अपने भाई की धार्मिक और सांसारिक हितों में सहायता करता है। यह सहायता दुआ, शारीरिक श्रम, धन और अन्य तरीकों से की जा सकती है। जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता के उद्देश्य से शरई ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में निकलता है, अल्लाह उसके लिए इस कार्य के माध्यम से जन्नत का मार्ग आसान कर देता है। जब भी कोई समूह अल्लाह के घरों में से किसी एक घर में एकत्र होता है, अल्लाह की किताब का पाठ करता है तथा आपस में उसका अध्ययन करता है, तब उनपर शांति और सुकून उतरता है, अल्लाह की दया उन्हें ढाँप लेती है, फरिश्ते उन्हें घेरे रहते हैं, अल्लाह अपने निकटवर्ती लोगों (फरिश्तों) में उनकी प्रशंसा करता है। ज़रा सोचिए कि अल्लाह के द्वारा निकटवर्तियों के बीच किसी की प्रशंसा हो जाना कितने बड़े सौभाग्य की बात है। जिसका कर्म अपूर्ण हो उसका वंश उसे कर्मशील समकक्षों की श्रेणी में नहीं ला सकता। इस लिए उसे अपने वंश एवं पूर्वजों की प्रतिष्ठा पर निर्भर नहीं होना चाहिए तथा कर्तव्यों के पालन में कमी नहीं करनी चाहिए।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के एक सहाबी अग़र्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को अधिक से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करने का आदेश दे रहे हैं और ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं कि आप दिन में सौ बार से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करते हैं। जबकि आपके अगले एवं पिछले तमाम गुनाह माफ़ थे। यह दरअसल अल्लाह के सामने में अपनी बंदगी एवं हीनता के इज़हार का पराकाष्ठा है।